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हिमाचल और उड़ीसा में फैल रहा Scrub Typhus

अनुराग अनुभव

नयी दिल्ली। हिमाचल प्रदेश और उड़ीसा में इन दिनों स्क्रब टाइफस नामक संक्रमण ने कहर बरपा रखा है। सिर्फ हिमाचल में ही इस बीमारी (Scrub Typhus) से संक्रमित 973 मरीज मिल चुके हैं जिनमें से 10 की मौत हो चुकी है। यहां यह संक्रमण मुख्य रूप से शिमला और सोलन जिले में फैला हुआ है। वहीं उड़ीसा में भी इसकेे हर दिन नए मरीज सामने आ रहे हैं। यहां भी इससे 5 लोग जान गंवा चुके हैं। यह एक तरह की संक्रामक बीमारी है, जो घुन या छोटे कीड़े-मकोड़ों और जीवों पर चिपके बैक्टीरिया के कारण फैलती है।

क्या है Scrub Typhus?

यह एक प्रकार का जीवाणुजनित संक्रमण है। ये संक्रमण ओरिएंटिया त्सुत्सुगामुशी (Orientia Tsutsugamushi) नामक बैक्टीरिया के कारण फैलता है। ये बैक्टीरिया पिस्सुओं, जुंए, छोटे कीड़े-मकोड़ों, चूहों आदि के जरिए इंसानों में फैल सकते हैं। इस संक्रमण के लक्षण डेंगू-चिकनगुनिया से मिलते जुलते हैं। गंभीर स्थिति में इससे मरीज को ऑर्गन फेल्योर हो सकता है। यही कारण है कि ये बीमारी जानलेवा साबित हो सकती है।

रोग का इतिहास

इसका इतिहास बहुत पुराना है। यह बीमारी सबसे पहले 313 में चीन में देखी गई थी। इसके बाद 610 और 1596 में भी इसका उल्लेख वहां के इतिहास में मिलता है। तब तक ये बीमारी सिर्फ चीन में ही देखी जाती रही। फिर बहुत सालों बाद 1810 में पहली बार ये बीमारी जापान में रिपोर्ट की गई। 19वें दशक के शुरुआती सालों तक ये बीमारी कई देशों में फैल गई, जिनमें भारत के साथ-साथ इंडोनेशिया, फिलीपींस, ताइवान, ऑस्ट्रेलिया, वियतनाम और मलेशिया शामिल थे। भारत में इसका पहला मामला 1932 में सामने आया था। बहुत पुरानी बीमारी होने के कारण इसे अलग-अलग देशों में अलग-अलग नामों से जाना जाता रहा है।

कैसे फैलती है यह बीमारी?

यह संक्रमित छोटे कीड़े-मकोड़ेे घने जंगलों, झाड़ियों वाली जगहों पर ज्यादा पाए जाते हैं। कई मामलों में देखा गया है कि ये कीड़े चूहे या अन्य छोटे जीवों के शरीर पर लिपटकर इंसानों की बस्ती तक पहुंच जाते हैं और इंफेक्शन का कारण बनते हैं। बारिश के मौसम में खेत-झाड़ियों के आसपास ये बीमारी फैलाने वाले बैक्टीरिया पनप सकते हैं, जिस कारण ये बीमारी इसी मौसम में ज्यादा देखने को मिलती है।

इस बीमारी के लक्षण

इसके सामान्य लक्षण हैं-तेज बुखार, ठंड लगना और कंपकंपी, मांसपेशियों और पूरे शरीर में तेज दर्द, रैशेज आदि। इसके गंभीर होने पर भ्रम और कोमा की स्थिति, इंटरनल ब्लीडिंग, अंगों का फेल हो जाना, मानसिक स्थिति का ठीक न होना, बढ़े हुए लिम्फ नोड्स आदि। इसकी जांच रक्त के सैंपल के लैब टेस्ट से होती है। फिलहाल इसके लिए एंटीजेन, एलिसा (ELISA) और PCR टेस्ट उपलब्ध हैं।

इस रोग का इलाज

इसका पता चलने पर मरीज के लक्षणों के आधार पर उसका इलाज किया जाता है। आमतौर पर इसके इलाज में एंटीबायोटिक्स की मदद ली जाती है। CDC के अनुसार लक्षणों के शुरू होते ही अगर मरीज को एंटीबायोटिक्स दे दी जाएं, तो उसे जल्द ठीक किया जा सकता है। इससे बचने के लिए कोई वैक्सीन या दवा नहीं है इसलिए इसके संक्रमण से बचाव करना ही सुरक्षित रहने का उपाय है। बचाव के लिए झाड़ी या घास-फूस वाले इलाकों से दूर रहना चाहिए, रात में खुली जगह पर सोने से परहेज, घर और कार्यस्थल के आसपास सफाई आदि जरूरी है। संक्रमित मरीज से दूरी भी बनाकर रखना होगा।

साभार

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