नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। बांझपन को समाज में कलंक समझा जाता है। हजारों कपल इसके शिकार होकर मानसिक यंत्रणा झेलने को मजबूर होते हैं। अब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस पर ध्यान देते हुए पहली बार इसकी रोकथाम, पहचान और उपचार के लिए एक वैश्विक दिशा-निर्देश जारी किया है। इसका उद्देश्य प्रजनन संबंधी सेवाओं को अधिक सुरक्षित, न्यायसंगत और किफायती बनाना है। उसके अनुसार बांझपन बहुत ही आम लेकिन अक्सर नजरअंदाज की जाने वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है, जो दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करती है।
बांझपन: उपचार काफी महंगा
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक WHO की रिपोर्ट बताती है कि प्रजनन आयु के लगभग हर छठे व्यक्ति को जीवन में कभी न कभी बांझपन का सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद ज्यादातर देशों में बांझपन से जुड़े परीक्षण और उपचार बेहद महंगे हैं और अधिकतर खर्च लोगों को अपनी जेब से करना पड़ता है। कई देशों में आईवीएफ जैसे उन्नत उपचार का खर्च औसत वार्षिक आय से भी दोगुना होता है। ऐसे में बहुत से लोग या तो इलाज करवाने में असमर्थ रहते हैं या कम-प्रमाणित और सस्ते विकल्पों की ओर धकेल दिए जाते हैं। रिपोर्ट में WHO के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अदनोम घेब्रेयसस के हवाले से कहा गया है कि बांझपन एक गंभीर समानता का मुद्दा है। उनके अनुसार कई लोग अपनी आर्थिक स्थिरता और संतान प्राप्ति की इच्छा के बीच कठिन निर्णय लेने के लिए मजबूर होते हैं। उन्होंने देशों से अपील की कि वे नए दिशा-निर्देशों को अपनाकर गुणवत्तापूर्ण और सस्ती सेवाओं तक लोगों की पहुंच बनाएं।
बांझपन: ये हैं दिशा-निर्देश
नए दिशा-निर्देशों में 40 प्रमुख सिफारिशें शामिल हैं, जो रोकथाम, पहचान और उपचार-तीनों स्तरों पर कार्य को मजबूत करने पर केंद्रित हैं। इनका उद्देश्य है कि हर चरण पर किफायती और प्रभावी विकल्प उपलब्ध हों। प्रजनन सेवाओं को राष्ट्रीय स्वास्थ्य रणनीतियों में शामिल किया जाए। स्वास्थ्य सेवाओं और वित्तीय ढांचों में प्रजनन देखभाल को एकीकृत किया जाए। मानव-केंद्रित और प्रमाण-आधारित देखभाल आदि। बांझपन को 12 महीने या उससे अधिक समय तक नियमित, असुरक्षित यौन संबंध के बाद गर्भधारण न होने की स्थिति के रूप में परिभाषित किया गया है। यह स्थिति केवल शारीरिक स्वास्थ्य को नहीं बल्कि मानसिक और सामाजिक जीवन को भी प्रभावित करती है। इससे जुड़ी अवसाद चिंता और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याएं भी लोगों के जीवन पर भारी पड़ती हैं। बांझपन की पहचान के लिए चरणबद्ध तरीके बताए गए हैं। इनमें पुरुष और महिला दोनों में जैविक कारणों की जांच शामिल है। सरल सलाह जैसे उपजाऊ समय की जानकारी, स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की सलाह-से लेकर जटिल उपचारों जैसे आईयूआई और आईवीएफ तक, हर स्तर पर क्रमिक और मरीज-केंद्रित निर्णय लेने का सुझाव दिया गया है। WHO ने कहा है कि युवाओं को प्रजनन और बांझपन की जानकारी स्कूलों और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में मिलनी चाहिए। यौन संचारित संक्रमण जैसे कारणों का समय पर उपचार बेहद जरूरी है। धूम्रपान, खराब आहार, शारीरिक निष्क्रियता जैसी जीवनशैली से जुड़ी आदतें बांझपन का जोखिम बढ़ाती हैं, इसलिए स्वस्थ जीवनशैली अपनाने पर जोर दिया गया है।
बांझपन: तनाव से उबरें
WHO ने स्पष्ट किया कि बांझपन केवल चिकित्सा समस्या नहीं, बल्कि एक भावनात्मक यात्रा भी है, जो कई बार बेहद कठिन होती है। इसलिए सभी प्रभावित लोगों के लिए नियमित मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समर्थन उपलब्ध कराना आवश्यक है। इससे न केवल उपचार प्रक्रिया आसान होती है, बल्कि परिवारों को भी तनाव से उबरने में मदद मिलती है। WHO देशों को प्रोत्साहित कर रहा है कि वे इन दिशा-निर्देशों को स्थानीय जरूरतों के अनुसार अपनाएं और समय-समय पर प्रगति की समीक्षा करें। इसके लिए स्वास्थ्य मंत्रालयों, पेशेवर संगठनों, सिविल सोसाइटी और रोगी समूहों के बीच सहयोग जरूरी है। उसने यह भी कहा कि बांझपन सेवाएं एक अधिकार-आधारित और लैंगिक समानता पर आधारित नजरिए का हिस्सा होनी चाहिए। लोगों को अपने प्रजनन संबंधी निर्णय-कब और कितने बच्चे -स्वतंत्र रूप से लेने का अधिकार होना चाहिए। डब्ल्यूएचओ ने माना कि अभी भी कई क्षेत्रों में अधिक शोध और नए साक्ष्यों की आवश्यकता है। भविष्य में आने वाले संस्करणों में उभरते विषयों-जैसे प्रजनन क्षमता का संरक्षण, तीसरे पक्ष की सहायता से प्रजनन और पूर्व-मौजूद बीमारियों का असर को शामिल किया जाएगा।
