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ऑटिज्म डिसऑर्डर : कारण, लक्षण तथा निदान

सुबोध कुमार

कई माता-पिता के लिए यह बताया जाना बहुत ज्यादा दर्दनाक और अविश्वसनीय हो सकता है कि उनके बच्चे को ऑटिज्म यानी आत्मलीनता है। वे इस तरह की खबर सुनकर स्तब्ध हो सकते हैं। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि ऑटिस्टिक होने का मतलब यह नहीं है कि किसी व्यक्ति को कोई रोग या बीमारी है। बल्कि इसका मतलब है कि उसका दिमाग दूसरे लोगों से अलग तरीके से काम करता है। अभी तक ऑटिज्म का कोई उपचार नहीं है। ऑटिज्म से पीड़ित कुछ लोगों को कुछ चीजों के साथ तालमेल बिठाने के लिए मदद की जःरत होती है। जितना ज्यादा हम वैज्ञानिक रूप से दुनिया के ऑटिस्टिक दृष्टिकोण को समझेंगे, उतना ही ज्यादा हम उनकी मदद करने में सक्षम हो सकेगे।

ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी)

यह एक तंत्रकीय विकास से जुड़ा (न्यूरो डेवलपमेंट) विकार है, जो मस्तिष्क में भिन्नताओं की वजह से होता है। इसे आमतौर पर ऑटिज्म के नाम से जाना जाता है। सामाजिक संचार और सामाजिक संपर्क करने में आनेवाली मुश्किलें तथा व्यवहारों, रुचियों और गतिविधियों में प्रतिबंधित एवं दोहराव वाले पैटर्न इसके लक्षण हैं। इसके लक्षणों को विकास के प्रारंभिक चरणों के दौरान पहचाना जा सकता है और ये पीड़ित व्यक्ति के रोजमर्रा के कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं। ‘स्पेक्ट्रम‘ शब्द का उपयोग इसलिए किया जाता है क्योंकि ऑटिज्म से पीड़ित हर व्यक्ति दूसरे से बिल्कुल अलग होता है। कुछ ऑटिस्टिक लोगों को मदद की जरूरत या तो बिल्कुल नहीं होती या फिर बहुत कम होती है जबकि दूसरों को दिन-प्रतिदिन के आधार पर माता-पिता या देखभाल करने वाले से मदद की जःरत हो सकती है।

ऑटिज्म के कारण और लक्षण

एएसडी का सटीक कारण अज्ञात है। ऐसा लगता है कि यह आनुवंशिक है, लेकिन माता-पिता की उम्र और गर्भावस्था के दौरान ली गई डॉक्टरी दवाओं की भी इसमें भागीदारी है। स्पेक्ट्रम पर कुछ बच्चे तो कुछ एक महीने की उम्र में ही लक्षण दिखाना शुरू कर देते हैं, जबकि दूसरे बच्चे अपने जीवन के पहले कुछ महीनों या वर्षों के लिए विकास के सामान्य चरण पूरे करते हुए प्रतीत होते हैं। उसके बाद ऑटिज्म के लक्षण दिखाना शुरू करते हैं। हालांकि, एएसडी वाले आधे बच्चों के माता-पिता 12 महीने की उम्र तक समस्याओं को नोटिस करने लगते हैं और 80 से 90 प्रतिशत के बीच माता पिता इन बच्चों की उम्र दो साल होते-होते समस्याओं को नोटिस करने लगते हैं। यूं तो एएसडी वाले बच्चों में ऑटिज्म के लक्षण जीवन भर मौजूद रहेंगे, लेकिन जैसे-जैसे वे बड़े होते जाते हैं, उनमें सुधार हो सकता है। ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार अत्यंत व्यापक है। इस विकार से ग्रस्त कुछ लोगों में बहुत ही ध्यान देने योग्य मुद्दे हो सकते हैं, जबकि दूसरों में नहीं हो सकते हैं। स्पेक्ट्रम पर मौजूद ऑटिज्म-ग्रस्त लोगों की तुलना करते समय सामाजिक कौशल, संचार और व्यवहारगत भिन्नता ही वे सामान्य सूत्र हैं, जो इन्हें आपस में जोड़ती हैं।

