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“मीडिया तथा कोरोना” पर लोहिया विश्वविद्यालय की आला पेशकश

Ram-manohar-lohiya-university webinar on corona

मेडिकल रिपोर्टिंग की पढ़ाई की जरूरत, समाचार एवं सूचना में अंतर एवं चीनी वायरस पर मीडिया की चुप्पी सहित तमाम बिंदुओं पर हुई चर्चा की रिपोर्ट लेकर आए हैं वरिष्ठ पत्रकार के.विक्रम राव

 

K.Vikram Rao, Sr.Journalist
K.Vikram Rao, Sr.Journalist,President at IFWJ – Indian Federation of Working Journalists

नई दिल्ली/एसबीएम

मीडिया तथा कोरोना पर एक वैश्विक वेबिनार (विचार-यज्ञ) अयोध्या-स्थित लोहिया विश्वविद्यालय ने आयोजित ( 7 मई ) किया था। वक्ताओं के भाष्य प्रखर थे। इससे मंथन का दायरा प्रशस्त हुआ। कुलपति डॉ. मनोज दीक्षित के स्वागत-भाषण ने आहुति का रोल निभाया। फिर वक्ताओं (भारतीय-विदेशी) की मेधा के तेवर अंत तक तेज ही रहे। इतना गमनीय जरूर था कि मीडिया मनीषियों की मीमांसा बेलौस थी। आखिर क्यों न हो? अकादमिक पण्डित और व्यवहारिक विशेषज्ञ भागीदार थे। मेरी गिला यह थी कि मीडिया शिक्षकों को इस महामारी की रोशनी में अपने अध्येताओं को मेडिकल रिपोर्टिंग भी पढ़ाया जाना चाहिए। हमें तो (इस्लामी पकिस्तान और कम्युनिस्ट चीन द्वारा हमले की वजह से) वार-रिपोर्टिंग, प्राकृतिक विपदाओं, संसदीय समीक्षाओं, दुर्घटनाओं आदि की रिपोर्टिंग विधाओं को पढ़ाया जाता रहा। अब सार्स, प्लेग, डेंगू, बर्डफ्लू आदि के फैलाव और कोरोना महामारी पर कौशलता से लिखने हेतु क्लास रूम को व्यवसायिक पटुता और दक्षता से भी लैस किया जाये। मीडिया प्राचार्यों ने अब एहसास किया कि देश की बहुभाषी मीडिया में ऐसा अध्ययन अपरिहार्य है।

मगर डॉ. मनोज दीक्षित का सुझाव अत्यधिक गौरतलब रहा कि सूचना और समाचार दोनों के बुनियादी विषमता की समझ को गहरी बनाई जाय। यदा-कदा टीवी और पत्र-पत्रिकाओं में जो चलताऊ तर्ज पर प्रस्तुतीकरण होता है उसे बेहतर किया जाय। कोरोना पर विमर्श में चीखता और झुंझलाता वक्ता दर्शकों को भाता नहीं है। विषय प्रज्ञा तथा बुद्धि से संबंधित है। अतः तकनीकी सूचनाओं को उपयुक्त शब्दों से सजाकर रुचिकर समाचार बनाना ही पेशेवर महारत कहलायेगा। इस चर्चा में सभी की आम सहमति प्रस्ताव पर रही कि मीडियाकर्मी कोरोना योद्धाओं के वर्ग में रखे जाएँ।

बढ़ते और आसन्न व्यवधानों पर भी चर्चा हुई। मसलन अख़बारों का दुबला-पतला हो जाना, मौका-ए-वारदात पर से विवरण लिखना स्थगित हो जाना, मीडिया संस्थानों में बढ़ती हुई छटनी, प्रतिस्पर्धा के दायरे का घट जाना, मीडिया पर आधारहीन दोषारोपण में बढ़ोत्तरी इत्यादि खास तौर पर कई वक्ताओं के भाषण-बिंदु रहे, जिनमें शेषनारायण सिंह, के.जी सुरेश, राकेश मंजुल, डॉ. विजेंदु चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार हेमेन्द्र तोमर आदि थे।

कोरोना की रिपोर्टिंग ही नहीं आम संवाददाता की भूमिका में भी, जैसा डॉ. मनोज दीक्षित ने कहा, सूचना और समाचार की सीमायें बेहतर रूप से स्पष्ट हों। बहुधा सूचनात्मक आलेख ही बुद्धिमत्ता का गुण मान लिया जाता है। यह एकांगी है। मसलन एलबर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि सूचना को कभी भी ज्ञान नहीं कहा जा सकता। हाँ, सूचना को दबा देना अधिनायकवाद का मर्म होता है। क्योंकि सूचना का नियंत्रण ही तानाशाही का औजार है। इसीलिए लोकतंत्र की पहली शर्त है कि सूचना का प्रवाह अविरल हो। इसकी अनिवार्यता इसलिए है कि विचार, मत, अवधारणा आदि बनाने के लिए निष्पक्ष सूचना जरूरी है। इसकी कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती। यह भी तार्किक है कि सूचना की उपेक्षा करने वाला व्यक्ति मूर्ख होता है। इसीलिए अट्ठारहवीं सदी में अंग्रेजी भाषा का शब्दकोश रचने वाले डॉ. सैमुअल जॉनसन ने कहा था कि अक्सर लोगों को सूचित करना नहीं, वरन पुनः स्मरण कराना पड़ता है। अर्थात जानकारी तो सभी के पास होती है, पर स्मृति के बाहर। अतः विचारों की प्रवाहमय धारा ही सूचना कहलाती है। किन्तु वह आदि है, अंत नहीं। सूचना अपने में पूर्ण नहीं होती। समाचार को आधार देने के लिए इसमें चंद और गुण जोड़ने पड़ते हैं।

