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The Thermometer.2—आयुर्वेद में हर रोग का उपचार: डॉ. महेश व्यास

The Thermometer.2—आयुर्वेद में हर रोग का उपचार: डॉ. महेश व्यास

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराओं में आयुर्वेद भी महत्चपूर्ण है। The Thermometer.2 के दूसरे एपिसोड में उपस्थित हैं अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान, दिल्ली के डीन और प्रोफेसर डॉक्टर महेश व्यास जो आयुर्वेद की ताकत और इसे लेकर समाज में फैली भ्रामक धारणओं से मुक्त कराते हैं। उनसे स्वस्थ भारत के समूह संपादक आशुतोष कुमार सिंह ने बात की है।

आशुतोष: वर्तमान स्थिति के मद्देनजर आयुर्वेद कहां है?
डॉ. व्यास: आयुर्वेद आज जन-जन में है, पूरे विश्व में है और प्रधानमंत्री जी ने एक स्लोगन दिया था—वसुधैव कुटुंबकम यानी पूरी वसुधा, पूरी पृथ्वी एक कुटुंब के समान है और आयुर्वेद आज पूरी पृथ्वी पर है। विश्व के अधिकतम देशों में आयुर्वेद की उपस्थिति है। अभी दो प्रोग्राम हुए थे। एक अहमदाबाद में ग्लोबल समिट हुआ था और दूसरा ग्लोबल समिट अभी दिल्ली में प्रगति मैदान में हुआ दिसंबर में। उसमें कई देशों का प्रतिनिधित्व था। ये प्रतिनिधित्व सिद्ध करता है कि आज आयुर्वेद पूरे विश्व में पहुंच रहा है।

आशुतोष: आप आयुर्वेद को वैश्विक मान रहे हैं। लेकिन जब हम भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में जाते हैं और खासकर मॉडर्न मेडिसिन के आने के बाद जो धारणा बनी है, उससे लोगों में आयुर्वेद को लेकर तमाम तरह की भ्रांतियां हैं। आप इस दूर करें। तो सबसे पहली भ्रांति कि आयुर्वेद साइंटिफिक नहीं है।
डॉ. व्यास: जो लोग आयुर्वेद से अच्छे से जुड़े नहीं है और जिन्होंने आयुर्वेद के चिकित्सालय, अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान आदि विजिट नहीं किए हैं तो वो ऐसा कह सकते हैं। जिन्होंने ऐसे संस्थानों को देखा हो वे नहीं कह सकते। जामनगर का संस्थान है। एनआईए, जयपुर है, बीएचयू है। भारत में आयुर्वेद के कितने ही ऐसे संस्थान हैं जो रिसर्च आधारित हैं। आज के परिप्रेक्ष्य में देखेंगे तो कोई व्यक्ति कह ही नहीं सकता है कि आयुर्वेद साइंटिफिक नहीं है। आयुर्वेद हर साइंटिफिक पैरामीटर को फॉलो करता है। चाहे वो मेडिसिन को बनाने की बात हो या बीमारी के उपचार की। पहले क्या होता था? किसी व्यक्ति ने कैंसर का उपचार किया और वो ये कहता था कि मैंने 100—200 लोगों का इलाज किया। बहुत अच्छा रिजल्ट निकला तो वो एक्सेप्टेबल नहीं है। आज का साइंस प्रमाण मांगता है। आज जितने सरकारी या प्राइवेट संस्थान हैं, उन सब में भारत सरकार ने एक ही पॉलिसी लागू कर रखी है कि ये सब व्यवस्था वहां उपलब्ध हो। मतलब उपचार से पहले आप जांच करवाइए। फिर मेडिसिन ट्रीटमेंट के बाद में जांच कराइए। अगर आपके पास में दोनों तरह की जांच की रिपोर्ट है, एविडेंस है तो उसको दुनिया में कोई भी नहीं नकार सकता है और वहीं सिद्ध होता है कि आयुर्वेद साइंटिफिक है।

आशुतोष: यह भी आरोप है कि आयुर्वेद बहुत धीरे काम करता है।
डॉ. व्यास: कुछ कंडीशन ऐसी होती है जैसे सीवियर पेन है तो उसमें एलोपैथी बहुत अच्छी मेडिसिन है। पेन किलर लेंगे तुरंत आराम हो जाएगा। लेकिन वहीं बीमारी आमवात है, अर्थराइटिस या जिसको संधिवात कहते हैं, अलग-अलग स्पोंडिलाइटिस है, कटिशूल है, अलग-अलग जितने पेन है तो इस हालत में आयुर्वेद की दवा के असर में थोड़ा समय लगता है। वजह भी है। आयुर्वेद उस रोग के मूल कारण पर काम कर दूर करने का प्रयास करती है। आयुर्वेद को पेन किलर के रूप में यूज़ नहीं किया जा सकता। हम व्याधि का शमन करना चाहते हैं और इसमें कुछ समय लगता है लेकिन ये हर रोग के संदर्भ में नहीं है। आपको कोरोना का उदाहरण देना चाहूंगा। उस वक्त अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान कोरोना हॉस्पिटल था और यहां कोरोना पॉजिटिव मरीजों को हमने एडमिट कर आयुर्वेदिक दवा से उपचारित किया। उपचार के बाद आरटीपीसीआर टेस्ट किया गया। जब वह निगेटिव निकला तब डिस्चार्ज किया गया। आज सबको मालूम है कि सात, आठ, नौ दिन तक ट्रीटमेंट लेने के बाद में पॉजिटिव पेशेंट नेगेटिव हो जाते हैं। आयुर्वेद के द्वारा भी इतना ही समय लगा। तो कैसे कह सकते हैं कि आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का परिणाम बहुत लेट मिलता है। हां, अगर कोरोना के मरीज एक—दो महीने में ठीक होते तब कहा सकता था। इसका मतलब है कि आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति भी अलग-अलग रोग में उसके मान से सही परिणाम तुरंत देती है।

