नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। कैंसर की दवा की कीमत घटाने की केंद्र सरकार तैयारी कर रही है। ऐसा हुआ तो मरीजों को काफी राहत मिलेगी। दवा की कीमतों को लेकर चल रहे विवाद के कारणों का खुलासा करते हुए ‘स्वस्थ भारत‘ के चेयरमैन आशुतोष कुमार सिंह ने कहा है कि सारा खेल MRP का ही है। इस मसले पर उनकी टिप्पणी इस प्रकार है—
DPCO 2013 की समीक्षा हो
सारा खेल MRP का है। यह बात मैं 2010 से कह रहा हूँ। यदि MRP को कंट्रोल कर लिया गया तो बहुत हद तक देश में बढ़ रही अमीरी-गरीबी की खाई को पाटा जा सकता है। इस जानबूझकर महंगी की गईं दवाइयों ने करोड़ो लोगों को या तो गरीबी रेखा के नीचे धकेल दिया है या उन्हें गरीबी रेखा से उबरने में सबसे बड़ी बाधक बनी है। सरकार इस दिशा में सक्रिय दिख रही है, लेकिन इससे काम नहीं बनेगा। जरूरत है, ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर DPCO 2013 को रिव्यू करना जिसने बाजार में कॉस्ट ऑफ प्रोडक्शन एवं MRP के बीच 1000 से 3000 प्रतिशत तक मार्जिन लिक्विडिटी रहने के बावजूद बाजार आधारित मूल्य निर्धारण नीति को अंगीकार किया। जबकि डीपीसीओ 1995 में MRP कॉस्ट ऑफ प्रोडक्शन से अधिकतम 100 फीसद ही रखने का प्रावधान था।
NPPA को चिंता नहीं
उन्होंने कहा कि दवाइयों के दाम को लेकर बहुत लोचा है। न सरकार के पास इसको समझने का समय है और न ही NPPA को इसको लेकर बहुत गंभीर चिंता है। अभी तक NPPA दवाइयों में लूट को लीगल जामा पहनाने का काम करती रही है। 2014 के बाद भी इस संस्था के कामकाज में कोई खास बदलाव आया हो, मुझे नहीं दिखता। सरकारी विज्ञप्ति जो आई है, इतने से वास्तव में कुछ नहीं होने वाला है। यह ऊंट के मुंह में जीरा का फौरन मात्र है। बाकी मेडिकल से जुड़े साथी बताएं आखिर इस मर्ज़ की दवा क्या है?
सरकार की बात
1. कैंसर की दवाओं के लिए मूल्य संरक्षण
सरकार ने गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं की आपूर्ति और बिक्री में लिए जाने वाले मार्जिन की सीमा तय करने को मंजूरी दे दी है। यह मार्जिन अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के 30% तक सीमित होगा। इस उपाय से दवाओं की कीमतों में 70% तक की कमी आने की उम्मीद है और कैंसर रोगियों को सालाना 2,500 करोड़ रुपये बचाने में मदद मिलेगी, जिससे वे अपनी जेब से भुगतान करने वाली राशि को काफी कम कर देंगे। शेड्यूल्ड लिस्ट में शामिल कैंसर की जरूरी दवाओं पर सरकार द्वारा तय अधिकतम कीमतों के कड़े नियम पहले से ही लागू हैं। नए फैसले के तहत कैंसर की उन दवाओं (जो ‘नॉन-शेड्यूल्ड’ या लिस्ट से बाहर हैं) के लिए भी कीमत की सुरक्षा बढ़ाई गई है; इसके लिए मरीजों तक पहुंचने से पहले उन पर जोड़े जाने वाले मार्जिन को सीमित किया गया है। स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (डीजीएचएस) के तहत एक विशेषज्ञ समिति कवर की जाने वाली दवाओं की सूची को अंतिम रूप देगी। इसके बाद राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) फैसला लेगी और नोटिफिकेशन जारी करेगी।
