नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। दिल्ली के रेजिडेंट इंस्टीट्यूट ऑफ नेफ्रोलॉजी एंड यूरोलॉजी (AINU) में 50 साल की उम्र की एक महिला को लोअर यूनेट्रल ऑब्स्ट्रक्शन के लिए भर्ती किया गया था। यह उस नली में किडनी को ब्लैडर से रोकती है। उसे अलग करके फ्रेम ब्लैडर से जोड़ना जरूरी था। डॉक्टर की टीम ने जांच की, योजना बनाई और उन्हें भर्ती किया। फिर वह चीन के वुहान चले गए जहां से उन्होंने रोबोटिक सर्जरी (Robotic surgery) की। 3000 किलोमीटर की दूरी से। यह 18 मई को हुआ। चीन के टोंगजी अस्पताल से यूरोलॉजिस्ट डॉ. सईद मोहम्मद गौस ने रोबोटिक हाथों को महिला के पेट के अंदर इस्तेमाल किया। वह स्क्रीन पर अंदर की बड़ी और रियल-टाइम 3डी तस्वीरें देख रहे थे। इस प्रक्रिया में 90 मिनट का समय लगा। अगले दिन महिला की जांच कर उन्हें छुट्टी दे दी गई। यह प्रक्रिया इंटरनेशनल हेपाटो-पैंटोक्रिया-बिलियरी एसोसिएशन के चीनी चैप्टर की 10वीं कांग्रेस के दौरान 26 लाइव सर्जरी की श्रृंखला का हिस्सा थी। इनमें से पांच ऑपरेशन रियल-टाइम इंटरनेशनल टेली-सर्जिकल सहयोग के तहत किए गए। इनमें से ब्राजील, जॉर्जिया, ग्रीस, उज्बेकिस्तान और भारत के सर्जनों ने यूरोलॉजी, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल, हेपाटोबिलियरी और पैंक्रियाटिक सर्जरी में दूर से भाग लिया।
रोबोटिक सर्जरी: ब्रॉडबैंड कनेक्शन जरूरी
बाद में डॉ. गौस ने बताया कि रेजिडेंट के मरीज़ को लोअर यूट्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्शन था। यह उस नली के असेंबली पार्ट्स में स्ट्रक्चरल था जो किडनी को ब्लैडर से नॉकआउट है। उन्होंने बताया कि यूरेट्रिक री-इम्प्लांटेशन रोबोटिक तरीके से पहले किसी ने नहीं किया था। रोबोटिक सर्जरी तकनीक उस मॉडल पर काम करती है जिसे निर्माता मास्टर-स्लेव मॉडल कहते हैं। कन्सोल पर बैठे सहयोगियों के हाथों की हरकतें बड़े 3D मूवी के माध्यम से दिखता है। वे पिछले 15 साल से काम कर रहे हैं। डॉ. गौस ऐसा काम रोज करते हैं। इस बार का काम सिर्फ इतना था कि कॉन्सोल ऑपरेशन थिएटर से लगभग 3,000-4,000 किमी दूर रखा गया था। इसके लिए सबसे जरूरी चीज थी अच्छा और स्थिर ब्रॉडबैंड कनेक्शन, 5 g। इंटरनेट कनेक्टिविटी सबसे जरूरी है। सर्जरी तौमाई सैलून रोबोट का उपयोग करके की गई। यह रोबोटिक सर्जरी प्लेटफॉर्म चीनी कंपनी शंघाई माइक्रोपोर्ट मेडबॉट विकसित किया गया है।
रोबोटिक सर्जरी: खर्चीला काम
मालूम हो कि रोबोटिक सर्जरी अब आम बात हो गई है। भारत में हर साल लगभग 50 से 60 हजार रोबोट-सहायक सर्जरी की जाती हैं और 100 से अधिक रोबोट-सहायक सर्जरी काम कर रहे हैं। लेकिन लगभग 90 प्रतिशत प्रयोगशाला रोबोट निजी निजीकरण में हैं। AIIMS दिल्ली, PGI चंडीगढ़, SPGI लखनऊ, JIPMER पुडुचेरी और कुछ अन्य सरकारी अस्पतालों में इसका उपयोग बढ़ रहा है, फिर भी सरकारी क्षेत्रों में सिर्फ 10 प्रतिशत ऐसा सिस्टम हैं। इसकी वजह बड़ी लागत और खरीद से जुड़ी कठिनाइयाँ हैं। डॉ. गौस बताते हैं कि एक हाई-एंड सैलून मॉडल की कीमत लगभग 15 करोड़ रुपये है, जबकि एंट्री-लेवल मॉडल की कीमत लगभग 7.5 करोड़ रुपये है। इसके अलावा अस्पताल में रोबोटिक सिस्टम स्थापित करने के लिए बहुत बड़ा ढांचा चाहिए। अभी सिर्फ बड़े पैमाने पर बड़े पैमाने पर यह सुविधा है। शायद इसके अलावा छोटे पैमाने के ढांचे में भी आ जाए। लागत का अंदाज इसी से लगता है कि गॉलब्लैडर सर्जरी में 100 से 15,000 रुपये लगते हैं, वही रोबोटिक तरीके से करने पर लगभग 1 लाख रुपये अतिरिक्त खर्च हो सकता है।