ऑटिज्म और सामाजिक कौशल

एएसडी वाले बच्चे को दूसरों के साथ बातचीत करने में मुश्किल होती है। सामाजिक कौशल के साथ तालमेल बैठाने में आने वाली मुश्किलें, ऑटिज्म के सबसे आम लक्षणें में से होती हैं। ऑटिज्मग्रस्त बच्चे घनिष्ठ संबंध बनाने की चाह कर सकते हैं, लेकिन उन्हें यह पक्के तौर पर मालूम नहीं होता कि घनिष्ठ संबंध बना,ं कैसे? यदि कोई बच्चे आत्मलीनता स्पेक्ट्रम पर हैं, तो वे अपने पहले जन्मदिन तक कुछ सामाजिक लक्षण प्रदर्शित कर सकते हैं, जैसे अपना नाम पुकारे जाने पर जवाब न देना, दूसरे लोगों के साथ खेलने, चीजों को साझा करने या उनके साथ बात करने में रुचि न लेना, अकेले रहना पसंद करना, शारीरिक संपर्क तथा गले लगने से बचना या इसे अस्वीकार करना, आंखें मिलाने से बचना, परेशान होने पर दिलासा दिए जाने को नापसंद करना और अपनी या दूसरों की भावनाओं को न समझना।

ऑटिज्म संचार को कैसे प्रभावित करता है?

ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार वाले लगभग 40 फीसद बच्चे बिल्कुल बोलते ही नहीं हैं, जबकि इनमें से 25 से 30 फीसद बच्चों में बचपन के दौरान कुछ भाषा कौशल पा जाते हैं, लेकिन बाद में ये बच्चे इस कौशल को भूल जाते हैं। एएसडी वाले कुछ बच्चे जीवन में काफी समय तक बोलना शुरू ही नहीं करते हैं। ऐसे अधिकांश बच्चों में संचार संबंधी कई समस्या होती हैं, जैसे देर से बोलना, देर से भाषा कौशल प्राप्त करना, रोबोट जैसी सपाट आवाज या फिर गाने जैसी आवाज निकालना, इकोलिया अर्थात एक ही वाक्यांश को बार-बार दोहराना, सर्वनामों के इस्तेमाल संबंधी समस्या जैसे ‘मैं‘ के बजाय ‘आप‘ कहना, सामान्य इशारों का इस्तेमाल न कर पाना, इशारा करने या हाथ लहराने जैसे सामान्य इशारों का या तो बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं करना या फिर शायद ही कभी-कभार करना, शारीरिक इशारों का जवाब न दे पाना, बात करते समय या फिर सवालों के जवाब देते समय किसी निश्चित विषय पर टिके रहने में असमर्थ रहना, व्यंग्य, तानाबाजी, छींटाकशी या हंसी-मजाक को पहचानने में असमर्थ रहना, जरूरतों और भावनाओं को व्यक्त करने में परेशानी अनुभव करना और/या गैर-मौखिक संचार, आवाज के स्वर और अभिव्यक्तियों से की जाने वाले संकेतों की पहचान न कर पाना।

निदान

ऑटिज्म या आत्मलीनता के मामले में हस्त{ोप जितना जल्दी शुरू होता है, इसके प्रभावी होने की संभावना उतनी ही ज्यादा रहती है। एएसडी के चिह्नों और लक्षणों की पहचान, प्रारंभिक निगरानी और स्क्रीनिंग (परीक्षण) द्धारा की जा सकती है। सर्विलांस या विकासात्मक निगरानी एक सक्रिय तथा लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। इसमें बढ़ते हुए बच्चे की वृद्धि पर लगातार नजर रखी जाती है तथा माता-पिता और प्रदाताओं के बीच बच्चे के कौशल और क्षमताओं के बारे में बातचीत को प्रोत्साहित किया जाता है।
एएसडी का निदान, नैदानिक मूल्यांकन पर आधारित होता है जिसमें प्रायः एक फिजीशियन और एक मनोवैज्ञानिक सहित एक टीम शामिल होती है। इस टीम में वाणी और भाषा विकृति विज्ञान या व्यावसायिक चिकित्सा जैसे अन्य विषय शामिल हो सकते हैं। मूल्यांकन में व्यक्ति के मानकीकृत अवलोकन, सीखने और संज्ञानात्मक क्षमताओं के आकलन तथा कई तरह की स्थितियों और चिकित्सा एवं विकासात्मक इतिहास में व्यवहार के संबन्ध में जानकारी एकत्र करने के लिए साक्षात्कार शामिल होना चाहिए।

