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डिजिटल चिकित्सा संसाधनों के विस्तार का आह्वान

डिजिटल चिकित्सा संसाधनों के विस्तार का आह्वान

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) के अंतर्गत राष्ट्रीय चिकित्सा पुस्तकालय (NML) ने यहां राष्ट्रीय चिकित्सा पुस्तकालय में ईआरएमईडी कंसोर्टियम पर पांचवें एक दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण-सह-सम्मेलन का आयोजन किया। सम्मेलन का विषय था “डिजिटल स्वास्थ्य संसाधन: पुस्तकालयों के माध्यम से पहुंच को पुनर्परिभाषित करना” जिसमें स्वास्थ्य सेवा वितरण, चिकित्सा शिक्षा और प्रमाण-आधारित नैदानिक ​​अभ्यास को सुदृढ़ करने में डिजिटल ज्ञान संसाधनों के बढ़ते महत्व का उल्लेख किया गया।

93 मेडिकल कॉलेजों में सुविधा

स्वास्थ्य सचिव श्रीमती पुण्य सलीला श्रीवास्तव ने ज्ञान और सूचना तक पहुंच को सुगम बनाने तथा चिकित्सा शिक्षा, अनुसंधान और स्वास्थ्य सेवा वितरण की नींव को मजबूत करने में राष्ट्रीय चिकित्सा पुस्तकालय (एनएमएल) की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने एनएमएल नेटवर्क के 93 मेडिकल कॉलेजों तक विस्तार का उल्लेख किया और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा साहित्य और डिजिटल शिक्षण संसाधनों तक समान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए देश भर के सभी मेडिकल कॉलेजों, विशेष रूप से कम सुविधा प्राप्त क्षेत्रों के कॉलेजों तक इसकी पहुंच बढ़ाने की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने चिकित्सा क्षेत्र में निरंतर सीखने और पेशेवर विकास को अपरिहार्य बताते हुए कहा कि स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र तेजी से विकसित हो रहा है, नई बीमारियों की पहचान हो रही है, नवीन उपचार पद्धतियां सामने आ रही हैं और नैदानिक ​​पद्धतियां लगातार उन्नत हो रही हैं।

शोध की क्षमता बढ़े

उन्होंने जोर दिया कि डिजिटल स्वास्थ्य संसाधन केवल सूचना प्राप्त करने के साधन मात्र नहीं हैं, बल्कि देश में एक सशक्त अनुसंधान संस्कृति को बढ़ावा देने वाले महत्वपूर्ण कारक भी हैं। उन्होंने भारत अन्यत्र किए गए शोधों से लाभ उठा सकता है लेकिन अपनी स्वयं की शोध क्षमताओं और सोच को विकसित किए बिना भारत की व्यापक आकांक्षाओं को साकार नहीं किया जा सकता। शोध की सोच विकसित करने के लिए डिजिटल स्वास्थ्य संसाधनों तक पहुंच अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने इस संदर्भ में विद्वानों के प्रकाशनों तक पहुंच बढ़ाने, प्रमाण-आधारित शिक्षा को सुगम बनाने और शोध एवं नवाचार के लिए अनुकूल वातावरण बनाने में ‘वन नेशन वन सब्सक्रिप्शन’ पहल और ईआरएमडी कंसोर्टियम की पूरक भूमिका का उल्लेख किया। उन्होंने राष्ट्रीय चिकित्सा पुस्तकालय को एक विरासत संस्थान बताया, जिस पर ज्ञान के द्वार के रूप में कार्य करने और विकसित भारत की परिकल्पना में सार्थक योगदान देने की जिम्मेदारी है।

रोडमैप विकसित करने का आह्वान

श्रीमती श्रीवास्तव ने राष्ट्रीय चिकित्सा पुस्तकालय से स्वास्थ्य शिक्षा, अनुसंधान और व्यावसायिक विकास में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका का पता लगाने सहित डिजिटल स्वास्थ्य संसाधनों तक पहुंच को मजबूत करने के लिए एक व्यापक रोडमैप विकसित करने का आह्वान किया। उन्होंने ज्ञान के आदान-प्रदान और संस्थानों में बेहतर चिकित्सा पुस्तकालय प्रथाओं को अपनाने को सुगम बनाकर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मार्गदर्शन और समर्थन प्रदान करने के महत्व पर बल दिया। उन्होंने प्रभावी मॉडल की पहचान करने, सर्वोत्तम विधियों को साझा करने और देश भर में डिजिटल शैक्षिक संसाधनों की सुलभता और उपयोग में सुधार करने के लिए लक्षित सेमिनार और व्यावसायिक कार्यक्रमों के आयोजन को प्रोत्साहित किया।

ज्ञान साझा करने की भावना हो

मंत्रालय की अतिरिक्त सचिव डॉ. (सुश्री) विनोद कोटवाल ने ज्ञान की अनूठी प्रकृति का उल्लेख करते हुए कहा कि जहां भौतिक संपदा खर्च करने पर घटती है, वहीं ज्ञान साझा करने पर बढ़ता है। उन्होंने कहा कि पुस्तकालय ज्ञान साझा करने की इसी भावना पर आधारित हैं और सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा एवं शैक्षिक सामग्री को अधिक सुलभ बनाने के लिए डिजिटल संसाधनों के उपयोग के महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहा कि एक मेडिकल कॉलेज के तीन आवश्यक स्तंभ हैं: संकाय, अवसंरचना और ज्ञान संसाधन, जिनमें पुस्तकें, पत्रिकाएं और अन्य विद्वतापूर्ण सामग्री शामिल हैं, जो चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक (डीजीएचएस) डॉ. लवनीश जी. कृष्णा ने डिजिटल युग में पुस्तकालयों की बदलती भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि वे लोगों के ज्ञान प्राप्त करने के भौतिक स्थानों से डिजिटल प्लेटफार्मों में परिवर्तित हो रहे हैं जो ज्ञान को सीधे उपयोगकर्ताओं तक पहुंचाते हैं।

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