आचार्य मदन गोपाल वाजपेयी
नयी दिल्ली। खीरा-ककड़ी पेट और पाचन के लिए अच्छा नहीं…कुछ सालों से सलाद या खीरा-ककड़ी खाना बहुत चलन में है पर सदैव ध्यान रखें कि यह न तो रोगियों के लिए हितकर है और न स्वास्थ्य के लिए। यदि स्वस्थ व्यक्ति भी यदि खीरा-ककड़ी रोज और अधिक मात्रा में सेवन करता है तो पेट के रोग और यूरिक एसिड जैसी बीमारी पाने को तैयार रहे। यदि रोगी व्यक्ति इसका सेवन रोज-रोज करता है तो और अधिक बीमार होना तय है। शास्त्र कहता है-
सर्वाकर्कटिकागुर्वीदुर्जरावातरक्तदा।
अग्निमांद्यकरी प्रोक्ता ऋषिभि: शास्त्रकोविदै:।।
अर्थात् सभी प्रकार की ककड़ी स्वभाव से भारी, पचने में कठिन, शरीर में वातरक्त (यूरिक एसिड) को पैदा करती है, यह पाचकाग्नि को दुर्बल करती है, यह ज्ञान ऋषियों और शास्त्रज्ञों द्वारा बताया गया है। यही स्थिति खीरा की भी है-
स्यात्त्रपुषीफलं रुच्यं मधुरं शिशिरं गुरु।
भ्रमपित्तविदाहार्त्तिवान्ति हृद्बहुमूत्रदम्।। (नि.र.)
अर्थात् खीरा रुचिकर तो लगता है किन्तु यह मधुर है इसकी प्रकृति ठण्डी और पचने में भारी है। इसमें बहुमूत्र करने का गुण है इसलिए मधुमेह, ब्लडप्रेशर और मोटापा ग्रस्तजनों को सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि वैसे भी मधुमेह रोगी में बहुमूत्रता रहती है और ब्लडप्रेशर के रोगी जब अंग्रेजी दवा खाते हैं तो मूत्र की मात्रा बढ़ जाती है। यदि चक्कर आ रहे हैं, पित्त बढ़ा है, शरीर में दाह वेदना है, वमन आ रहा है तो खीरे को औषधि के रूप में ले सकते हैं। इसके पीछे दर्शन यह है कि खीरा, ककड़ी जल और पृथ्वी महाभूत प्रधान द्रव्य है जो शरीर में इन्हीं तत्त्वों को बढ़ाते हैं, ये तत्त्व शरीर में रसधातु को बढ़ाते हैं, पाचकाग्नि को कमजोर करते हैं, शरीर में सूजन, मोटापा, भारीपन, आलस्य, तमोदोष, निद्रा प्रमाद आदि को बढ़ाते हैं।
आचार्य चरक ने बताया है कि-
त्रपुसैर्वारुकं स्वादु गुरुविष्टम्भि शीतलम्।
मुख प्रियं च रुक्षं च मूत्रलं त्रपुसं त्वति।।
च.सू. २७/११०-१११।।
खीरा और ककड़ी ये रस के मधुर, पचने में भारी पेट को बाँधने वाले, कब्जकारक, वायु पैदा करने वाले तथा प्रकृति से ठण्डे होते हैं। खाने में प्रिय और रुक्ष होते हैं। खीरा मूत्र भी अधिक लाता है।
आप शास्त्र को देखें तो स्पष्ट है कि खीरा, ककड़ी विष्टम्भकारक अर्थात् कब्जकारक, मलरोधक है। विष्टम्भ का अर्थ रुकावट, बाधा, पेट फूलना होता है। सदैव ध्यान रखें कि खीरा-ककड़ी पचने में भारी होती है इसीलिए इनके खाने के बाद काफी देर तक डकार आती रहती है। इसकी प्रकृति भी ठंडी होती है। यही कारण है कि प्राचीन काल में खीरा को नींबू रस, सेंधा नमक और कालीमिर्च से युक्त कर खाते थे और वह भी ऋतु विशेष में। किन्तु आज तो सलाद के नाम पर क्या दुर्दशा कर रखी है पेट की और आहार प्रणाली की।
विचार करें कि जब शीतल, भारी और विष्टम्भी गुण युक्त कोई वस्तु पेट में रोज-रोज जायेगी तो पेट की पाचनकाग्नि की क्या स्थिति पैदा करेगी। यही कारण है कि आज पेट के सर्वाधिक रोग बढ़ रहे हैं जब पेट का इलाज शुरू कराते हैं तो डॉक्टर खाने के पहले कोई दवा जोड़ ही देते हैं। अब रोग के साथ-साथ इस दवा का भी साइड इफेक्ट झेलिए। कुछ दिन बाद नए-नए रोग या जीवन व्यापी रोग, शुगर, मोटापा, थायराइड या ब्लडप्रेशर आ जाते हैं।
कुछ लोग अज्ञानतावश खीरा को हल्का मानकर वजन घटाने या कोलेस्ट्राल घटाने के लिए सलाद के रूप में खाते हैं पर उनका भी पांसा उल्टा ही पड़ता है। सलाद खाकर कोई भी आज तक मोटापे को नहीं कम कर पाया बल्कि खीरे के शीतल, गुरु और विष्टम्भी गुण नए रोग अवश्य दे जाते हैं। इसलिए खान-पान में सदैव शास्त्रीय नियमों को ही ग्रहण करें।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भोजन के तत्त्वों में केवल कैलोरी का विचार कर खाने की सलाह दे देता है जबकि वैदिक चिकित्सा विज्ञान बहुत सूक्ष्मता से चिंतन करता है। ये अपनी वैदिक चिकित्सा विज्ञान की गहराइयाँ हैं, जहाँ तक अभी भी आधुनिक चिकित्सा विज्ञान नहीं पहुँच सका। यदि हम इन गहराइयों को समझकर आत्मसात करेंगे तथा अपनों को आत्मसात करायेंगे तो सुखमय वातावरण अवश्य बनेगा।
इस विषय को इस तरह भी समझना चाहिए कि यदि खीरा, ककड़ी सलाद सेहत के लिए आरोग्यकर होता तो जिस समय कोई किडनी रोगी हार्ट रोग या लीवर क्षति के कारण रुग्ण हो जाता है, उस समय एलोपैथ डॉक्टर क्यों नहीं सलाद या खीरा-ककड़ी खाने पर जोर देते। कोलाइटिस या आईबीएस में क्या नहीं सलाद खिलाते? हमारे देश का दुर्भाग्य है रहने वाला व्यक्ति भारत की जलवायु का तो डाइट नियमावली लागू की जाती है ब्रिटेन की।
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