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भारत वाला कोरोना वैरिएंट अमेरिका में भी सक्रिय

भारत वाला कोरोना वैरिएंट अमेरिका में भी सक्रिय

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। कोरोना ने केवल एशियाई देशों बल्कि अमेरिका को भी परेशान कर दिया है। वहां न सिर्फ संक्रमण के मामले बढ़े हैं बल्कि हर सप्ताह 300 से ज्यादा लोगों की मौतें भी हो रही हैं। अमेरिका स्थित ड्यूक यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर में संक्रामक रोग प्रभाग के प्रोफेसर डॉ. टोनी मूडी कहते हैं कि हकीकत यह है कि कोरोना फिर से न सिर्फ फैल रहा है, बल्कि लोगों की जान भी ले रहा है।

कोरोना : WHO की निगरानी में

रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में जिस NB.1.8.1 वैरिएंट के कारण संक्रमण और मौत दोनों के मामले बढ़ रहे है, वही वैरिएंट भारत में भी फिलहाल सबसे ज्यादा सक्रिय देखा जा रहा है। वैसे इस वैरिएंट की प्रकृति और जोखिमों को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे वैरिएंट ऑफ मॉनिटरिंग के रूप में वर्गीकृत कर दिया है, अब तक इसे वैरिएंट ऑफ इंटरेस्ट के रूप में रखा गया था। वैरिएंट ऑफ मॉनिटरिंग का मतलब है कि अब वायरस के इस रूप को लेकर प्राथमिकता के आधार पर ध्यान देने और निगरानी की आवश्यकता है। एक्सपर्ट भले नए वेरिएंट को ज्यादा चिंताजनक नहीं मानें लेकिन यह डेल्टा जैसा खतरनाक भी हो सकता है। अमेरिका में बढ़ते मौत के मामलों को देखें तो ये सवाल लाजमी है।

कोरोना : अपडेटेड वैक्सीन का अभाव

सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार पिछले हफ्ते अमेरिका में 350 से अधिक लोगों की मौत हुई। हालांकि इसमें से ज्यादातर मौतें उन लोगों की देखी गई हैं, जो उच्च जोखिम वाले जैसे पहले से कोमोरबिडिटी के शिकार या फिर कमजोर इम्युनिटी वाले थे। डेटा के अनुसार अप्रैल तक यहां 18 वर्ष और उससे अधिक आयु के केवल 23 फीसद वयस्कों ने ही अपडेटेड कोविड-19 वैक्सीन ली है। बच्चों में ये आंकड़ा 13 प्रतिशत का है। वैक्सीनोलॉजिस्ट और एट्रिया रिसर्च इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. ग्रेगरी पोलैंड ने कोविड से संबंधित मौतों की संख्या में वृद्धि के प्रमुख कारण के रूप में वैक्सीनेशन न कराने, या फिर अपडेटेड वैक्सीन न लेने को प्रमुख माना है।

कोरोना : हाई रिस्क वालों को खतरा

गौरतलब है कि नए वैरिएंट्स में देखे गए परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए कई कंपनियों ने अपने वैक्सीन्स को अपडेट किया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह है कि सभी लोगों को कोरोना से बचाव के लिए फ्लू की तरह ही कोरोना के टीके भी लेते रहने चाहिए। 65 से अधिक आयु या फिर उच्च जोखिम वालों के लिए ये और भी आवश्यक है। एक्सपर्ट्स कहते हैं कि समय के साथ वैक्सीन से बनी प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होती जाती है। इसके अलावा वायरस में लगातार बदलाव आ रहे हैं। यही कारण है कि इस बार फिर से नया प्रकोप देखा जा रहा है। NB.1.8.1 वैरिएंट में वृद्धि के कारण एशिया, सिंगापुर और हांगकांग में कई गंभीर मामले सामने आ चुके हैं, जिसको देखते हुए सभी लोगों को अलर्ट रहने की आवश्यकता है।

कोरोना : बच्चों में ऑटोइम्यून रोगों का खतरा

कोविड वैक्सीन के शरीर पर असर को लेकर इजराइल के शोधकर्ताओं ने एक अध्ययन किया, जिसमें बच्चों की सेहत पर वैक्सीन के प्रभावों का आकलन किया गया है। वैज्ञानिकों की टीम ने पाया कि जिन बच्चों और किशोरों ने कम से कम कोविड की एक वैक्सीन ली, उनमें बिना टीकाकरण वाले बच्चों की तुलना में ऑटोइम्यून बीमारी विकसित होने का 23 फीसद अधिक जोखिम हो सकता है। इजराइली शोधकर्ताओं ने कहा कि ये अध्ययन नई ऑटोइम्यून बीमारियों के उभरने के बारे में बढ़ती चिंताओं को लेकर ध्यान आकृष्ट करता है।

कोरोना : न्यूरोलॉजिकल विकार संभव

पीडियाट्रिक रुमेटोलॉजी जर्नल में इस अध्ययन के निष्कर्षों को प्रकाशित किया गया है। शोध के दौरान 21 वर्ष की आयु तक के 4.93 लाख रोगियों के मेडिकल डेटा का उपयोग करते हुए कोविड महामारी के पहले और बाद में ऑटोइम्यून बीमारियों की घटनाओं का अध्ययन किया गया। ऑटोइम्यून बीमारियां वो स्थिति होती हैं, जिनमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली शरीर की रक्षा करने के बजाय स्वस्थ कोशिकाओं पर ही अटैक करना शुरू कर देती है। विशेषज्ञों ने बताया कि ऑटोइम्यून बीमारियों में कई तरह की स्थितियां शामिल हैं, जिनमें टाइप-1 डायबिटीज, रुमेटीइड आर्थराइटिस, सोरायसिस, सीलिएक डिजीज और गुइलेन-बैरे सिंड्रोम जैसे दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल विकार हो सकते हैं।

कोरोना : चिंता की वजह भी

हाल ही मॉलिक्यूलर सिस्टम्स बायोलॉजी में प्रकाशित एक अन्य रिपोर्ट में भी कोविड-19 वैक्सीन और इससे ऑटोइम्यून रोगों के बढ़ते मामलों को लेकर अलर्ट किया गया था। 19 जर्मन वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन में बताया गया कि एमआरएनए (mRNA COVID-19) वैक्सीन कुछ स्थितियों में आनुवंशिक संरचनाओं में दीर्घकालिक बदलाव करने वाली हो सकती हैं जिनके कारण इंफ्लेमेटरी रिस्पॉन्स बढ़ जाता है। ये कैंसर और ऑटोइम्यून विकारों की शुरुआत का कारण बन सकते हैं। एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों को कोविड-19 वैक्सीन दी गई थी, उनमें मल्टीपल प्रोइंफ्लेमेटरी साइटोकिन्स का स्तर बढ़ा हुआ था, ये वो प्रोटीन है जो प्रतिरक्षा प्रणाली को रेगुलेट करने में मदद करता है। ये साइटोकिन्स क्रॉनिक सूजन, प्रतिरक्षा प्रणली में समस्या और ऑटोइम्यून रोगों का बढ़ाने वाले हो सकते हैं।

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