हस्तक्षेप

एएसडी के लिए कई व्यवहारपरक उपचारों ने संज्ञानात्मक स्तर जैसे, आईक्यू, विशिष्ट कौशल (जैसे, शब्दावली, सामाजिक कौशल और संयुक्त ध्यान), व्यवहार संबंधी चुनौतियों और मनोदशा को बदलने में प्रभावशीलता दर्शाई है। हालांकि, विभिन्न उपचारों की तुलना करने वाला कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। व्यवहार-संबंधी मुद्दों को कम करने और मूड में सुधार करने के लिए दवाएं दर्शाई गई हैं। एएसडी के मुख्य लक्षणों को बदलने वाले उपचार खोजने में समाज का बहुत हित है। सबसे अच्छी तरह से स्थापित चिकित्सा में अनुप्रयुक्त व्यवहार विश्लेषणात्मक तकनीकों को शामिल किया गया है। ये अधिक प्राकृतिक हैं, क्रम में विकासात्मक हैं और अनुकूलनीय होने के लिए विकसित हुई हैं। माता-पिता की मध्यस्थता वाले उपचार, समूह मॉडल और संयुक्त (चिकित्सा और व्यवहारपरक) उपचार हाल ही में विकसित किए गए हैं और उनका परीक्षण किया गया है। परिवार को इलाज में शामिल करने से लगातार बेहतर परिणाम सामने आएं हैं।

माता-पिता की जिम्मेदारियां

पेशेवर सलाह लेना: यदि माता-पिता यह नोटिस करते हैं कि उनके बच्चे विशिष्ट विकासात्मक सोपानों को पूरा नहीं करते हैं, या करते हैं पर बाद में उन्हें खो देते हैं जैसे 6 महीने का होने तक मुस्कराना, 9 महीने तक चेहरे के भाव या आवाज़ की नकल करना, 12 महीने तक कूजन करना या बुदबुदाना, 14 महीने तक शारीरिक इशारे (उंगली उठाकर या हाथ लहराकर) करना, 16 महीने तक एकल शब्द बोलना, 24 महीने तक दो शब्दों या अधिक के वाक्यांशों का इस्तेमाल करना और 18 महीने तक खेलना, बहाने बनाना या विश्वास दिलाना तो उन माता-पिता को इस मुद्दे से बचने या इसकी अनदेखी किए बिना फौरन पेशेवर सलाह लेनी चाहिए क्योंकि ऑटिज्म थेरेपी की कामयाबी के लिए शुरुआती हस्तक्षेप बहुत महत्वपूर्ण है।
चिकित्सीय नजरिया: माता-पिता को अपने बच्चों के लिए एक सहायक और सशक्त भूमिका निभानी चाहिए। उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनका दृष्‘िटकोण और उपचार में, दोनों जगह एक समान है। उन्हें अपने बच्चे की दूसरे बच्चों से तुलना करने के बजाय अपने बच्चे की प्रगति पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
सकारात्मक व्यवहार को मजबूत करना: नकारात्मक व्यवहार पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, जब बच्चे कुछ सकारात्मक करें, तो उन्हें लगातार समर्थन देना, सकारात्मक प्रशंसा या इनाम देना जरूरी है। यह काम हर हाल में माता-पिता द्वारा नियमित रूप से किया जाना चाहिए।

