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Ebola: कांगो में 220 की मौत, युगांडा में भी फैली बीमारी

Ebola: कांगो में 220 की मौत, युगांडा में भी फैली बीमारी

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। कांगो में फैले इबोला (Ebola) वायरस ने एक बार फिर दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार इस बीमारी से अब तक 900 से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हंं और 220 लोगों की मौत होने की आशंका है। हालात को गंभीर बताते हुए WHO इसे पहले ही अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर चुका है। WHO के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अधानोम घेब्रेयसस ने कहा कि स्वास्थ्य एजेंसियां तेजी से काम कर रही हैं, लेकिन बीमारी बहुत तेजी से फैल रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि यह महामारी कई महीनों तक चल सकती है।

इबोला: कहां से शुरू हुआ संक्रमण

यह इबोला प्रकोप सबसे पहले मई महीने में कांगो के उत्तर-पूर्वी इलाके इतुरी प्रांत में सामने आया था। यह इलाका लंबे समय से हिंसा और संघर्ष से प्रभावित है। यहां बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हैं और सोने की खानों में काम करने वाले मजदूर लगातार एक जगह से दूसरी जगह जाते रहते हैं। इसी कारण वायरस तेजी से फैलने लगा। दयानिधि की रिपोर्ट के मुताबिक फिलहाल सबसे ज्यादा मामले इतुरी और नॉर्थ किवू प्रांत में सामने आए हैं। इसके अलावा साउथ किवू में भी एक मौत की पुष्टि हुई है। कांगो के पड़ोसी देश युगांडा में भी संक्रमण पहुंच चुका है। वहां सात मामलों की पुष्टि हुई है और एक व्यक्ति की मौत हो चुकी है। अफ्रीका में भी इबोला के 600 संदिग्ध मामले आ चुके हैं और 139 मौतों की जानकारी है। इस बार फैल रहा इबोला वायरस सामान्य इबोला से अलग है। इसका नाम बंडीबुग्यो स्ट्रेन है। यह बहुत दुर्लभ प्रकार का वायरस माना जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इसके लिए जांच की सुविधाएं सीमित हैं और अभी तक इसका कोई विशेष टीका या दवा उपलब्ध नहीं है। यही कारण है कि इसे रोकना मुश्किल हो रहा है। शुरुआत में डॉक्टर और स्वास्थ्य अधिकारी इस वायरस की सही पहचान नहीं कर पाए। जांच में देरी होने के कारण बीमारी तेजी से फैल गई। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि शुरुआत में वायरस की पहचान हो जाती, तो हालात कुछ बेहतर हो सकते थे।

इबोला: ये रहे लक्षण

इबोला वायरस दुनिया की सबसे खतरनाक बीमारियों में से एक माना जाता है। यह संक्रमित व्यक्ति के शरीर के तरल पदार्थों के संपर्क में आने से फैलता है। इसके लक्षणों में तेज बुखार, कमजोरी, उल्टी, दस्त और शरीर के अंदर या बाहर रक्तस्राव शामिल हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इबोला से संक्रमित 25 प्रतिशत से लेकर 90 प्रतिशत तक लोगों की मौत हो सकती है। यही कारण है कि स्वास्थ्य एजेंसियां इस बीमारी को लेकर बेहद सतर्क रहती हैं।

इबोला: वैक्सीन के प्रयास

दुनिया में पहले से इबोला के लिए एक टीका मौजूद है, जिसका नाम एरवेबो है। लेकिन यह टीका इबोला के जायरे स्ट्रेन के लिए बनाया गया था। मौजूदा प्रकोप बंडीबुग्यो स्ट्रेन के कारण फैला है, इसलिए यह साफ नहीं है कि मौजूदा टीका इस वायरस पर कितना असर करेगा। WHO ने कहा कि इस टीके के इस्तेमाल पर विचार किया जा रहा है, लेकिन इसके प्रभाव और सुरक्षा को लेकर अभी पर्याप्त जानकारी नहीं है। कई वैज्ञानिकों का मानना है कि गलत फैसला लेने से जोखिम बढ़ सकता है। अब वैज्ञानिक बंडीबुग्यो स्ट्रेन के लिए नई वैक्सीन बनाने में जुट गए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह नई वैक्सीन उसी तकनीक पर आधारित होगी, जिस पर पहले वाला एरवेबो टीका तैयार किया गया था। वैज्ञानिकों ने बताया कि जानवरों पर किए गए परीक्षणों में नई वैक्सीन के अच्छे परिणाम मिले हैं। एक खुराक देने के बाद जानवर पूरी तरह सुरक्षित रहे और उनमें बीमारी के लक्षण तक नहीं दिखे। हालांकि इस वैक्सीन को आम लोगों तक पहुंचाने में अभी समय लगेगा। डब्ल्यूएचओ के वैज्ञानिकों का कहना है कि इंसानों के लिए सुरक्षित वैक्सीन तैयार करने और उसका परीक्षण करने में छह से नौ महीने लग सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रकोप दुनिया के लिए एक बड़ा सबक है। अक्सर स्वास्थ्य एजेंसियां उन्हीं बीमारियों पर ज्यादा ध्यान देती हैं, जो पहले बड़े स्तर पर फैल चुकी हों। दुर्लभ वायरसों के लिए पहले से तैयारी कम होती है। इसी कारण अचानक फैलने वाले ऐसे संक्रमण को रोकना मुश्किल हो जाता है। फिलहाल कांगो और युगांडा में स्वास्थ्य टीमें संक्रमित लोगों की पहचान करने, इलाज देने और संक्रमण रोकने में जुटी हैं। दुनिया की नजर अब इस बात पर है कि वैज्ञानिक कितनी जल्दी नई वैक्सीन और दवा तैयार कर पाते हैं।

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