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तकनीक से मिले तनाव का योग में समाधान

बी. कृष्णा

तेज रफ्तार वाले 4जी और 5जी से लैस इंटरनेट, बेहतरीन संचार सुविधाएं एवं बाधारहित कंप्यूटिंग में सहायक बने विभिन्न गजेट से हमें जो ताकत मिली है, उसमें तकनीक की भूमिका महत्वपूर्ण साबित हो रही है। इनके साथ मौजूदा दौर में इंसानी बौद्धिकता और कुशाग्रता एक मिसाल बनकर उभरी है। हर छोटे-बड़े काम तकनीक की मदद से निपटाए जा रहे हैं, जिससे इंसानी जीवन सरल बन गया है। सुविधाएं बढ़ गई हैं। विकास ने रफ्तार पकड़ ली है। कहा जा सकता है कि तकनीक सिर्फ एक शब्दमात्र नहीं, अपितु एक अवधारणा बन चुका है, जो मानव जीवन को और अधिक आसान बनाने में लगातार मदद कर रहा है।
इसका दूसरा पहलू भी है। तकनीक ने जहाँ जीवन को आसान बनाया है, वहीं दिनचर्या में इसकी गहरी हो चुकी घुसपैठ से हमारे दिमाग में सोचने-समझने, फौरी निर्णय लेने और परिणामी नतीजे निकालने में समय का अंतराल काफी कम हो गया है। ऐसे में कई बार ऐसा होता है कि स्मार्टफोन या पीसी, लैपटॉप के कीबोर्ड पर उंगलियां चलाते हुए बातें या विचार असंतुलित हो जाते हैं। सोचने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है। कई चीजें गड्डमड्ड हो जाती हैं। यानी कि सुविधाएं देने वाली तकनीक ही एक तनाव का कारण बन जाता है। इनसे चिड़चिड़ापन, शीघ्र आवेश, अकेलापन या खालीपन की आकस्मिक स्थितियां पैदा हो जाती हैं।
इनसे दूसरे किस्म की शारीरिक व्याधियां पैदा होने लगती हैं। मानिसक तनाव से बिगड़े मनोविज्ञान से लेकर मधुमेह, उच्च रक्तचाप, माइग्रेन, पाचन विकार आदि की आशंकाएं बन जाती है। इस लिहाज से यह कहना गलत नहीं होगा कि जो तकनीक मददगार बनकर सामाने आया है, वही तनाव का कारण भी है। इनसे दूसरे किस्म की शारीरिक व्याधियां पैदा होने लगती हैं।
जब तनाव की बात आती है तब मानसिक संतुलन के लिए पौराणिक पद्धति योग की ओर ध्यान चला जाता है। डिजिटलाइज़ेशन के दौर में सामान्य से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता के तकनीक की विविधताएं और उसके इस्तेमाल को लेकर दिमागी उलझनों को योग के कुछ प्रयोग से संयमित किया जा सकता है। इनसे मिली असीम शांति हमें एक असाधारण सुख की ओर ले जाती है। हमने तकनीक का इस्तेमाल खुद के जीवन को सुव्यवस्थित करने के लिए किया, परन्तु आज हम यह सोचकर तनावग्रस्त हो जाते हैं कि कहीं यही तकनीक हम पर हावी न हो जाये। तनाव का यह रूप निकट भविष्य की अप्रत्याशित मांगों और दबावों से उपजा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी तनाव को ‘इक्कीसवीं सदी की सबसे खराब स्वास्थ्य महामारी’ करार दिया है। अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन की रिपोर्ट है कि 50 फीसदी से अधिक अमेरिकी विभिन्न कारणों से तनाव से पीड़ित हैं। साथ ही 91 फीसदी वयस्क ऑस्ट्रेलियाई जीवन के कम से कम एक क्षेत्र में तनाव महसूस कर रहे हैं। कमोबेश ऐसे ही डराने वाले आकंडे़ भारत के संदर्भ में भी हैं।
तकनीक की वजह से उपजे तनाव के बारे में न्यूयॉर्क के चिकित्सक किम्बर्ली का कहना है कि ‘प्रौद्योगिकी तब एक समस्या बन जाती है, जब यह आपके दैनिक जीवन में हस्तक्षेप करना शुरू कर देती है।’
प्रश्न है कि ऐसा क्यों हुआ?
इसका उत्तर हमारे विकास से जुड़ा हुआ है। विकासोन्मुखी धारा के साथ काम करते हुए जरूरी तकनीक की विकास यात्रा शुरू हुई। धीरे-धीरे यही तकनीक हमारी जरूरत बन गई और हम इस पर आश्रित होते चले गए।
ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
क्रोधाहः सम्मोहातस्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
