संयुक्त राष्ट्र की वैश्विक उद्घोषणा एवं एकात्म विश्लेषण
धीप्रज्ञ द्विवेदी/डॉ. स्मिता पांडेय
संयुक्त राष्ट्र (United Nations) एवं वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय ने नीम (Neem/Azadirachta indica) को उसके विस्मयकारी बहुआयामी गुणों के कारण ’21वीं शताब्दी का वृक्ष’ (Tree of the 21st Century) के रूप में अभिशिक्त किया है। यह उद्घोषणा केवल आधुनिक विज्ञान की उपलब्धि नहीं, अपितु भारत के सहस्रों वर्षों के पारंपरिक ज्ञान की वैश्विक विजय है। नीम को “शताब्दी का वृक्ष” की संज्ञा प्रदान करने वाला सर्वाधिक आधिकारिक एवं प्रामाणिक स्रोत ‘Neem: A Tree for Solving Global Problems (1992)’ नामक प्रमुख शोध प्रतिवेदन है, जिसे नेशनल एकेडमी प्रेस, वाशिंगटन डी.सी. द्वारा प्रकाशित किया गया था। इस रिपोर्ट का आधिकारिक संदर्भ सूत्र (Link) NAS-NRC Neem Report 1992 है। ऐतिहासिक रूप से 16-19 अप्रैल, 1993 को बैंकॉक (थाईलैंड) में आयोजित ‘प्रथम विश्व नीम सम्मेलन’ में खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के तत्वावधान में विश्व के मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने इसे 21वीं सदी की वैश्विक समस्याओं, जैसे क्षुधा, व्याधि एवं पर्यावरण ह्रास का एकमात्र नैसर्गिक समाधान घोषित किया।
भारत में नीम का उपयोग केवल चिकित्सा तक सीमित नहीं रहा, अपितु इसे आध्यात्मिक और सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त है। संस्कृत संज्ञा के रूप में आयुर्वेद में नीम को ‘निम्ब’ कहा गया है, जिसका अर्थ है—”जो स्वास्थ्य प्रदान करे”। इसे ‘सर्व रोग निवारणी’ (सभी रोगों को दूर करने वाला) और ‘अरिष्ट’ (अविनाशी एवं पूर्ण) की संज्ञा दी गई है। वेदों में उल्लेख के अनुसार, अथर्ववेद में नीम के औषधीय गुणों का वर्णन मिलता है, जहाँ इसे रोगों के विरुद्ध एक शक्तिशाली अस्त्र माना गया है। लोक संस्कृति में चैत्र मास के नवरात्रों में नीम की कोमल पत्तियों का सेवन भारतीय परंपरा में रक्त शुद्धि और संक्रामक रोगों से रक्षा का आधार रहा है; इसे ‘ग्राम औषधालय’ (Village Pharmacy) भी कहा जाता है।
नीम के बहुआयामी गुणों का विस्तृत वैज्ञानिक विवेचन इसके कृषि एवं जैव-कीटनाशक (Ecological Pest Management) प्रभाव को रेखांकित करता है। नीम में विद्यमान एजाडिरैक्टिन (Azadirachtin) नामक यौगिक इसे विश्व का सर्वश्रेष्ठ जैव-कीटनाशक बनाता है। इसकी कार्यपद्धति यह है कि यह कीटों को विषाक्त करने के स्थान पर उनके ‘कायांतरण’ (Metamorphosis) को अवरुद्ध कर देता है। यह 400 से अधिक विनाशकारी कीटों (जैसे टिड्डी दल) पर प्रभावी है, किंतु पर्यावरण के मित्र कीटों (मधुमक्खी, तितली) के प्रति पूर्णतः निरापद है। मृदा संरक्षण के क्षेत्र में नीम की खली (Neem Cake) मृदा में ‘नाइट्रीकरण’ की गति को मंद करती है, जिससे पौधों को दीर्घकाल तक पोषण प्राप्त होता है।
आयुर्वेद एवं आधुनिक चिकित्सा (Natural Pharmacy) के दृष्टिकोण से नीम में विषाणु-रोधी एवं जीवाणु-रोधी गुण समाहित हैं। नीम में एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-वायरल और एंटी-फंगल गुण होते हैं। इसके पत्तों का अर्क चेचक, खसरा और हर्पीज जैसे संक्रामक रोगों के उपचार में अद्वितीय है। दंत एवं त्वचा स्वास्थ्य के लिए इसमें मौजूद ‘निम्बिन’ और ‘निंबिडिन’ जैसे तत्व मसूड़ों की सूजन और सोरायसिस, एक्जिमा जैसे जटिल चर्म रोगों के निराकरण में रामबाण सिद्ध हुए हैं। इसके अतिरिक्त, आधुनिक शोधों ने नीम में ‘अपोप्टोसिस’ (कैंसर कोशिकाओं का स्वतः विनाश) को प्रेरित करने वाले तत्वों (Anti-cancer) की पुष्टि की है। पर्यावरणीय सुरक्षा एवं आपदा न्यूनीकरण (Climate Action) के क्षेत्र में नीम का वृक्ष अन्य वृक्षों की तुलना में 30 प्रतिशत अधिक कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करने और प्रचुर ऑक्सीजन मुक्त करने की क्षमता रखता है। मरुस्थलीकरण निवारण हेतु संयुक्त राष्ट्र की UNCCD संधि के अंतर्गत, नीम को रेतीली भूमि के विस्तार को रोकने और भू-क्षरण के विरुद्ध ‘हरित प्राचीर’ (Green Wall) के रूप में चिन्हित किया गया है।
अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक संपदा संघर्ष (The Patent Battle) के इतिहास में नीम के वैश्विक गौरव की रक्षा हेतु 8 मार्च, 2005 की तिथि स्वर्णाक्षरों में अंकित है। एक लंबे संघर्ष के उपरांत, जिसमें अमेरिकी कंपनी (W.R. Grace) ने नीम के गुणों पर पेटेंट प्राप्त करने का प्रयास किया था, भारत की विजय हुई। भारत सरकार और नागरिक संगठनों, जैसे डॉ. वंदना शिवा, ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर सिद्ध किया कि नीम का ज्ञान भारत का ‘पुरातन ज्ञान’ (Prior Art) है। यह विश्व की प्रथम ‘बायोपायरेसी’ विरोधी ऐतिहासिक जीत थी, जिसने नीम को ‘वैश्विक लोक संपत्ति’ के रूप में प्रतिष्ठित किया। निष्कर्षतः संयुक्त राष्ट्र द्वारा नीम को ’21वीं शताब्दी का वृक्ष’ घोषित किया जाना प्राचीन भारतीय मेधा और आधुनिक वैज्ञानिक आवश्यकता का समन्वित उद्घोष है। 1992 की NRC रिपोर्ट और 1993 का बैंकॉक सम्मेलन इस तथ्य के अक्षुण्ण प्रमाण हैं। नीम केवल एक पादप नहीं, अपितु भविष्य की जैव-अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य रक्षा और पारिस्थितिक संतुलन का आधार स्तंभ है।
