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ड्रग रेसिस्टेंस एंटीबायोटिक बनाने की चल रही तैयारी

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। जिन मरीजों पर दवाओं का असर होना बंद हो जाता है, उनके लिए नयी एंटीबायोटिक बन रही है। हालांकि अभी अस्पतालों में इसके पहुंचने में लंबा समय लगेगा। मुख्यतः तीन बैक्टीरिया एंटीबायोटिक के असर को खत्म कर देती है जिसमें प्रमुख है क्रैबी यानी बैक्टीरिया एसिनोबैक्टर। दो और है-Pseudomonas aeruginosa और Enterobacteriaceae । क्रैबी से निबटने की ड्रग रेसिस्टेंस की बन रही दवा है जोरासुलबनपिन। ये बैक्टीरिया ज्यादातर वेंटिलेटर पर रहने वाले मरीजों को अपना शिकार बनाते हैं। दवा की खोज डॉ. माइकल लोब्रिट्ज ने की है।

Dr. Reddys अमेरिका से वापस ले रही प्रोडक्ट

भारतीय फार्मा कंपनी Dr. Reddys जेनेरिक दवा की करीब 8000 शीशी अमेरिका से रिकॉल कर रही है। ये दवा अंग ट्रांसप्लांटेशन में इस्तेमाल होती है। US FDA ने भी इसकी पुष्टि की है। उसके मुताबिक 1 mg वाले Tacrolimus कैप्सूल की शीशी में 0.5 mg Tacrolimus कैप्सूल भी पाया गया है। पिछले साल मार्च महीने में भी कंपनी ने इस दवा की 4,000 शीशी वापस मंगा ली थी।

छोटी दवा कंपनियों को मिले और समय

हिमाचल ड्रग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (HDMA) ने गुणवत्तापूर्ण दवाओं के निर्माण को सुनिश्चित करने पर सरकार की चिंता को साझा करते हुए कहा कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए एक साल में कई बदलावों को शामिल करना एक बड़ी चुनौती होगी। इसके अध्यक्ष राजेश गुप्ता ने कहा कि सरकार को एमएसएमई के लिए समयसीमा तीन साल तक बढ़ानी चाहिए क्योंकि इन संशोधनों के लिए दो करोड़ रुपये से पांच करोड़ रुपये तक का निवेश चाहिए होगा। सरकार ने बड़ी कंपनियों को 6 महीने और छोटी को एक साल में WHO के मानक के मुताबिक दवा बनानी होगी।

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