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अब संस्कृत के छात्र भी बन सकेंगे Ayurved के डॉक्टर

अब संस्कृत के छात्र भी बन सकेंगे Ayurved के डॉक्टर

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली ने घोषणा की है कि अब संस्कृत के छात्र भी आयुर्वेद के डॉक्टर बन सकेंगे। एक कार्यक्रम में आयुर्वेद शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक पहल करते हुए आयुर्वेद गुरुकुल संबद्धता पोर्टल तथा आयुर्वेद गुरुकुलों हेतु विस्तृत दिशा-निर्देशों का औपचारिक शुभारम्भ किया। पोर्टल एवं दिशा-निर्देशों का संयुक्त विमोचन विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी एवं नेशनल कमीशन फॉर इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन (NCISM) की अध्यक्ष डॉ. मनीषा यू. कोठेकर द्वारा किया गया।

आयुर्वेद: NEET की तर्ज पर प्रवेश परीक्षा

कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने कहा कि केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय NEET की तर्ज पर प्री–BAMS (Pre Ayurveda Programme) की प्रवेश परीक्षा आयोजित करेगा। इस परीक्षा के माध्यम से छात्रों को प्रवेश प्रदान किया जाएगा। कक्षा 10 पास करने के बाद छात्र इसमें प्रवेश ले सकेगा तथा आयुर्वेद गुरुकुलों को मान्यता प्रदान करने का अधिकार भी केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के पास रहेगा। इसके साथ ही विश्वविद्यालय स्वयं भी अपने परिसरों में आयुर्वेद गुरुकुलम् कार्यक्रम प्रारम्भ करेगा। प्रथम चरण में यह कार्यक्रम नासिक परिसर सहित दिल्ली व अन्य परिसर में शुरू किया जाएगा। यह पहल NCISM के प्री–आयुर्वेद प्रोग्राम (BAMS Framework) के अंतर्गत संचालित की जा रही है, जिसके तहत 7 साल 6 माह की समेकित अवधि का पाठ्यक्रम निर्धारित किया गया है। इसमें दो वर्ष का प्री–आयुर्वेद कार्यक्रम, साढ़े चार वर्ष का BAMS पाठ्यक्रम तथा एक वर्ष की अनिवार्य इंटर्नशिप सम्मिलित होगी। इस व्यवस्था के अंतर्गत अब संस्कृत पृष्ठभूमि के छात्र भी आयुर्वेद चिकित्सक बन सकेंगे। उन्होंने जोड़ा कि देशभर की संस्था, जो निर्धारित पात्रता रखती है, वह आयुर्वेद गुरुकुलम् की संबद्धता के लिये इस पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन कर सकेंगे। पंजीकरण, निरीक्षण एवं संबद्धता की पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी, सुव्यवस्थित और पूर्णतः डिजिटल बनाया गया है, जिससे गुरुकुल आधारित आयुर्वेद शिक्षा को एक सशक्त राष्ट्रीय नियामक ढांचा प्राप्त होगा।

आयुर्वेद की जड़ें संस्कृत में

कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने कहा कि आयुर्वेद केवल चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि जीवन शैली है, जिसकी जड़ें संस्कृत शास्त्रों में निहित हैं। नई शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप यह पहल परंपरा एवं नवाचार के संतुलन का सशक्त उदाहरण है। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद, संस्कृत, दर्शन, योग और संहिता ये सभी एक-दूसरे के पूरक हैं और गुरुकुल प्रणाली के माध्यम से इनका समन्वित अध्ययन संभव हो सकेगा। केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय एवं NCISM के सहयोग से प्रारम्भ की गई यह पहल गुरुकुल आधारित आयुर्वेद शिक्षा के लिए एक मजबूत, विश्वसनीय एवं भविष्य उन्मुख राष्ट्रीय मॉडल स्थापित करेगी तथा संस्कृत एवं आयुर्वेद की शास्त्रीय परंपरा को पुनर्जीवित करते हुए भारत की ज्ञान परंपरा को वैश्विक मंच पर सशक्त रूप से प्रतिष्ठित करेगी।

आयुर्वेद: मिलेगी नयी दिशा

मुख्य अतिथि डॉ. मनीषा यू. कोठेकर ने अपने संबोधन में कहा कि यह पहल आयुर्वेद में शास्त्रीय प्रामाणिकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं पारदर्शिता को नई दिशा देगी। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद का संस्कृत से गहरा अविभाज्य संबंध है तथा संस्कृत के बिना आयुर्वेद दर्शन, शरीर-विज्ञान और चिकित्सा सिद्धांतों को समग्र रूप से समझना संभव नहीं है। यह कार्यक्रम भारतीयता, आधुनिक तकनीक, कौशल विकास और तत्त्वज्ञान के समन्वय से विद्यार्थियों को समग्र शिक्षा प्रदान करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि आयुर्वेद के प्रति वैश्विक रुचि बढ़ रही है और गुरुकुल आधारित मॉडल भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करेगा। कार्यक्रम में कुलसचिव प्रो. आर. जी. मुरली कृष्ण, राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.मदन मोहन झा, शैक्षणिक अधिष्ठाता प्रो. ललित कुमार त्रिपाठी, छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रो. लीना सक्करवाल तथा आयुर्वेद गुरुकुलम् के समन्वयक डॉ. डी. दयानाथ सहित अनेक शिक्षाविद्, अधिकारी एवं विशेषज्ञ उपस्थित रहे।

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