स्वस्थ भारत मीडिया
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स्वास्थ्य पहली बार बना चुनावी मुद्दा

India is far away from the criterion of health

आशुतोष कुमार सिंह

स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार देखने को मिला कि प्रधानमंत्री वोट मांगने के लिए स्वास्थ्य के क्षेत्र में किए गए काम को गिनाते हुए नज़र आए। चुनाव के दौरान मुंबई में मतदाताओं को संबोधित करते हुए पीएम ने कहा था कि उनकी सरकार ने दवाइयों को 10 गुणा सस्ता किया है। इसके पूर्व भी प्रधानमंत्री ने 7 जून 2018 को वीडियो ब्रीज के माध्यम से ‘सेहत की बात पीएम के साथ’ कार्यक्रम के अंतर्गत उन लोगों से बातचीत की थी जिन्हें सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं से लाभ हुआ है। इस वर्ष 7 मार्च को राष्ट्रीय जनऔषधि दिवस की घोषणा करते हुए पीएम ने देश भर में खुले प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि केन्द्र संचालकों से वीडियो ब्रीज के माध्यम से बातचीत की। ऐसे में स्वास्थ्य एक राष्ट्रीय विषय बनकर उभरा है। जिन विषयों पर सरकारे मौन रहती थीं, उन विषयों पर सरकार खुलकर बोल रही है और लोगों को भी भागीदार बना रही है। बीते पांच वर्षों में स्वास्थ्य को लेकर सरकारी नजरिया तो बदला ही है साथ ही साथ लोगों का भी नजरिया बदला है।

स्वच्छ भारत अभियान ने स्वच्छता को लेकर लोगों के मन में सामाजिक चेतना जगाने का काम किया है। गांवों में भी अब कोई गंदगी फैलाता हुआ नज़र आता है कि छोटे-छोटे बच्चे इसका विरोध करते हुए नज़र आ रहे हैं। घर-घर शौचालय अभियान ने भी सामाजिक सुरक्षा को मजबूत किया है। खासतौर से शौच जाती महिलाओं के साथ हो रहे अभद्र व्यवहार में कमी आई है। चेतना इस स्तर तक फैली है कि जिनके घर में शौचालय नहीं हैं, उनके घर कोई पिता अपनी बेटी का हाथ देने को तैयार नहीं है।

1 फरवरी, 2018 का वित्त मंत्री अरूण जेटली का वह बजट भाषण मुझे आज भी याद है जिसमें वो कह रहे थे कि, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया’ हमारी सरकार का मार्गदर्शक सिद्धांत है। शायद यहीं कारण है कि आयुष्मान भारत योजना को लागू करने वाली नियामक संस्था नेशनल हेल्थ एजेंसी को नेशनल हेल्थ ऑथरिटी बना दिया गया। 30 अप्रैल 2018 से आयुष्मान भारत के अंतर्गत वेल इक्विप्ड आरोग्य केन्द्र खुलने शुरू हुए तो 23 सितंबर, 2018 को आदिवासी बहुल राज्य झारखंड की राजधानी रांची से पीएम ने घोषणा की, ‘मैं प्रधानमंत्री जनआरोग्य योजना बिरसामुंडा की धरती से सवा सौ करोड़ देशवासियों के चरणों में समर्पित करता हूं।’ और इस तरह  दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य सुरक्षा योजना का शुभारंभ हुआ। 10.74 करोड़ परिवारों को स्वास्थ्य सुरक्षा देने वाली इस योजना के अंतर्गत आज दिनांक 03.05.2019 तक 3.18 करोड़ से अधिक ई-कार्ड्स बन चुके हैं और 22.6 लाख लाभार्थी इसका लाभ उठा चुके हैं।