समाज की जिम्मेदारियां

मनुष्य सामाजिक प्राणी हैं और लोगों को सभी के लिए करुणा, सहायता और प्रेम रखना चाहिए। यह मामला तो परंपरागत होना चाहिए था लेकिन जो बात हम सिद्धांत के तौर पर करते हैं, वास्तविक दुनिया उससे बहुत अलग है। मानव समाज ऐसे लोगों को बाहर निकाल देता है या उनका परित्याग कर देता है, जिनकी चिकित्सकीय स्थितियां या तो स्पष्ट न हों या फिर जटिल हों। किसी व्यक्ति को उसके निकटतम समाज द्वारा किस हद तक दूर किया जा रहा है, यह उस समाज की संरचना और चरित्र पर निर्भर करता है। लोग अक्सर किसी व्यक्ति की उपेक्षा इसलिए करते हैं क्योंकि वे अज्ञानता, निरक्षरता, रूढ़िवादी दृष्टिकोण, सामान्यीकरण या वर्गीकरण तथा मिथकों की व्यापकता आदि के कारण अपने हालात से संबद्ध नहीं हो पाते।
हमें, एक समाज के रूप में, ऑटिज्म या आत्मलीनता की रोकथाम और इसका जल्दी पता लगने की दिशा में काम करना चाहिए। ऑटिज्म से पीड़ित लोगों को मुफ्त शिक्षा, रोजगार और बेरोजगारी भत्ता देने जैसे कुछ कदमों के बारे में अक्सर सोचा जाता है। हमें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि ऑटिज्म से पीड़ित लोगों को सहायता और उपकरण उपलब्ध कराए जाएं या नहीं। ऑटिज्मग्रस्त/आत्मलीन व्यक्तियों के पुनर्वास के लिए गैर-सरकारी संगठनों को वित्तीय सहायता जैसी सामाजिक सुरक्षा भी प्रदान की जानी चाहिए।
ऑटिज्म यानी आत्मलीनता के रोगी तो बहुत कम हैं, लेकिन इसके बारे में बात न करने वाले ढेरों हैं। हमें उन माता-पिता की सराहना करनी चाहिए जिन्होंने समझ लिया है कि आत्मलीनता असामान्य नहीं है। ऑटिज्म किसी व्यक्ति में विशेषज्ञता, कौशल, प्रतिभा और उच्चस्तरीय आईक्यू के विकास के साथ आता है। ऑटिस्टिक व्यक्ति अपने दिल और आत्मा को विभिन्न अद्भुत घटनाओं को समझने में लगाता है और उसमें उत्कृष्टता प्राप्त करता है, जो उसे सबसे ज्यादा पसंद है। ये लोग अक्सर चकित कर देने वाले विचारों, तरीकों और काम करने की विचित्र विधियों के साथ आगे आते हैं। ऑटिज्म को शुरुआती हस्तक्षेप और बेहतर समझ की जरूरत होती है ताकि यह उन्हें अधिक स्वतंत्र रूप से कार्य करने और एक पूर्ण जीवन जीने में मदद कर सके।

तथ्य

० डब्ल्यू,चओ के अनुसार, 160 में से लगभग एक बच्चे को एएसडी है।
० एएसडी सभी नस्लीय और जातीय समूहों में और हर सामाजिक आर्थिक स्थिति/स्तर पर होता है।
० लड़कियों की तुलना में लड़कों में एएसडी होने की संभावना लगभग चार गुना ज्यादा होती है।
० यदि किसी बच्चे के परिवार का निकटतम सदस्य (भाई, बहन या माता-पिता) ऑटिस्टिक हो तो उसके स्पेक्ट्रम पर होने की संभावना ज्यादा होती है लेकिन यह हमेशा परिवारों में नहीं चलता है।
० एएसडी वाले लगभग 10 फीसद बच्चों में डाउन सिंड्रोम और फ्रैगाइल एक्स सिंड्रोम जैसे आनुवंशिक विकार होते हैं।

० डेनमार्क में हुए एक अध्ययन में एएसडी और माता-पिता की बड़ी उम्र के बीच एक लिंक पाया गया।
० गर्भावस्था से पहले डॉक्टरों द्वारा जिन महिलाओं को ओपिओइड वाली दवा दी जाती है, उनमें एएसडी वाले बच्चे होने की ज्यादा संभावना होती है।

लेखक कंप्यूटर साइंस एवं इंजीनियरिंग में एम. टेक, क्लिनिकल साइकॉलजी में मास्टर्स, विज्ञान प्रचारक और विज्ञान प्रसार में आईएसटीआई पोर्टल के तहत परियोजना वैज्ञानिक हैं।

ईमेलः  subodh-vigyanprasar@gmail.com

 

साभार https://vigyanprasar.gov.in/hindi/wp-content/uploads/2017/07/dream-april2022-hin.pdf

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