अजय वर्मा
आम आदमी के बजट का ऐक बड़ा हिस्सा हेल्थ पर खर्च हो जाता है। नियमित तो मामूली है लेकिन आकस्मिक खर्च ज्यादा। कई बार तो सारी जमापूंजी साफ हो जाती है। घर के जेवर तक। गंभीर बीमारी हो जाए तो जमीन तक गिरवी हो जाती है, खेत—पथार तक बिक जाते हैं। वजह है स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति सेवा भाव पर व्यवसाय का हावी हो जाना। कारण है सरकारी अस्पतालों की उपेक्षा, निजी अस्पतालों की भरमार और फार्मा कंपनियों के लालच की वजह से महंगी दवाओं का उत्पादन। बीमारी की स्थिति में मध्य और निम्न वर्ग तो पिस ही जाता है।
ऐसे में हेल्थ क्षेत्र में काम कर रहे संगठनों के दबाव पर जनऔषधि की धारणा विकसित हुई जिसके माध्यम से महंगी दवाओं का सस्ता वर्जन आने लगा। यानी जेनरिक दवाएं जिन्हें जनऔषधि केंद्रों के माध्यम से बेचना तय हुआ। पेटेंट समाप्त हो चुकी दवाओं के सस्ता होने का रास्ता साफ हुआ। सरकार के हस्तक्षेप से कंपनियां भी कम कीमत पर दवाओं का उत्पादन करने पर मजबूर हुई।
भारत का पहला जनऔषधि केंद्र दिल्ली में नवंबर 2008 में खुला। लेकिन शुरुआती दौर विफलताओं का रहा। एक तो इन केंद्रों की संख्या पर्याप्त नहीं थी। इसके प्रति जागरूकता का भी अभाव रहा। डॉक्टर भी इन दवाओं को प्रेसक्राइब करने से परहेज करते रहे क्योंकि फार्मा लॉबी पहले से ही हावी थी। तभी 2012 के अंत तक केवल 157 केंद्र ही खुल पाए थे, जिनमें से कई काम नहीं कर रहे थे।
2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के गठन के बाद इसका कायाकल्प हुआ। प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना (PMBJP) बनी। इसका मकसद रहा कि आम जनता को किफायती दामों पर गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाएं उपलब्ध हों। ये दवाएं ब्रांडेड दवाओं की तुलना में 50 से 80 फीसद तक कम कीमतों पर मिलती हैं, जिससे लोगों के स्वास्थ्य देखभाल पर होने वाले खर्च में भारी बचत होती है। ‘जन औषधि’ नाम ही बताता है कि यह सभी लोगों के लिए सस्ती और अच्छी दवाएँ उपलब्ध कराने की एक पहल है। जन—जन तक इसकी जानकारी देने के लिए जागरूकता अभियान चलाया गया। केंद्र खोलने के इच्छुक लोगों को सहायता दी गई। हर सरकारी—निजी अस्पतालों में इसका केंद्र अनिवार्य रूप से हो, ऐसी व्यवस्था की गई। जन औषधि केंद्रों पर लगभग 2000 से अधिक प्रकार की एलोपैथिक दवाएं उपलब्ध करायी गई। सामान्य उपयोग की आयुर्वेदिक दवाएं जैसे च्यवनप्राश और त्रिफला भी इन केंद्रों पर मिलने लगी। ग्लूकोमीटर और ऑक्सीमीटर जैसे 300 से अधिक प्रकार के सर्जिकल उत्पाद मिलने लगे। न्यूट्रास्यूटिकल्स में प्रोटीन पाउडर, प्रोटीन बार, माल्ट-आधारित फूड सप्लीमेंट्स, सैनिटाइजर, मास्क, ₹1 में सैनिटरी नैपकिन तक। इन प्रयासों से आज देश भर में तकरीबन 17 हज़ार जन औषधि केंद्र संचालित हैं। अब सरकार ने 2027 तक 25,000 केंद्र खोलने का लक्ष्य निर्धारित किया है। अब यह लक्ष्य ही इसके लिए संकट का कारण बन सकता है क्योंकि उसके नए सर्कुलर में एक किलोमीटर की डिस्टेंस पॉलिसी को समाप्त करने की बात कही गई है। यानी एक किलोमीटर के भीतर कई केंद्र खुल सकते हैं। इससे ये केंद्र शहरों में तो कई हो जाएंगे पर पंचायत स्तर पर कम जबकि इसका लक्ष्य गरीबों तक पहुंच कर सस्ती दवा उपलब्ध कराना है।
