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बिहारी छात्रों के दर्द पर भारी नीतीश की जिद

कोटा में फंसे बिहारी छात्रों की घर-वापसी की राह में  नीतीश  कुमार की जिद को रोड़ा बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार अजय वर्मा

बिहार के सीएम नीतीश कुमार राज्य से बाहर के प्रवासी नागरिकों, श्रमिकों और परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों को इस कोरोना संकट के वक्त भी सूबे में आने से मना कर रहे हैं। उनका साफ मानना है कि इससे न केवल लॉकडाउन की मर्यादा टूटेगी बल्कि संक्रमण भी बढ़ेगा। वे अपनी जिद पर लगातार कायम हैं। इस बावत पटना हाईकोर्ट में एक रिट पर भी ऐसी ही हलफनामा दिया है। 27 अप्रैल को पीएम के साथ वार्ता में भी उन्होंने इसे न केवल दुहराया बल्कि गेंद भी उन्हीं के पाले में फेंक दिया कि आप कहें तो…
सबसे अहम आजकल कोटा में फंसे बिहारी छात्रों का है। वहां पठन—पाठन ठप है, मेस बंद है, बाहर से मंगाकर खाने में रिस्क है और राजस्थान सरकार भी जाने की इजाजत देने को तैयार है। येन—केन पास हासिल कर एक एमएलए समेत कुछ लोग अपने बच्चे को वापस भी ले आये हैं। वहां बचे हुए बच्चे भी नीतीश से वापस बुलाने की रोज अपील कर रहे हैं। लेकिन पीएम नरेंद्र मोदी की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में सीएम नीतीश कुमार ने साफ कहा कि केंद्र नया निर्देश जारी करे तो छात्रों और श्रमिकों की वापसी संभव हो सकती है।
सच पूछिए तो बिहार से पलायन का भरोसेमंद रिकॉर्ड कहीं है ही नहीं। ये तो कोराना काल में पता चल रहा है कि कम से कम 40 लाख बिहारी देश के दूसरे राज्यों में है। यह आंकड़ा खुद नीतीश कुमार का है कि सरकार 15 लाख से अधिक लोगों के खाते में एक—एक हजार रुपए की सहायता राशि डाल चुकी है और 25 लाख के आवेदन निबटाये जा रहे हैं।
चलिए, इस जिद का कारण भी देखा जाए
बाहर से आने वाले कोरोना लायेंगे, यह इनका तर्क है। इस लिए जब—जब प्रवासी बिहारियों के आने की खबर फैलती है, सीमा बंद रखने के लिए वे डीएम को अलर्ट कर देते हैं जबकि अन्य राज्य अपने लोगों को आने दे रहे हैं। आप जांच कीजिए, कवारंटीन कीजिए फिर उनको घर तक जाने दें। ऐसा न कर वे सरकार की जिम्मेवारी से भाग रहे हैं। संसाधानों की कमी का रोना तो आम है लेकिन अपनी क्षमता भी तो उपयोग किया ही जा सकता है।
बहरहाल। बिहार में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं सो जाहिर है जो भी फैसले होंगे, इसी के मद्देनजर। माना जा रहा है कि सारी मानवता भूलकर नीतीश कुमार की जिद के पीछे भी यही वजह है। एनडीए का ताज नीतीश कुमार के ही सिर पहले ही पहनाया जा चुका है। चुनाव बाद के समीकरणों को लेकर कयास भी लगाए जाते रहे हैं। ऐसे में नीतीश कुमार की आक्रामक शैली और भाषा विपक्ष की जान पड़ती है। तय है कि चुनाव में घर वापसी का मुद्दा खूब उभरेगा और इसकी जवाबदेही सरकार की नाकामी के मत्थे ही जाएगी। यह भी तय होता लग रहा कि ऐसे लाखों की आबादी और उन परिवारों का उभरा गुस्सा वोट बनकर सरकार पर उतरने वाला है। पलायन रोकने की विफलता का ठीकरा भी मौजूदा सरकार के ही मत्थे फूटना है।

बिहार के 14 लाख से अधिक प्रवासियों को मिली  कोरोना काल में राहत

ऐसे में अपनी नाकामी का डंडा प्रधानमंत्री के लॉकडाउन की मर्यादाओं के नाम पर भाजपा के सिर फोड़ने की चुनावी रणनीति का यह जदयू का यह नया पैंतरा तो नहीं ? आखिर, विपक्षी दलों के साथ एकसुर में नए दिशा निर्देशों की मांग क्यों उठाई जा रही है? साफ है कि चुनावी गणित और संख्यात्मक अंकगणित हल करने में इस खराखरी आक्रामकता की बड़ी भूमिका सिद्ध होने वाली है। संभव है यह रुख इसी के लिए हो?
अभी भी बाहर फंसे बिहारी किसी न किसी उपाय से बाहर से रोजगार और पैसा खत्म हो जाने के कारण जान जोखिम में डालकर वापस आ ही रहे हैं। सूरत से लेकर बांद्रा तक प्रवासियों ने बगावत की। खास बात यह है कि यूपी समेत कुछ दूसरे राज्य अपने यहां के प्रवासियों की वापसी करा रहे हैं। कोटा से भी दूसरे राज्यों के छात्र लौट चुके हैं। बस आफत है तो बिहार के बच्चों पर।
पटना हाईकोर्ट ने भी सीएम की जिद पर अस्थाई मुहर लगाते हुए लाकडाउन के बाद ही सुनवाई की बात कह दी है। सीएम ने हर बच्चों को एक-एक हजार भेजने का भी ऐलान किया है।
अभी नीतीश कुमार भाजपा के साथ सरकार चला रहे हैं। ऐसे में वे घर वापसी और उससे होने वाली समस्या की ठीकरा भाजपा और केंद्र की सरकार पर थोपकर चुनावी वैतरणी पार करने की राजनीति में लगे हैं। फिलहाल हर सूबा संकट में है फिर भी अपने लोगों को कोई छोड़ नहीं रहा है।
तो क्या नीतीश की जिद चुनाव के मद्देनजर है? यह समय के गर्भ में है लेकिन बच्चों से लेकर प्रवासियों की पीड़ा किसी न किसी पर तो भारी पड़ेगी ही।

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