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कीजिए धरती के भगवानों को सैल्यूट

अजय वर्मा

नयी दिल्ली। डॉक्टरों को धरती का भगवान माना जाता है। यह अलग बात है कि प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले डॉक्टरों के प्रति नफरत की भावना बढ़ी है। ऐसे माहौल में भी कुछ डॉक्टरों ने अपने प्रयासों से पेशे की पुरानी छवि बरकरार रखी है। लोगों ने उन पर भरोसा भी किया है। ऐसी विभूतियों को जानना जरूरी है।

उड़ीसा में एक रुपया क्लिनिक

Dr Ramchandani

चलते हैं उड़ीसा के संबलपुर जहां डॉक्टर शंकर रामचंदानी हैं। वे बुर्ला स्थित वीर सुरेंद्र साईं इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस (VIMSAR) में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। उन्होंने ‘एक रुपया क्लिनिक’ की शुरुआत की है जहां वह गरीब और जरूरतमंद लोगों का इलाज सिर्फ एक रुपये में करते हैं। उनका परिवार विभाजन के समय भारत आया था। उनके पिताजी चाहते थे कि हम गरीबों के लिए मुफ्त नर्सिंग होम शुरू करें। लेकिन आज के जमाने में मुफ्त नर्सिंग होम चलाना बहुत मुश्किल है, बताते हैं डॉ. रामचंदानी। कहते हैं—इसके लिए बहुत साधनों और पैसों की जरूरत होती है। इसलिए मैंने ‘एक रुपया क्लिनिक’ खोलने का फैसला किया। वे सुबह से शाम तक कॉलेज में अपनी नौकरी करते हैं और इसके बाद क्लिनिक पर पहुँच जाते हैं। यहां वह हर दिन 30-35 मरीजों को देख रहे हैं। बुखार, हाइपरटेंशन, डायबिटीज जैसी हर तरह की बीमारियों से परेशान लोग उनके पास इलाज करवाने के लिए आते हैं। वे बताते हैं कि यह दुःख की बात है कि मरीज ऐसी बीमारियों से भी मर रहे हैं, जिनका इलाज संभव है। इसकी सिर्फ एक वजह है, किफायती स्वास्थ्य सेवाओं की कमी। इसलिए, इस क्लिनिक की वजह से अब हम, कम से कम कुछ लोगों को तो वक्त पर सही इलाज दे पाएंगे। वे मरीजों के मेडिकल टेस्ट और इलाज के बदले उनसे सिर्फ एक रुपया लेते हैं। अगर कोई मरीज इस हालत में भी नहीं है कि वह दवाइयां खरीद सकें तो वह खुद, उन्हें दवा भी खरीद कर देते हैं।

…ताकि लगे कि फीस ली

एक रुपया ही क्यों? वे कहते हैं कि मैं एक रुपया इसलिए ले रहा हूँ क्योंकि मैं नहीं चाहता कि लोगों को ऐसा लगे कि उन्हें कुछ मुफ्त मिल रहा है। वह मुझे मेरे काम की फीस दे रहे हैं। इसलिए उन्हें पूरा हक है कि उन्हें अच्छे से अच्छा इलाज मिले। मैं उनसे फीस ले रहा हूँ तो यह मेरी ज़िम्मेदारी है कि मैं उनका सही इलाज करूँ। अब फीस कितनी है, इससे क्या फर्क पड़ता है। मेडिकल क्षेत्र में आने के वक्त से ही वह समाज के लिए लगातार काम कर रहे हैं। VIMSAR में उन्होंने बतौर सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर ज्वाइन किया था और उस समय नियमों के हिसाब से, वह अपना क्लिनिक नहीं खोल सकते थे। लेकिन जब वह असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर आ गए तो उन्होंने एक जगह को किराये पर लेकर अपना क्लिनिक शुरू किया। क्लिनिक शुरू करने से पहले भी, वह गरीब लोगों को इलाज के लिए आर्थिक मदद करते थे। पिछले एक साल से वह कुष्ठ रोग से ग्रस्त मरीजों की भी देखभाल कर रहे हैं। अच्छी बात यह है कि इसके लिए कहीं से फंड नहीं जुटाते। अपनी कमाई का एक हिस्सा इस काम के लिए लगाते हैं। उनके लिए लोगों का स्वास्थ्य सबसे ज्यादा जरूरी है।

दो रुपये वाले डॉ. गोपाल

अब कथा कन्नूर के डॉक्टर ए. के. रैरु गोपाल की जिनका हाल ही निधन हुआ है। उन्होंने पचास साल तक गरीबों की सेवा की। उनकी फीस महज दो रुपये रही। सुबह 4 बजे से शाम 4 बजे तक अपने घर ‘लक्ष्मी’ में बने छोटे से क्लिनिक में बैठकर उन लोगों की सेवा करते थे जो अभाव के कारण बड़े अस्पतालों तक नहीं पहुँच पाते थे। सबके लिए वे बस “जनता के डॉक्टर” थे। उन्होंने पैसा के बदले सेवा और इंसानियत का मार्ग चुना। कभी छुट्टी नही ली न कभी क्लिनिक बंद किया। डॉ. रायरू गोपाल की दिनचर्या सादगी और समर्पण का अनुपम उदाहरण थी। वे प्रतिदिन तड़के 2:15 बजे उठकर अपनी गौशाला का ध्यान रखते, दूध वितरित करते, और फिर अपने क्लिनिक में बैठते। उनकी पत्नी डॉ. पीओ शकुंतला और एक सहयोगी मरीजों की भीड़ को व्यवस्थित करने तथा दवाएं बांटने में उनका साथ देते थे। उन्होंने फार्मा कंपनियों के प्रलोभनों को ठुकराया और केवल सस्ती, प्रभावी दवाएँ लिखीं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) ने उन्हें केरल के सर्वश्रेष्ठ फैमिली डॉक्टर के पुरस्कार से सम्मानित किया था। उनके करियर में उन्होंने 18 लाख से अधिक मरीजों का इलाज किया, जो उनके समर्पण का जीवंत प्रमाण है।

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