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Diabetes: अब सप्ताह में एक डोज लेने होंगे इंसुलिन

Diabetes: अब सप्ताह में एक डोज लेने होंगे इंसुलिन

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। भारत में डायबिटीज (Diabetes) के मरीजों के लिए राहत वाली खबर है। अब इस रोग के मरीजों को हफ्ते में एक बार इंसुलिन की सूई लेनी होगी। यह दवा डेनमार्क की कंपनी नोवो नॉर्डिस्क (Novo Nordisk) ने भारत में अवीकली (Awiqli) नाम से लॉन्च कर दी है। अब तक डायबिटीज पीड़ितों को यह सूई रोज लेनी होती थी यानी साल में कम से कम 365।

उपयोग में भी सुरक्षित

मालूम हो कि मधुमेह (Diabetes) में इंसुलिन पेन एक बहुत ही सुविधाजनक और आसान उपकरण है, जिसका उपयोग त्वचा के नीचे इंसुलिन इंजेक्ट करने के लिए किया जाता है। यह सिरिंज की तुलना में अधिक सटीक डोज देता है, उपयोग में सुरक्षित है और यात्रा के दौरान साथ ले जाना भी काफी आसान भी। रही बात कीमत और उपलब्धता की तो कंपनी ने इसे 2611 रुपये में 700 यूनिट के साथ लॉन्च किया है। यह एक डिस्पोजेबल फ्लेक्सटच पेन के रूप में आता है। इसकी प्रति यूनिट लागत लगभग 3.70 रुपये बैठती है। भारत जैसे कीमत के प्रति संवेदनशील बाजार के लिए कंपनी ने इसे बेहद किफायती रखने का प्रयास किया है। नोवो नॉर्डिस्क इंडिया के प्रबंध निदेशक विक्रांत श्रोत्रिय के मुताबिक यह आधुनिक सेकेंड-जनरेशन इंसुलिन की तुलना में औसतन 25 से 35 प्रतिशत तक सस्ता है। रोजाना इंसुलिन लेने वाले मरीजों को साल में 365 इंजेक्शन लगाने पड़ते हैं। हफ्ते में सिर्फ एक बार लिए जाने वाले अवीकली से मरीजों को साल में सिर्फ 52 इंजेक्शन ही लेने होंगे। इससे मरीजों को रोज-रोज के दर्द और झंझट से बड़ी मुक्ति मिलेगी।

6 फेज में दवा का परीक्षण

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इस इंसुलिन का विज्ञान 1950 के दशक की खोजों से जुड़ा है। नोवो नॉर्डिस्क ने इंसुलिन चेन पर तीन अमीनो एसिड की पोजीशन में बदलाव किया है और इसके एक छोर पर फैटी एसिड जोड़ा है। इन बदलावों के कारण शरीर में दवा का प्रभाव 190 घंटे से अधिक समय तक बढ़ जाता है। यह संशोधित मॉलिक्यूल रक्त में मौजूद एल्ब्यूमिन (Albumin) प्रोटीन के साथ प्रतिवर्ती रूप से जुड़ जाता है और घंटों के बजाय कई दिनों तक धीरे-धीरे शरीर में रिलीज होता है। यही वजह है कि एक सिंगल इंजेक्शन पूरे हफ्ते का कवरेज दे देता है। कंपनी के मुताबिक इसके क्लिनिकल प्रोग्राम के छह फेज-3a ट्रायल्स में 4000 से अधिक वैश्विक मरीजों (भारतीयों सहित) पर अध्ययन किया गया। इसमें इसने प्रतिदिन दिए जाने वाले ग्लार्गिन यू100 की तुलना में बेहतर HbA1c नियंत्रण और टाइम इन रेंज का प्रदर्शन किया।

महत्वपूर्ण प्रगति

एक्सपर्ट्स के मुताबिक यह दवा मुख्य रूप से टाइप 2 डायबिटीज के उन वयस्क मरीजों के लिए है जिनका ब्लड शुगर ओरल दवाओं से कंट्रोस नहीं हो रहा है। यह इंसुलिन रोजाना के इंजेक्शन के बोझ को कम करेगा और मरीजों में इलाज के प्रति निरंतरता को सुधारेगा। वे इसे एक महत्वपूर्ण प्रगति मानते हैं। इससे उन मरीजों को इंसुलिन थेरेपी शुरू करने के लिए मनाना आसान हो जाएगा जो रोज इंजेक्शन लगाने के डर से मना कर देते हैं। एक एक्सपर्ट के मुताबिक दैनिक इंसुलिन की तरह इसमें डोज को रोजाना माइक्रो-एडजस्ट नहीं किया जा सकता। अगर मरीज का ब्लड शुगर अचानक बहुत कम हो जाता है तो वह स्थिति लंबे समय तक बनी रह सकती है क्योंकि एक बार शरीर में जाने के बाद इस इंसुलिन को रोका नहीं जा सकता। हालांकि इसका जोखिम मौजूदा इंसुलिन जितना ही है। अगर हफ्ते की कोई खुराक छूट जाती है तो उसे प्रबंधित करना अधिक जटिल होता है और उसे तुरंत ठीक नहीं किया जा सकता। इसके लिए डॉक्टरों और मरीजों को विशेष ट्रेनिंग की जरूरत होगी।

10 करोड़ भारतीय पीड़ित

अध्ययन बताते हैं कि 93 प्रतिशत मरीज इंसुलिन इंजेक्शन नहीं लेना चाहते और डॉक्टर भी हिचकिचाते हैं। लोग जरूरत से 8 या 9 साल की देरी से इंसुलिन शुरू करते हैं। तब तक स्वाभाविक रूप से इंसुलिन बनाने वाली शरीर की करीब आधी बीटा कोशिकाएं हमेशा के लिए खत्म हो चुकी होती हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र के 20.9 फीसद पुरुषों और 17.8 फीसद महिलाओं में हाई ब्लड शुगर है या वे इसकी दवा ले रहे हैं। ये आंकड़ा जो NFHS-5 में क्रमशः 15.6 फीसद और 13.5 फीसद था। भारत में इस समय 10.1 करोड़ से अधिक लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं और 13.6 करोड़ लोग प्रीडायबिटीज की श्रेणी में हैं। करीब 60 लाख मरीज इंसुलिन का इंजेक्शन ले रहे हैं। एक्सपर्ट का कहना है कि यह नया इंसुलिन मरीजों के लिए सुविधा जरूर बढ़ाता है, लेकिन इसे डॉक्टर की सलाह के बिना शुरू या बंद नहीं करना चाहिए।

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