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Nutrition: मध्यप्रदेश में हर तीसरा बच्चा ठिगना

MP: पोषण के संकट से हर तीसरा बच्चा ठिगना

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। मध्यप्रदेश में संस्थागत प्रसव बढ़े हैं, महिलाओं की इंटरनेट तक पहुंच दोगुनी से अधिक हुई है और टीकाकरण के आंकड़े भी पहले से बेहतर हुए हैं। लेकिन राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 6 (2023-24) के ताजा आंकड़े बताते हैं कि पोषण (Nutrition) की कमी से राज्य में पांच साल से कम उम्र के लगभग हर तीन में से एक बच्चा अब भी ठिगना है, हर दस में से चार बच्चे कम वजन के हैं और बच्चों में तीव्र कुपोषण पहले की तुलना में बढ़ गया है। सर्वे के अनुसार वहां 31.4 प्रतिशत बच्चे ठिगनेपन के शिकार हैं। वैसे यह पहले से कम हुआ है। उधर कम वजन वाले बच्चों का प्रतिशत 33 से बढ़कर 39.7 प्रतिशत और दुबलापन 18.9 प्रतिशत से बढ़कर 23.8 प्रतिशत तक पहुंच गया है। ये बताते हैं कि बच्चों में तीव्र पोषण संकट अभी भी गहरा है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति ज्यादा खराब है, जहां 42 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं और लगभग एक-चौथाई बच्चे वास्टिंग से प्रभावित हैं।

पोषण: 12% बच्चों को न्यूनतम आहार

NFHS -6 की रिपोर्ट बताती है कि छह से 23 माह आयु वर्ग के केवल 12 प्रतिशत बच्चों को न्यूनतम आहार मिल रहा है। यानी लगभग 88 प्रतिशत बच्चों को उम्र के अनुरूप पर्याप्त और संतुलित भोजन नहीं मिल पा रहा है। छह महीने तक केवल स्तनपान कराने की दर भी गिरकर 56.4 प्रतिशत रह गई है, जबकि पिछले सर्वेक्षण में यह 74 प्रतिशत थी। सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार जीवन के पहले 1,000 दिन बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे में स्तनपान और पूरक आहार में यह कमी भविष्य में कुपोषण और सीखने की क्षमता पर असर डाल सकती है। राज्य में 96.2 प्रतिशत महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान कम से कम एक प्रसवपूर्व जांच (ANC) मिली और 89.8 प्रतिशत प्रसव स्वास्थ्य संस्थानों में हुए। पहली नजर में यह उपलब्धि दिखाई देती है। लेकिन दूसरी ओर केवल 39.6 प्रतिशत महिलाओं ने गर्भावस्था के दौरान 180 दिनों या उससे अधिक समय तक आयरन-फोलिक एसिड की गोलियां लीं। यह संकेत देता है कि मातृ पोषण अब भी स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोर कड़ी बना हुआ है।

पोषण : अधिक वजन व मोटापा भी

सर्वे रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश में कुपोषण के साथ अल्पपोषण और मोटापे की समस्या मौजूद है। 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की 26.5 प्रतिशत महिलाएं और 28.3 प्रतिशत पुरुष सामान्य से कम बीएमआई वाले हैं। दूसरी ओर 22.2 प्रतिशत महिलाएं और 17.6 प्रतिशत पुरुष अधिक वजन या मोटापे की श्रेणी में पहुंच चुके हैं। यह स्थिति सार्वजनिक स्वास्थ्य की भाषा में “डबल बर्डन ऑफ मालन्यूट्रिशन” कहलाती है, जहां एक ही समाज में कुछ लोग पर्याप्त भोजन और पोषण से वंचित हैं, जबकि दूसरी तरफ बड़ी संख्या में लोग अस्वास्थ्यकर भोजन और जीवनशैली के कारण मोटापे और उससे जुड़ी बीमारियों का सामना कर रहे हैं। महिलाओं के सशक्तिकरण से जुड़े संकेतकों में सकारात्मक बदलाव दर्ज हुए हैं। 90.4 प्रतिशत विवाहित महिलाएं घरेलू निर्णयों में भागीदारी कर रही हैं। 92.1 प्रतिशत महिलाओं के पास बैंक खाता है और इंटरनेट उपयोग करने वाली महिलाओं का प्रतिशत 26.9 से बढ़कर 62 प्रतिशत हो गया है। लेकिन इन उपलब्धियों के बावजूद केवल 17.3 प्रतिशत महिलाओं के पास घर या जमीन का स्वामित्व है।

पोषण : मधुमेह का खतरा

सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में मधुमेह का जोखिम तेजी से बढ़ रहा है। 15 वर्ष से अधिक आयु की 14.5 प्रतिशत महिलाओं और 18.3 प्रतिशत पुरुषों का रक्त शर्करा स्तर 140 से अधिक है या वे मधुमेह की दवा ले रहे हैं। पिछले सर्वेक्षण की तुलना में यह उल्लेखनीय वृद्धि है। यह संकेत देता है कि मध्यप्रदेश अब संक्रमण और कुपोषण जैसी पारंपरिक स्वास्थ्य चुनौतियों के साथ-साथ गैर-संचारी रोगों (NCDs) के बढ़ते बोझ का भी सामना कर रहा है। लगभग हर प्रमुख संकेतक में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। बाल विवाह, कुपोषण, कम वजन, मातृ स्वास्थ्य और डिजिटल पहुंच—सभी में ग्रामीण क्षेत्र पीछे हैं। मिसाल के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में 33.2 प्रतिशत बच्चे ठिगने हैं जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 24.5 प्रतिशत है। ग्रामीण महिलाओं में बाल विवाह का प्रतिशत शहरी महिलाओं की तुलना में लगभग ढाई गुना अधिक है। इंटरनेट उपयोग और शिक्षा के मामले में भी यही अंतर दिखाई देता है।

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