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‘स्वाधीन भारत में सांस्कृतिक पुनरुत्थान के आयाम’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

पटना (स्वस्थ भारत मीडिया)। साहित्य संस्कृति फाउंडेशन, केंद्रीय हिंदी संस्थान (केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय) एवं हिंदी विभाग ए. एन. कॉलेज पटना के संयुक्त तत्वावधान में ‘आजादी का अमृत महोत्सव‘ के उपलक्ष्य में ‘स्वाधीन भारत में सांस्कृतिक पुनरुत्थान के आयाम‘ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का गत दिनों ए. एन. कॉलेज, पटना में आयोजन हुआ। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं एमएलसी डॉ. संजय पासवान ने कहा कि हम एक दूसरे से किस प्रकार जुड़ते हैं यही सांस्कृतिक चेतना है। उन्होंने कहा कि शांति, सौहार्द और जनहित की भावना सर्वोपरि है। आज देश में नए सिरे से ‘कार्य संस्कृति’ को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।

सांस्कृतिक पुनरुत्थान पर चर्चा

मुख्य अतिथि अनिल जोशी, उपाध्यक्ष केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल, केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने पश्चिम में सांस्कृतिक पुनरुत्थान के उद्भव पर विस्तार से चर्चा की और कहा कि राष्ट्रीयता और अपनी भाषा को लेकर गहन संवेदना और गर्व की भावना इसके उद्भव के प्रमुख कारण रहे। अपनी भाषाओं के माध्यम से उन्होंने तर्क और बौद्धिकता के नए प्रतिमान गढ़े। मुख्य वक्ता प्रो. अरुण कुमार भगत, मानद सदस्य, बीपीएससी ने कहा कि संस्कृति कृ धातु से बना है। प्रकृति और विकृति भी उसी धातु से बना है। खुद कमाना, खुद खाना प्रकृति है। खुद कमाना, दूसरे को खिलाना संस्कृति है और दूसरे का छीन कर खाना विकृति है।

संस्कृति पर गर्व करना सीखें

प्रारम्भ में विषय प्रवर्तन करते हुए प्रो. कलानाथ मिश्र, विश्वविद्यालय आचार्य एवं संपादक साहित्य यात्रा ने कहा कि अपनी संस्कृति पर गर्व करना राष्ट्रीय सम्मान का परिचायक है। लंबे संघर्ष के बाद देश को आजादी मिली। आज आवश्यकता इस बात की है कि विभिन्न पारंपरिक और डिजिटल माध्यमों से हम पुनः अपनी सांस्कृतिक चेतना को पूरे देश में प्रचारित और प्रसारित करें। इसके पूर्व महाविद्यालय के प्रधानाचार्य प्रो. एस.पी. शाही ने आमंत्रित अतिथियों का अभिवादन करते हुए कि आज की संगोष्ठी का फलाफल नई पीढ़ी तक पहुंचेगी जिससे नई पीढ़ी लाभान्वित होगी।

प्राचीन ज्ञान ने विश्वगुरु बनाया

साहित्य संस्कृति फाउंडेशन के अध्यक्ष एवं संगोष्ठी के मुख्य संयोजक डॉ. विजय कुमार मिश्र ने मंच संचालन करते हुए कहा कि संस्कृति को पुनर्जीवित करने का अर्थ है प्राचीन संस्कृति के समृद्ध ज्ञान को समझना, उस पर गर्व करना। उन्होंने कहा कि अपने प्राचीन ज्ञान कोष और ज्ञान परंपरा के कारण ही भारत विश्व गुरु बना। उन्होंने कहा कि प्रशासन व्यवस्था, अर्थनीति, ज्ञान-विज्ञान, सांस्कृतिक विरासत और अपनी समृद्ध ज्ञान संपदा एवं विकसित सभ्यता से भारत हर क्षेत्र में उत्कृष्ट था।

नई पीढी में संस्कार से अलगाव

संगोष्ठी के दूसरे सत्र में सांस्कृतिक जागरण में भाषा की भूमिका विषयक सत्र के प्रारंभ में पंजाब नेशनल बैंक के मुख्य प्रबंधक (राजभाषा) साकेत सहाय ने कहा कि सांस्कृतिक जागरण में भाषा की भूमिका हमेशा रही है, किन्तु यह पुस्तकों और व्याख्यानों में जिस मुखरता के साथ दिखाई देती है, व्यावहारिक जीवन में वैसा नहीं दिखता है। नई पीढ़ी लगातार अपने भाषा संस्कार और उसके व्यवहार से दूर होते जा रहे हैं। नई धारा के सम्पादक शिव नारायण ने कहा कि भाषिक क्षरण या उसमें परिवर्तन से घबराने की आवश्यकता नहीं है, अंग्रेजी से भी घबराने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी से हम बहुत लाभान्वित भी हुए हैं। मुख्य वक्ता प्रो. सत्यकेतु सांकृत ने स्वतंत्रता आन्दोलन में भाषा विशेषकर हिंदी की भूमिका पर विस्तार से अपनी बात रखते हुए स्वाधीनता आन्दोलन में हिंदी की भूमिका को रेखांकित किया। सत्र के अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार एवं भाषाकर्मी राहुल देव ने कहा कि स्वाधीनता आन्दोलन में भाषा की और हिंदी की बड़ी भूमिका रही।

