नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। दवा की कीमतों को लेकर बार—बार आवाज उठती रही है। मध्य और निम्न तबके के मरीज बीमार हो जाएं तो गिद्धों की नजर में चढ़ जाते हैं। दवा से लेकर मरहम—पट्टी तक उनकी जेब पर भारी पड़ता है। बावजूद आयुष्मान योजना के। अगर निजी अस्पताल में दाखिला हो गया तो उनके लिए भारी मुसीबत आ जाती है।
दवा : इतनी महंगी कि घर हो जाए
इस संबंध में फार्मासिस्ट राहुल वर्मा का सोशल मीडिया पर वायरल है। इसमें उन्होंने एक नामी निजी अस्पताल की घटना का जिक्र करते हुए बताया है कि लिपोसोमल ऐम्फ़ोटेरिनिसिन बी दवा एंटी माइक्रोबियल कैटेगरी का ड्रग है जो फंगस इन्फेक्शन के इलाज में प्रयुक्त होता है। इसके 50 mg ड्रग की कीमत 9700/- रुपये है। प्रतिदिन यह 300 mg की मात्रा में मरीज को दिया जाता है जिसकी कुल कीमत बनती है 58200 रुपये। लिपोसोमल ऐम्फ़ोटेरिनिसिन बी को लगातार 14 दिन दिया जाता है। तब पूरे कोर्स की क़ीमत होती है 8 लाख 14 हज़ार रुपये 800 रुपये। राजधानी के निजी अस्पतालों में यह दवा MRP कीमत पर बेची जाती है चूँकि दवा बहुत ही महंगी है, इतनी महंगी कि इतनी क़ीमत में एक छोटा घर आ जाए।
दवा : खुदरा मूल्य कुछ, बिक्री दर कुछ
उन्होंने लिखा है कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि इस दवा की खुदरा मूल्य केवल 1500 रुपये है। इस हिसाब से 14 दिनों के कोर्स की कुल लागत एक लाख 26 हज़ार रुपये बनती है। ताजा मामला MMI नारायणा अस्पताल का है जहाँ उक्त दवा को 48000/- की कीमत में बेचा गया। इस कीमत में सात दिन दवा ख़रीदने के बाद मरीज को होश आया और उसने मुझसे संपर्क किया। उन्हें सस्ते दर में दवा उपलब्ध हो गई है। हालांकि उन्होंने देरी की और 336000 रुपये गवां दिये। अधिकांश निजी अस्पतालों में दवाओं के नाम पर इस प्रकार की उगाही आम बात है। इलाज और सर्जरी से ज़्यादा दवाइयों का बिल थमाया जाता है। उन्होंने अपील की है कि जागरूक बनिए, अपने नजदीकी फार्मासिस्ट से सलाह लीजिए और दवा पर होने वाले आर्थिक बोझ को कम कीजिए।
