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NPPA: : अप्रैल से जरूरी दवाएं हो जाएंगी महंगी

NPPA: अप्रैल से जरूरी दवाएं हो जाएंगी महंगी

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। युद्ध भले ही भारत से बाहर के देश लड़ रहे हों लेकिन उसके असर से गैस, तेल और खाद तो प्रभावित हुआ ही, फार्मा सेक्टर भी नहीं बचा। जहां दवाओं की कीमत बढ़ रही हैं वहीं कच्चे माल की आपूर्ति बाधित होने से दवा कंपनियों का उत्पदन भी ठप होगा। अभी ही 1 अप्रैल से पैरासिटामोल, एंटीबायोटिक्स और अन्य जरूरी दवाओं के दाम बढ़ रहे हैं। सरकार ने आवश्यक औषधियों की राष्ट्रीय सूची (NLEM) में औषधियों की खेप में करीब 0.6 फीसद तक की बढ़ोतरी कर दी है। इस पैकेज में 1000 से ज्यादा जरूरी दवाइयां लागू होंगी। जाहिर है बुखार से दर्द तक की दवा महंगी हो जाएगी। जानकारी के मुताबिक नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) ने बताया है कि वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के उद्योग एवं आंतरिक व्यापार विभाग में आर्थिक सलाहकार कार्यालय द्वारा उपलब्ध थोक मूल्य ग्लूकोज (WPI) के आंकड़े के आधार पर 2025 के दौरान वर्ष 2024 की समान अवधि की तुलना में डब्ल्यूपीआई में वार्षिक बदलाव (+) 0.64956 फीसद है। लागत प्रभावी एनएलईएम की 1,000 से अधिक दवाओं पर लागू होती है।

NPPA: इन दवाओं पर असर

नियंत्रित औषधियों के अंतिम वर्ष में बदलाव की मात्रा एक वर्ष में एक बार दी जाती है। आवश्यक दवाओं में पेरासिटामोल, संक्रमण के इलाज में प्रयुक्त होने वाली एंटीबायोटिक एजिमाथ्रोइसिन, खून की कमी (एनीमिया) की दवाएं, विटामिन और खनिज (मिनरल) जैसी दवाएं शामिल हैं। इस वृद्धि में जीएसटी शामिल नहीं है। कोविड-19 के मध्यम से गंभीर इलाज में इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाएं और मोटापा भी इस सूची में हैं। दवा उद्योग के सूत्रों के अनुसार यह मामूली वर्गीकरण ऐसे समय में हुआ है, जब ईरान युद्ध के कारण तेल उद्योग यानी कच्चे माल की लागत ने उद्योग के मुनाफ़े को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।

NPPA: पैरासिटामोल में 25 फीसद बढ़ोत्तरी

उद्योग विशेषज्ञ का कहना है कि चल रहे के युद्ध के कारण कुछ प्रमुख एक्टिविटी मेडिसिनल इंग्रिएंट्स (API) और सॉल्वैंट्स के दाम काफी बढ़ गए हैं और जबरदस्त युद्ध से ही कोई राहत नहीं मिली है। उदाहरण के लिए पिछले कुछ दिनों से यूक्रेन में एपीआई की औसत 30-35 फीसद की वृद्धि हुई है। उद्योग के अधिकारियों ने बताया कि ग्लिसरीन की कीमत दिसंबर के बाद 64 फीसद बढ़ी है, जबकि पैरासिटामोल की कीमत 25 फीसद और सिप्रोफ्लोक्सासिन की कीमत 30 फीसद बढ़ी है। पॉलीविनाइल क्लोराइड और एल्युमीनियम फॉयल रेडिएटर सामग्री की कीमत में भी 40 फीसद की वृद्धि हुई है। पेट्रोकेमिकल से बनने वाले मेडिसिन सॉल्वैंट्स की कीमतें 30 प्रतिशत तक बढ़ी हैं। लॉजिस्टिक्स कास्ट भी बढ़ी है। इससे संबंधित छोटी दवा निर्माता कंपनियों पर सर्टिफिकेट जारी किया जा रहा है। कई छोटी दवा कंपनियां जस्ट-इन-टाइम मॉडल पर काम करती हैं अर्थात कच्चा माल का अधिकांश स्टॉक नहीं लिखा जाता।

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