जीवन पद्धति ही संस्कृति

कार्यक्रम के दूसरे दिन भारतीय संस्कृति का वैश्विक परिप्रेक्ष्य विषयक सत्र की शुरुआत करते हुए मीडिया अध्ययन विभाग, गुरुग्राम विश्वविद्यालय के प्रो. राकेश कुमार योगी ने कहा कि संस्कृति एक प्रवाह है, निरंतर प्रवाहमान विचार और जीवन पद्धति ही संस्कृति है और जब उसको हम निरंतरता में देखते हैं तो पूरे संसार में भारतीयता दिखाई देती है। जब हम उसको खंड-खंड में देखते हैं तो समस्याएँ दिखाई देती हैं। वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर ने भारतीय संस्कृति की व्यापकता और उसके कुछ प्रमुख संदर्भों को सामने रखते हुए कहा कि भारत अपनी संस्कृति और सांस्कृतिक वैशिष्ट्य के बल पर ही पूरी दुनिया के लिए अनुकरणीय रहा है। हमारी चिंतन परम्परा, हमारा ज्ञान, हमारी संस्कृति विश्व भर के वैचारिक एवं नैतिक पोषण की दृष्टि से बेहद खास रहे हैं। सुप्रसिद्ध कथाकार-कवयित्री श्रीमती अलका सिन्हा ने यह बताया कि किस तरह हमारी संस्कृति दूसरों से भिन्न और विशिष्ट है।

विदेषों में भारतीयता की छाप

वरिष्ठ विचारक एवं भारतविद् तथा सेवानिवृत आईएएस श्री मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि संस्कृति को ग्रेटर इंडिया या बृहद भारत के परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिए। आयरलैंड जैसे देश में तारा पहाड़ी और बाली के नाम पर नगरों का होना, इटली में रोम की स्थापना रामनवमी के दिन होना, रोम के पास रावणा नामक शहर की स्थापना, रोम के स्थापना दिवस पर इटली में शाकाहारी उत्सव का आयोजन होना इत्यादि अनेक ऐसे प्रमाण हैं जो बताने के लिए काफी हैं कि भारतीय संस्कृति का विस्तार भारत से बाहर पूरी दुनिया में होता रहा है।

गंभीरता से लिया जाये भाषायी प्रावधानों को

राष्ट्रीय शिक्षा नीति और भारतीय भाषाएँ विषयक सत्र की शुरुआत करते हुए हिंदी भवन, भोपाल के निदेशक डॉ. जवाहर कर्नावट ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के भाषाई प्रावधानों को राज्य सरकारों को, खास कर हिंदी भाषी राज्यों की सरकारों को बहुत ही गंभीरता से लेना चाहिए। ऐसा लगता है कि ये सरकारें शिक्षा नीति के अन्य प्रावधानों को तो वे गंभीरता से ले रहे हैं किन्तु प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो, जैसे प्रावधानों को वे गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य वीरेंद्र कुमार यादव ने आजादी से पूर्व और बाद की शिक्षा नीतियों पर प्रकाश डालते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति में हिंदी संबंधी प्रावधानों को सामने रखते हुए कहा कि नीति से अधिक नीयत की आवश्यकता है और कमजोर कार्यान्वयन के कारण हिंदी का विकास उस तरह से नहीं हो पाता है जैसी अपेक्षा है।

भाषा की स्थिति में अपेक्षित सुधार नही

इस सत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद् के मानद निदेशक श्री नारायण कुमार ने कहा कि देश में पहले भी भाषा संबंधी अनेक नीतियाँ आई हैं किन्तु भाषा की स्थिति में जितना सुधार दिखना चाहिए था, उतना नहीं दिखता है। राहुल देव ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति भारतीय भाषाओं के संवर्धन की दृष्टि से बेहद अहम हैं। हिंदी शिक्षण मंडल के उपाध्यक्ष श्री अनिल जोशी ने कहा कि प्रधानमंत्री जी ने बिहार की ही एक सभा में इस बात की घोषणा की थी कि तकनीक और व्यावसायिक शिक्षा में माध्यम के रूप में भारतीय भाषाओं को शीघ्र ही लागू किया जाएगा। उस दिशा में अनेक गंभीर प्रयास हो रहे हैं। समापन सत्र को संबोधित करते हुए भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद्, विदेश मंत्रालय की पत्रिका गगनांचल के संपादक डॉ. आशीष कंधवे ने कहा कि सांस्कृतिक चेतना ने भारत को भारत बनाये रखा है। उन्होंने कहा कि हमें निर्माण और पुनरुत्थान के अंतर को समझना चाहिए। बीएचयू के डॉ. अशोक कुमार ज्योति ने कहा कि स्वयं को पहचानने की संस्कृति हीं भारत की पहचान है। यह आवश्यक है कि आज फिर से भारत वह भूमि बने जो लोगों को बुद्धत्व का बोध कराए।

नये युग की ओर भारत

सुप्रसिद्ध हनुमान कथावाचक पूज्य प्रदीप भैया ने रोचक कथाओं के माध्यम से बताया कि भारत नए युग का निर्माण कर रहा हैं जहाँ विश्व आशान्वित नजरों से हमारी ओर देख रहा है। उन्होंने कुछ रोचक प्रसंगों एवं कथाओं के माध्यम से इस ओर ध्यान आकृष्ट किया कि जब पूरी दुनिया भारत का नकल कर रही है तो हम क्यों दूसरों की नकल के पीछे पड़े हैं। केन्द्रीय हिंदी संस्थान की निदेशक प्रोफेसर बीना शर्मा ने कहा कि सांस्कृतिक चेतना के मार्ग में जो अवरोध और कांटे है उसे हटाना होगा।

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