समाचार की यथार्थवादी परिभाषा है कि वह चारों दिशाओं को परिलक्षित और प्रतिबिम्बित करता है। तभी वह अंग्रेजी भाषा में नार्थ, ईस्ट, वेस्ट तथा साउथ के पहले अक्षरों को मिलाकर NEWS बनाया गया है। कोई अनजानी घटना हुई तो उसके बारे में अविलम्ब सूचना पाने की रूचि ही समाचार को जन्माती है। कारण यही कि मनुष्य जिज्ञासु होता है। खबर चाहता है।

समाचार की बेहतरीन परिभाषा संपादकाचार्य पण्डित अम्बिका प्रसाद वाजपेयी ने की थी: “हर घटना समाचार नहीं है, सिर्फ वही घटना समाचार बन सकती है, जो कमोबेश हितकारी हो। अस्पताल में लोग भर्ती होते रहते हैं, अच्छे होते हैं और कुछ मरते भी हैं, लेकिन यह समाचार नहीं है। लेकिन यदि कोई मरीज इसलिए मर जाए कि अस्पताल पहुँचने पर कोई उसे देखने वाला नहीं था या डॉक्टर की गैर-हाजिरी में कम्पाउण्डर ने उसका गलत इलाज कर दिया या नर्स ने एक मरीज की दवा दूसरे को दे दी या ऑपरेशन करते समय कोई औजार पेट में ही रह गया और पेट सिल दिया गया तो ये सभी समाचार हो सकते हैं।”

डॉ. मनोज दीक्षित के विश्वविद्यालय का मीडिया विभाग ही ऐसा प्रशिक्षण देता है कि सूचना सुन्दर परिधान से संवर कर पेश हो तो समाचार का लावण्य दुगुना हो जाता है। उदाहरणार्थ किसी मोटर ड्राईवर ने सूचना दी कि मुख्य मंत्री राज भवन गए। अब क्या वजह हो सकती है? तात्कालिक सूचनाओं को पत्रकारिता के सूप में पछोरकर (फटककर) अर्थ निकाला गया, तब कयास लगा कि त्यागपत्र देने राज्यपाल से सीएम मिले। तो खबर बन गयी। भाषारुपी आवरण ओढ़ा दिया गया। मायने यही कि जो सूचना है वह पृष्ठभूमि है। जो अनुभव होता है वह मन्तव्य है। जो दिखता है, वही समाचार है। और आज के सन्दर्भ में जो दबाया जाय वही खबर होती है। काव्यात्मक शैली में व्यक्त करें, कुत्ते की पूँछ टेढ़ी रहती है, पर कुछ भी नहीं होता। मगर किसी के जुल्फों में ख़म पड़ जाये तो वह शायरी होती है। रसोई वाली नजीर पेश हो। लोई सूचना के रूप में है। रिपोर्टर उस पर (शब्दों वाला) परथन लगाता है। तब फुल्का रुपी समाचार तैयार होता है। समाचार और सूचना में भी अंतर कुछ ऐसा ही है। फुल्का और परथन वाला।

इस पूरी परिचर्चा में विश्वविद्यालय के नाम वाले जननायक का अद्भुत गुण भी एजेण्डा में शामिल हो सकता था। डॉ. राममनोहर लोहिया अपनी तीक्ष्ण सोच और सूक्ष्म बुद्धि के लिए इतिहास में मशहूर थे। डॉ. मनोज दीक्षित इस पूरे बहस में एक खोजी पहलू जोड़ते तो गोष्ठी ज्यादा उम्दा और सार्थक होती। लोहिया हमेशा छिद्रान्वेषण के साथ सुधारक भी रहे। सवाल उठता है कि आज की मीडिया क्यों बच रही है  यह बताने में कि कोरोना त्रासदी का एक मात्र कारक कम्युनिस्ट चीन है। अपने विश्व सम्राट होने की लालसा में उसने वुहान प्रदेश में कोरोना विषाणु पैदा किये।

नोबेल पुरस्कार से नवाजे गए जापानी वैज्ञानिक डॉ. तासाकू होन्जो ने कुछ समय पूर्व कहा था कि इस विषाणु कोरोना को चीन के विशेषज्ञों ने स्वयं बनाया था। यह प्राकृतिक नहीं है। यूं भी इस गुफावासी स्तनधारी पक्षी (वाक्-गुदम) को चीनी भाषा में “फू” कहते हैं, जिसका अर्थ है सौभाग्य। किन्तु विश्वभर के अभागे लोग कब चीन को इस चमगादड़ी अपराध पर दोषी करार देंगे? अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय, दि हेग नगर, में मुकदमा चलाया जाय। यदि लोहिया होते तो अपनी विश्वयारी वाले दर्शन के मुताबिक वैश्विक जनांदोलन इस जनवादी चीन के विरुद्ध चलाते। पीड़ित जन की क्षति पूर्ति कराते। परिचर्चा में इस पहलू पर भी बहस हो सकती थी। मीडिया का लक्ष्य भी यह है कि कोरोना-ग्रसित लोगों को इंसाफ दिलवाए।

 

नोटः यह रिपोर्ट के.विक्रम राव जी के फेसबुक वाल से साभार लिया गया है।

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