हमारी इच्छाएं अपना फन फैलाने लगीं। हमने अपनी इच्छाओं को खूब विस्तार दे दिया। उसकी पूर्ति होगी या नहीं होगी, इस कश्मकश ने हमारे भीतर क्रोध को पैदा किया। क्रोध के पैदा होते ही हमने अपना विवेक खो दिया। अपनी सहजता और सरलता खो दी। सही गलत की पहचान के गुम होते ही परिणाम, तनाव के चपेट में आ गए। तनाव अंततः शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक समस्याओं का कारण बनता चला गया। कई बार तो कुछ व्यक्ति इतनी अधिक मानसिक पीड़ा से गुजरते हैं कि आत्महत्या तक को गले लगा लेते हैं।
इसका निदान योग के पास है। योग हमारे तनाव को दूर करनेवाला होगा, पर कब? योग का अर्थ है जुड़ना। जुड़ना अपने अंतस से और बाह्य से। तकनीक के इस्तेमाल ने हमें कनेक्शन तो दिया है, पर कनेक्टिविटी नहीं दी है। और हमारे सारे तनाव का जड़ यही है। कनेक्शन को ही कनेक्टिविटी समझ लेने की भूल कर बैठे हैं। योग से हमारा तात्पर्य सिर्फ आसन और प्राणायाम नहीं, बल्कि जीवन शैली है जिनसे मानसिक स्थिरता मिलती है और हम कनेक्टिविटी के तारों के साथ सहज बने रहते हैं।
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥
ठीक समय पर भोजन करना, ठीक समय पर विचरण करना, ठीक समय पर सोना, कर्मों को सही समय पर ठीक से करना, समय पर जागना। यदि यह हमने अपनी दिनचर्या में शामिल कर लिया, तो समझें कि तनाव मुक्ति की दिशा में हमने अपना पहला कदम बढ़ा लिया है।
प्रश्न उठता है कि इस कदम से होगा क्या?
‘योगः कर्मसु कौशलम’
‘समत्वं योग उच्यते’
हममें कार्य को करने की कुशलता आने लगेगी। हम समभाव में स्थित होने लगेंगे।
ओम् सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयते अभीशुभिर्वाजिन इव।
हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।।
बड़ी ही कुशलता से तेज गति से इधर-उधर भागने वाले मन को सहजता और सजगता से नियंत्रित करते हुए हम अपने गंतव्य तक पहुँच जाएंगे। इसके लिए जरूरी है कि हम मन के स्तर पर ही संकल्प लें कि हमारा मन श्रेष्ठ और कल्याणकारी भाव से युक्त रहे। स्व में स्थित रहे।
जहाँ तकनीक से हम तनाव की ओर जा रहे हैं, वहीँ हम तकनीक से ही इससे मुक्ति की तरफ भी चलें। एक तकनीक जो यंत्रवत है हमें तनाव दे रहा है, परन्तु एक तकनीक ऐसी है जहाँ भाव और प्राण जुड़ा है, वह तनाव से मुक्त कर रहा है। तनाव प्रबंधन के लिए जीवन में इसे नियमित शामिल करें-
1. सात दिन सात मिनट तकनीक-
रीढ़ की हड्डी सीढ़ी करके बैठ जाएं। आँखों को बंद करें। सात मिनट, बस सहज रूप से आती-जाती श्वासों के सहज प्रवाह पर अपना ध्यान केंद्रित करें। दस गहरी श्वांस नाभि तक लीजिये और छोड़ें। यह तत्काल आपके तन-मन को विश्राम की स्थिति में ले जायेगा। इसके साथ ही साथ आपको अपनी ओर से खाली रहना है, शांत रहना है। इसी में अपने आप जो शुभ और उचित निर्णय होगा, वह स्वतः ही स्पष्ट हो जाएगा। जीवन में आये बड़े से बड़ा तनाव के समय श्वसन साधना न केवल मजबूती से खड़े रहने का बल प्रदान करेगा अपितु इससे पार पाने का मार्ग भी प्रदान करेगा। कितना भी चंचल मन हो, वह नियंत्रित होने लगेगा।
इसमें सबसे अच्छी बात यह है कि आपको अपने काम को छोड़कर कहीं बाहर जाकर इसे नहीं करना है। अपने ऑफिस में बैठे-बैठे भी आप इसे सहजता से कर सकते हैं।
2. सप्ताह में कम से कम दो दिन आभासी दुनिया से बाहर निकलकर प्रकृति और लोक से जुड़ें। इससे जीवन की जड़ता समाप्त होगी। भाव की प्रधानता होगी और जीवंतता जागृत होगी। अनुशासित होंगे। जीवन में एक रीत आएगी। परिणाम-तनाव आपको छू तक नहीं जायेगा।
एक बात याद रखिए, यह आपका जीवन है और इसे आपको ही बुनना पड़ेगा। इस अमूल्य मानव जीवन को किसी मेकेनाइज्ड तकनीक के हवाले न करें, बल्कि आध्यात्मिक तकनीक (योग) को सौंप कर तनाव से मुक्त जीवन जीएं।

(लेखिका ज्योतिष, योग और अध्यात्म की जानकार हैं।)

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