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कोलेस्ट्रॉल पर कई तरह की गलतफहमियां भी

कोलेस्ट्रॉल पर कई तरह की गलतफहमियां भी

मोनिका जौहरी

कोलेस्ट्रॉल पर बात करतें हैं आज! मेडिकल साइंस में कुछ भी अंतिम सत्य नहीं होता। क्यों, कैसे? बाद में समझा दूँगी! विज्ञान का ज्ञान जनता की अच्छी बुरी, दोनों प्रकार की धारणाएँ गढ़ता है। यदि धारणा बुरी हुई तो वह लोगों के अवचेतन में शब्दों की डरावनी छवि उकेर देती है। ठीक वैसे ही जैसे मोर देन 70 फीसद ब्लॉकेज में…खैर छोड़ो अभी इसे! ऐसी ही एक बुरी वैज्ञानिक धारणा से बुराई झेलता शब्द है कोलेस्टेरॉल! अधिसंख्य जनता अभी भी यह मानकर चलती है कि कोलेस्ट्रॉल मतलब स्वास्थ्यनाशक कोई रसायन या पदार्थ।
विज्ञान का सबसे बड़ा उत्तरदायित्व आपको गुड बैड की बायनरी से बचाना है। जीवन में कुछ भी श्याम श्वेत नहीं होता, धूसर के शेड लिये रहता है। परिस्थितियाँ तय करती हैं कि फलाना रसायन शरीर के लिए सदुपयोगी है अथवा दुरुपयोगी। यदि उपयोग ‘सत्’ हुआ, तो वह देह के लिए लाभकारी कहलाएगा और अगर ‘दुः’ हुआ तो हानिकारी। परिस्थितियों के अनुसार ही कोलेस्ट्रॉल, प्रोटीन, सोडियम, पोटैशियम, कैल्शियम तमाम हॉर्मोन इत्यादि को अच्छा बुरा हमें समझना चाहिए।
कोलेस्ट्रॉल के विषय में बुरी धारणाओं का वैज्ञानिक निर्माण सन् 1960 के आसपास हुआ, जब वैज्ञानिकों डॉक्टरों ने लोगों से कोलेस्ट्रॉल युक्त भोजन बहुत कम करने को कहा। तीन सौ मिलीग्राम के आसपास। लगभग दो अण्डे सप्ताह भर में। सोच यह थी कि जितना अधिक कोलेस्ट्रॉल-युक्त भोजन करोगे, उतना शरीर में व खून में इसकी मात्रा बढ़ेगी। जितना अधिक कोलेस्ट्रॉल, उतना अधिक हृदय रोग। सिम्पल। पर ये सत्य नहीं है न ये गलतफहमी है बस।
विज्ञान का काम अपने ही शोधित निष्कर्षों का सतत निर्मम विश्लेषण है। यही चलता रहा। तब आहार वैज्ञानिकों ने जाना कि खून में पायी जाने वाले कोलेस्ट्रॉल की मात्रा केवल कोलेस्ट्रॉलयुक्त आहार के सेवन पर निर्भर नहीं। यानी केवल इतना सरल सच मानने से काम नहीं चलने वाला कि खून में ऊँची पायी गयी कोलेस्ट्रॉल की मात्रा केवल ग़लत भोजन के कारण बढ़ी आयी है।
नतीजन यह सोचना कि अधिक अण्डे या इसी तरह का कोलेस्ट्रॉल से भरपूर भोजन खाने की वजह से खून में कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाता है, सही नहीं है। शोधों के नतीजे भिन्न हैं। बहुत बार (आम तौर पर) अगर हम कोलेस्ट्रॉल का सेवन दुगुना करते हैं, तो खून में कोलेस्ट्रॉल दुगुना नहीं होता। बल्कि उसमें केवल पाँच प्रतिशत वृद्धि होती है। ज़ाहिर है, जिनका कोलेस्ट्रॉल का लेवल बढ़ा हुआ है, उनमें दोष केवल ग़लत खानपान पर नहीं।
