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जनऔषधि: जीरो डिस्टेंसिंग नीति को वापस लेने की मांग

जनऔषधि: जीरो डिस्टेंसिंग नीति को वापस लेने की मांग
‘स्वस्थ भारत’ ने जनऔषधि परियोजना के सीइओ को लिखा पत्र
यह नीति जनऔषधि की मूल धारणा के खिलाफ: जेनमैन आशुतोष

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। पिछले 10 सितंबर को प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना के सीइओ द्वारा जीरो डिस्टेंसिंग नीति को समर्थन देने वाला एक सर्कुलर जारी किया गया है। इसमें कहा गया है कि देश के मेट्रोसिटिज एवं 10 लाख से ऊपर जनसंख्या वाले शहरों में जनऔषधि केन्द्र खोलने के लिए किसी भी दूरी का कैप नहीं लगेगा। पहले यह एक किमी का था। इस सर्कुलर का विरोध देश भर के जनऔषधि संचालक कर रहे हैं। इस बीच इस विरोध का समर्थन जेनरिक दवाइयों के प्रचार-प्रसार के लिए देशव्यापी अभियान चलाने वाली संस्था स्वस्थ भारत ने किया है।

जनऔषधि: नकारात्मक असर पड़ेगा

जनऔषधि परियोजना के सीइओ को लिखे अपने पत्र में संस्था ने आग्रह किया है कि इस सर्कुलर को यथाशीघ्र हटाया जाए। संस्था के चेयरमैन आशुतोष कुमार सिंह ने इस पत्र में यह दलील दी है कि यह परिपत्र उस आश्वासन के विपरित है, जिसके तहत एक किमी की डिस्टेंस पॉलिसी लागू की गई थी। इसके दुष्परिणाम को रेखांकित करते हुए इस पत्र में श्री आशुतोष ने लिखा है कि, ‘पहले से सेवा भाव से काम कर रहे जनऔषधि संचालक हतोत्साहित होंगे, दूसरे नए जनऔषधि संचालक को भी उतना लाभ नहीं होगा, जितना सोचकर वे केन्द्र खोलेंगे, अंत में जनऔषधि केन्द्र खोलने की जगह सामान्य दवा दुकान खोलने के लिए सेवाभावी संचालक भी मजबूर होंगे, जो अंतत्वोगत्वा, प्रधानमंत्री जन औषधि परियोजना की सस्टनेबिलिटी को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा।’ जन औषधि की दुकानों को कम से कम पंचायत स्तर पर ले जाने की जरूरत है, लेकिन यह सर्कुलर शहरों में इसकी संख्या को बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त कर रहा है। यानी यह गरीबों के हक को शहरी लोगों की झोली में डालने के बराबर है।

जनऔषधि: लागत निकलने पर भी संकट

श्री सिंह ने बताया कि अगर एक किमी के अंदर दो चार या पांच केंद्र खुल गए तो इनकी सस्टेनेबिलिटी खतरे में रहेगी और एक समय आयेगा जब, सभी दुकानें बंद करने की नौबत आ जाएगी। चूंकि जनऔषधि दुकान चलाना एक सेवा का कार्य है और दवाइयों की कीमत बाजार से 90 फीसद तक कम मूल्य पर मिलती हैं अतः एक जनऔषधि संचालक को अपना खर्चा निकालने के लिए कम से कम 20 हजार रुपए प्रति दिन का सेल चाहिए। इस 20 हजार की सेल पर उन्हें 4 हजार की बचत होगी। इस बचत में उन्हें किराया, फार्मासिस्ट एवं सहायक की सैलरी भी देनी होती है। इस प्रकार यदि संचालक खुद फार्मासिस्ट नहीं है तो उसे महीने में मुश्किल से 20 हजार रुपए तक की बचत हो पाती है। जनऔषधि से 20 हजार रुपए की दवा का बाजार मूल्य कम से कम 1.5 लाख का होगा। और सामान्य दुकानदार इस सेल पर प्रतिदिन 20 से 25 हजार कमा लेता है।

जनऔषधि: पंचायतों तक ले जाएं

ऐसे में अगर ज्यादा दुकानें आसपास खुल गईं तो किसी को जीने लायक बचत नहीं होगी और अंतत: दुकानदार ईमानदारी से केंद्र चला रहे हैं, वे तो डूबेंगे ही, साथ ही नया संचालक भी आगे नहीं बढ़ पाएगा। नतीजा यह होगा कि दुकानें सिर्फ आंकड़े में ही रह जाएंगी। अतः शहरों में जनऔषधि केंद्रों की संख्या बढ़ाने पर जोर देने से अच्छा है, इसे पंचायतों तक ले जाया जाए ताकि वास्तविक लाभार्थियों को इसका लाभ मिल सके। गौरतलब है कि जेनमैन आशुतोष कुमार सिंह ने देश भर में जेनरिक दवाइयों के प्रचार-प्रसार करने के लिए दो बार भारत की यात्रा की है। उन्होंने जेनरिकोनॉमिक्स नाम से एक पुस्तक भी लिखी है।

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