2. कैंसर के इलाज का खर्च कम करना
भारत में कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं; यहां प्रति एक लाख आबादी में लगभग 60 लोग कैंसर से प्रभावित हैं। इलाज से मरीजों और उनके परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है, जिन्हें अक्सर अपनी जेब से बड़ी रकम चुकानी पड़ती है। एनपीपीए के मार्केट डेटा के विश्लेषण से पता चला है कि नॉन-शेड्यूल्ड एंटी-कैंसर दवाओं पर औसतन लगभग 170% की बढ़ोतरी होती है, जो कुछ मामलों में 700% या उससे भी अधिक हो सकती है। आसान शब्दों में कहें तो मरीज तक पहुंचने से पहले सप्लाई चेन से गुजरते हुए दवा की कीमत तेजी से बढ़ती है। दवा रिटेल फार्मेसी, हॉस्पिटल फार्मेसी या ऑनलाइन फार्मेसी में से कहां से खरीदी जा रही है, इसके आधार पर भी कीमतों में काफी अंतर होता है। महाराष्ट्र, राजस्थान और कर्नाटक समेत राज्य के अधिकारियों ने मरीजों और सिविल सोसायटी के साथ मिलकर दवाओं की अत्यधिक कीमतों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। इन चिंताओं को सार्वजनिक मंचों पर भी उठाया गया है, खासकर उस बड़े अंतर को लेकर जो बिक्री के लिए दवाएं खरीदने की कीमत और ग्राहकों से ली जाने वाली एमआरपी के बीच होता है। खासकर कैंसर की महंगी दवाओं पर इतना अधिक मार्जिन मरीजों के इलाज का खर्च काफी बढ़ा देता है। नई सीमा से अधिक मुनाफाखोरी पर रोक लगेगी, बाजार में अनुचित मूल्य-निर्धारण के तौर-तरीकों से निपटा जा सकेगा और मरीजों के लिए उचित कीमतें सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
3. राहत बढ़ती रहेगी
सरकार के पहले के हस्तक्षेप से पता चलता है कि इन मार्जिन को सीमित करने से मरीजों को कितनी बड़ी राहत मिल सकती है। फरवरी 2019 में सरकार के निर्देश पर एनपीपीए ने ‘ड्रग्स (प्राइसेस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013’ के पैराग्राफ 19 के तहत 42 चुनिंदा नॉन-शेड्यूल्ड एंटी-कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन की सीमा तय कर दी। उस फैसले से एमआरपी में 91% तक की कमी आई, जिससे 526 ब्रांड्स में सालाना 984 करोड़ रुपये की बचत हुई। इसने कैंसर के मरीजों पर आर्थिक बोझ को काफी कम किया और उनके जीवन को आसान बनाया। उस अनुभव के आधार पर और सप्लाई चेन में कीमतों से जुड़ी समस्याओं को दूर करते हुए सरकार ने अब व्यापक सीमा को मंजूरी दे दी है। 2,500 करोड़ रुपये की अनुमानित सालाना बचत से कैंसर का इलाज करा रहे मरीजों को और राहत मिलेगी।
4. उत्पादन और उपलब्धता
यह सुनिश्चित करने के लिए कि ये जीवन रक्षक दवाएं उपलब्ध रहें, गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं के निर्माताओं को अपने वर्तमान उत्पादन स्तर को बनाए रखने की आवश्यकता होगी। इस पहल में कैंसर-रोधी गैर-अनुसूचित दवाएं शामिल होंगी। इनमें ब्रांडेड और जेनेरिक, देश में बनी और आयातित तथा पेटेंट वाली और बिना पेटेंट वाली दवाएं शामिल हैं। इससे मरीजों को कम कीमतों का काफी फायदा मिलेगा और साथ ही उन्हें जरूरी दवाएं लगातार मिलती रहेंगी।