वैश्विक स्वास्थ्य जगत में भारत की आलोचना इस बात को लेकर होती रही है कि वह अपनी जीडीपी का महज 1.4 फीसद स्वास्थ्य सेवा पर खर्च करता है। वैश्विक औषत स्वास्थ्य खर्च जीडीपी का 5.4 फीसद है। हालांकि भारत का जोर इस बात पर ज्यादा है कि उसके नागरिक बीमार ही न पड़े। प्रिवेंटिव हेल्थ की दिशा में भारत ने उल्लेखनीय काम किया है। स्वच्छ भारत अभियान, स्वच्छ जल, पोषण अभियान जैसे मदों में हुए खर्च को भी स्वास्थ्य पर हो रहे खर्च के रूप में ही देखा जाना चाहिए। अंग्रेजी में एक कहावत है ‘प्रिवेंशन इज बेटर दैन क्योर’ अर्थात् किसी भी बीमारी को रोकने का सबसे उत्तम उपाय बचाव है। हालांकि  भारत सरकार ने 2025 तक सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को जीडीपी का 2.5 प्रतिशत तक बढाने का लक्ष्य रखा है।

स्वास्थ्य को लेकर पूर्ववर्ती सरकारें कितनी लापरवाह रही हैं इसकी बानगी है नई स्वास्थ्य नीति का वर्ष 2017 में लागू होना। इस नीति को लागू होने में 15 वर्ष लग गए। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के 31 पृष्ठों के अपने मसौदे में भारत के स्वास्थ्य एजेंडे को प्रस्तुत किया गया है। पृष्ठ 9 के अनु.3.2 में बचावात्वमक स्वास्थ्य नीति का उल्लेख है। अनु.4.2 में किशोर स्वास्थ्य को बेहतर करने की बात है। विद्यालयी पाठ्यक्रम में स्वास्थ्य और स्वच्छता को शामिल करने पर विचार हो रहा है। अनु.4.3 में कुपोषण एवं अन्य पोषक कमियों को दूर करने की बात कही गयी है। अनु. 4.7 में मानसिक स्वास्थ्य एवं अनु.5 में महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं से निजात पाने के उपायों पर सरकार ने अपनी स्थिति को स्पष्ट किया है।

इन तमाम उपायों के बावजूद यह नहीं कहा जा सकता है कि भारत में स्वास्थ्य की स्थित बहुत अच्छी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के अनुसार भारत में 6.8 फीसद महिलाएं किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन कर रही हैं जबकि 44.5 फीसद पुरूष वर्ग तंबाकू-सेवन का शिकार है। देश के 29.2 फीसद पुरुष एवं 1.5 फीसद महिलाएं शराब के लती हो चुके हैं। युवाओं में शराब पीने की लत से तकरीबन 60 प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं सामने आई हैं। 22.9 फीसद ऐसी महिलाएं हैं जिनका बीएमआई सामान्य से कम है। इसके अलावा शिशु मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर, जीवन प्रत्याशा, लिंगानुपात सहित तमाम स्वास्थ्य के मानकों पर अभी तीव्र गति से काम किए जाने की जरूरत है।

अंत में यह कहना चाहता हूं कि देश की सरकारे गर सच में लोगों को स्वस्थ देखना चाहती है तो उसे सबसे पहले प्रिवेंटिव हेल्थ के बारे में जागरूक करने के लिए प्राथमिक स्तर पर स्वास्थ्य को एक विषय के रूप में शामिल करना चाहिए साथ ही की जरूरत है वहीं आयुष्मान भारत योजना के दायरे को और विस्तारित किया जाए जिसमें आर्थिक रूप से कमजोर किसी भी जाति, धर्म, संप्रदाय के नागरिक का ईलाज हो सके। स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार में शामिल किए जाने की जरूरत है। और इसके लिए यह भी जरूरी है कि देश के राजनीतिक- महाभारत में स्वास्थ्य के विषय पर भी वाक-युद्ध हो।

लेखक परिचयः स्वास्थ्य विषयों पर 50 हजार किमी की भारत यात्रा करने वाले स्वस्थ भारत (न्यास) के चेयरमैन आशुतोष कुमार सिंह वर्तमान में समाचार-विचार पोर्टल स्वस्थ भारत डॉट इन से जुड़े हैं।

संपर्क- 9891228151, ईमेल- [email protected]

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