पर ऐसे में सवाल उठता है कि कौन से वे कारक हैं, जिनके कारण बिना अधिक कोलेस्ट्रॉल युक्त भोजन किये भी कोलेस्ट्रॉल की मात्रा खून में बढ़ जाए? उत्तर है व्यक्ति के जीन। वे जीन जो कोलेस्ट्रॉल मेटाबॉलिज़्म के लिए आवश्यक रसायनों का निर्माण करते हैं। ऐसे रसायन जो तय करते हैं कि कोलेस्ट्रॉल की मात्रा खून में कितनी रहेगी। शरीर में मौजूद कोलेस्ट्रॉल की बड़ी मात्रा हम भोजन से नहीं पाते, स्वयं शरीर के जीनों रसायनों की सहायता से भीतर बनाते हैं। यह कोलेस्ट्रॉल तमाम कामों में इस्तेमाल होता है। अनेक हॉर्मोन इससे निर्मित होते हैं, बहुत सी मेटाबॉलिक क्रियाएँ इसी कोलेस्ट्रॉल से संचालित होती हैं।
पुरुष के पुरुष होने में उसके पुरुष हॉर्मोन टेस्टोस्टेरॉन का बड़ा योगदान है। कैसे बनेगा यह हॉर्मोन बिना कोलेस्ट्रॉल? स्त्री स्त्री की तरह है, क्योंकि उसके पास एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरॉन स्त्री हॉर्मोन हैं। कैसे रहेगी वह स्त्री बिना कोलेस्ट्रॉल से बने इन हॉर्मोनों से? विटामिन डी का निर्माण त्वचा लिवर और किडनी मिलकर करतें हैं। कैसे बनेगा शरीर में विटामिन डी बिना कोलेस्ट्रॉल के?
एक बात बताओ कि शरीर की एक कोशिका ऐसी नहीं (जी हाँ, एक भी जो बिना कोलेस्ट्रॉल के बन सके)। लेकिन फिर यह भी सच है कि खून में मौजूद कोलेस्ट्रॉल का बढ़ा हुआ लेवल बहुत से रोगों की पृष्ठभूमि भी तैयार करता है।
अनेक लोग मानव समाज में ऐसे हैं जिनके खून में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कोलेस्ट्रॉल भोजन करने से बढ़ जाती है। पर सभी ऐसे नहीं हैं। सारे लोगों की कोलेस्ट्रॉल संवेदनशीलता अलग—अलग है। विज्ञान की ऑब्जेक्टिविटी ही जीव विज्ञान रिसर्च के दौरान सबसे बड़ी समस्या बनकर सामने आती है। सभी इंसान एक मेल के नहीं है, लेकिन डॉक्टर स्वास्थ्य सम्बन्धी गाइडलाइन समूचे देश, बल्कि सारे संसार के लिए जारी कर देते हैं।
एक आवाज उठती है अमेरिका जैसे देश में की कोलेस्ट्रॉल है! जानलेवा है! और फिर पूरी दुनिया के सभी डॉक्टर अनुसरण करते हुए कहते हैं जी, बिलकुल जानलेवा है! घातक है! अमेरिका से फिर आवाज उठती है-कोलेस्ट्रॉल खाने में कोलेस्ट्रॉल भोजन से सेवन से बढ़ता है! दुनिया फिर हामी भरती जाती है-जी, हाँ बिलकुल इसी से बढ़ता है!
डेविड क्लरफेल्ड जैसे वैज्ञानिक इस बात पर दिलचस्प जानकारियाँ सामने रखते हैं। वे कहते हैं कि जितना हम वैज्ञानिक लैब में जानवरों को समझते हैं, उतनी देर तक हम मनुष्यों को नहीं समझते। इसी कारण अनेक बार ग़लत निष्कर्ष निकलते हैं, जिनसे समाज में ग़लत धारणाओं का प्रचार या प्रसार होता है। कोलेस्ट्रॉल पर ढेरों शोध हुए खरगोश पर, जो कि एक शाकाहारी जीव है। जबकि कोलेस्ट्रॉल पाया जाता है पशु उत्पादों में। अब जब शाकाहारी खरगोश पर किये शोधों के नतीजे विज्ञान सर्वाहारी मनुष्यों पर लगाएगा, तो गलतियाँ तो होंगी ही।
अंत में यही बात याद रखना कि कोलेस्ट्रॉल हो, चाहे शरीर का अन्य कोई रसायन, उसकी अति और न्यूनता दोनों बुरी है।

लिखा था न कबीर ने याद है क्या आपको?

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

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