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10 करोड़ आदिवासी जनसख्या के स्वास्थ्य पर राष्ट्रीय कार्यशाला

आसीएमआर की महानिदेशक डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने किया उद्घाटन
गढ़चिरौली/महाराष्ट्र/18.10.15
देश के आदिवासियों को कैसे स्वस्थ  किया जाए? उनकी स्वास्थ्य के लिए क्या-क्या किया जा सकता है? इस तरह के तमाम प्रश्नों के जवाब ढूढ़ने के लिए पिछले सप्ताह महाराष्ट्र के गढ़चिरौली के शोधग्राम में एक सरकारी-गैरसरकारी कार्यशाला का आयोजन किया गया।  केंद्रीय
आदिवासि्यों के स्वास्थ्य पर आयोजित कार्यशाला का उद्घाटन करती आसीएमआर की महानिदेशक डॉ. सौम्या स्वामीनाथन
आदिवासि्यों के स्वास्थ्य पर आयोजित कार्यशाला का उद्घाटन करती आसीएमआर की महानिदेशक डॉ. सौम्या स्वामीनाथन

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा आयोजित इस कार्यशाल का मुख्य विषय  ‘जनजातीय स्वास्थ्य सेवा में उत्तम कार्यप्रणालियां’ रखा गया था। इस तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य भारत की 10 करोड़ आदिवासी जनसंख्या की स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए संभव समाधान की पहचान करना था। इस कार्यशाला का उद्घाटन स्वास्थ्य अनुसंधान सचिव और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की महानिदेशक डा. सौम्या स्वामीनाथन ने किया।
डॉ. स्वामीनाथन ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा, ‘यह कार्यशाला आदिवासी स्वास्थ्य सेवा के लिए नीति निर्माण में जमीनी स्तर से साक्ष्यों को एकीकृत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह सरकारी विभागों, आईसीएमआर और स्वैच्छिक एजेंसियों को अपने अनुभव साझा करने तथा एक दूसरे से सीखने का एक अनूठा अवसर प्रदान करती है।’
इस कार्यशाला में शैक्षणिक समुदाय, सरकार और सामाजिक संगठनों के 24 संगठनों के 50 से अधिक प्रतिनिधियों के वर्तमान कार्यक्रमों को देखा गया, जिनमें वे मलेरिया और मातृ मृत्यु दर से लेकर फ्लोरोसिस तथा मानव संसाधन की कमी से खड़ी समस्याओं के समाधान के लिए काम कर रहे हैं। चयनित प्रवृष्टियों में अरुणाचल प्रदेश के करुणा ट्रस्ट की पीपीपी मॉडल पर चलने वाली ग्रामीण ‘सेवा’ द्वारा विकसित एक वेब आधारित एप्लीकेशन, ओडिशा में ‘मित्रा’ की मलेरिया नियंत्रण रणनीति, छत्तीसगढ़ सरकार के मानव संसाधन आउटसोर्सिंग के जरिए बिलासपुर में जन स्वास्थ्य सहयोग द्वारा बच्चों के लिए चलाई जा रही ‘फुलवारी’, जबलपुर स्थित आदिवासी स्वास्थ्य राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान द्वारा खोजी गई फ्लोरोसिस नियंत्रण में मददगार जंगली घास आदि शामिल हैं। वहीं ‘सर्च’ नाम के संगठन ने नवजात की देखभाल के लिए घरेलू तरीकों का प्रदर्शन किया। इनमें सजीव प्रदर्शन कर दिखाया गया कि कैसे गांव की एक साधारण महिला को नवजात की जान बचाने के लिए स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में प्रशिक्षित किया जा सकता है। इस मॉडल को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ने अपना लिया है और लगभग नौ लाख आशा कार्यकर्ताओं की मदद से इसे राष्ट्रीय स्तर चलाया जा रहा है।
कार्यशाला को संबोधित करते वक्ता
कार्यशाला को संबोधित करते वक्ता

इन कार्यप्रणालियों को आदिवासी स्वास्थ्य पर विशेषज्ञ समूह द्वारा प्राप्त 85 प्रविष्टियों में से चयनित किया गया था। विशेषज्ञ समूह के अध्यक्ष डा. अभय बैंग ने अपने समापन भाषण में कहा, ‘ये कार्यप्रणालियों न केवल आदिवासी समुदाय को पीड़ा देने वाली स्वास्थय संबधी परेशानियों के संभावित समाधान को पेश करती हैं बल्कि उस क्षेत्र में भी आशा की एक किरण प्रदान करती है जिसे आमतौर पर अंधकारमय और दारुण माना जाता है। ये हमें दिखाता है कि आदिवासी समुदायों के लिए स्वास्थ्य सेवा सुलभ बनाने की खातिर काम किया जा रहा है।’
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और जनजातीय मामलों के मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से अक्टूबर 2013 में आदिवासी स्वास्थ्य पर विशेषज्ञ समूह गठित किया गया था। इसका काम आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य की मौजूदा स्थिति की समीक्षा करना, हस्तक्षेप सुझाना, राज्यों के लिए रणनीतिक दिशा निर्देश तैयार करना और आदिवासी आबादी की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए एक राष्ट्रीय ढांचा विकसित करना है। इसमें केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, अनुसंधान संगठनों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया है। यह विशेषज्ञ समूह स्वास्थ्य की मौजूदा स्थिति की समीक्षा करने के लिए विभिन्न राज्यों का दौरा करता रहता है और इसने पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी लोगों का स्वास्थ्य डेटा संकलित किया है। उम्मीद है कि इस साल के अंत तक यह अपनी रिपोर्ट और सिफारिशों को तैयार कर लेगा।
यह कार्यशाला सामुदायिक स्वास्थ्य शिक्षा, कार्य एवं अनुसंधान सोसायटी (सर्च) द्वारा आयोजित की गई।

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