आशुतोष: एक भ्रांति और है कि आयुर्वेद में गए तो भाग्य भरोसे ही उपचार होगा।
डॉ. व्यास: दरअसल आज के इस वैज्ञानिक युग में आयुर्वेद की ताकत को नहीं जानने वाले ही ऐसा कहते हैं। हर साइंस की अपनी ताकत होती है तो कमजोरी भी। हमारा 200 बेड का हॉस्पिटल है। प्राय: आईपीडी फुल रहती है। अभी 2024 में प्रधानमंत्री जी ने सेकंड फेज का उद्घाटन किया और 300 बेड का हॉस्पिटल तैयार हुआ। अब इतने मरीज आते हैं कि हमको आईपीडी कम पड़ती है। ओपीडी में रोज करीब 3000 के करीब मरीज आते हैं। हमारे डॉक्टर सुबह के समय आईपीडी और ओपीडी में ही रहते हैं। केवल भाग्य के भरोसे कुछ भी नहीं होता है। यहां सब कुछ साइंटिफिक आधार पर काम होता है। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में तीन चिकित्सा है। एक है देवीपाश्रय, दूसरा युक्ति व्यापाश्रय और तीसरा सत्ता विजय युक्ति व्यापाश्रय। इसमें अपन अलग-अलग टाइप की दवा का प्रयोग करते हैं, ये युक्ति व्यपाश्रय कहलाता है। सत्ता विजय उसको कहते हैं जहां मन से संबंधित व्याधियां हैं, डिप्रेशन—एंग्जायटी है। इनके लिए हम अलग-अलग चिकित्सा करते हैं। दैव्यपाश में हम आहार—विहार को प्राथमिकता देते हुए बिना दवा के मरीज को ठीक कर सकते हैं। हमारे यहां तो यहां तक कहा गया है कि शक्यते अपि अन्न मात्रण नरक करतुम निरामय मतलब अगर सही डाइट और लाइफ स्टाइल को फॉलो किया जाए बिना दवा के भी व्यक्ति को पूर्ण स्वस्थ रखा जा सकता है। तो आयुर्वेद ऐसा है।

आशुतोष: आज की युवा पीढ़ी को ये बताया जाता है कि आयुर्वेद का मतलब दादी अम्मा ने जो नुस्खा बताया, वही आयुर्वेद है।
डॉ. व्यास: जिन लोगों ने आयुर्वेद केवल घर में यूज किया कि कभी खांसी हो गई तो दादी ने तुलसी का रस— शहद दे दिया और वो बिल्कुल ठीक हो गए तो उनको लगता है कि आयुर्वेद में दादी नानी का नुस्खा है। उससे ज्यादा आगे वो नहीं आए लेकिन जब कोई क्रॉनिक डिजीज होती है, लिवर डिसऑर्डर है, डायबिटीज है, हृदय रोग है और इनके मरीज जब हॉस्पिटल में आकर ट्रीटमेंट करवाते हैं तब उनको लगता है कि आयुर्वेद केवल दादी नानी का नुस्खा नहीं है। आयुर्वेद साइंटिफिक है। हम इस संस्थान में रिसर्च करते हैं और जब रिजल्ट मिलता है और उस रिसर्च को जब पब्लिश किया जाता है विश्व के बेस्ट जर्नल में। अभी हमने कोरोना काल में जो किया था, उसको फ्रंटियर रिसर्च जर्नल ने पब्लिश किया और उस जर्नल में अगर कोई पेपर पब्लिश हुआ है तो इसका मतलब है कि साइंटिफिक है। अगर पूरा विश्व उसको स्वीकार करता है तो धारणा भी बदलनी चाहिए।

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आशुतोष: धारणा तो ये भी है कि यह देवों की चिकित्सा है। तो जो शाकाहारी हैं उन्हीं का उपचार होगा।
डॉ. व्यास: देखिए ऐसा है कि बिल्कुल आपने जो कहा देवी चिकित्सा मतलब तब से माने इसको अगर कहा जाए तो ब्रह्मा से सृष्टि जब प्रारंभ हुई थी तब भी व्यक्ति स्वस्थ रहे तब से प्रारंभ हुआ और आचार्य सुश्रुत ने सुश्रुत संहिता में कहा अनुत्पाद प्रजा माने ब्रह्मा ने सृष्टि की उत्पत्ति नहीं करी थी उससे पहले उनके स्वास्थ कैसा रहे उसके लिए योजना आयुर्वेद की श्लोक उन्होंने श्लोक सहस्त्र अध्याय सहस्त्रम स्वयंभू तो आज अपन कोई भी काम करते है उसका प्लानिंग पहले कर लेते है की यहां पे हमको क्या दिक्कत आएगी तो ये आयुर्वेद तब से प्रारंभ हुआ तो ये कहने का मतलब है कि तब से चला आ रहा है आज से 5000 साल या जितना पुराना कह सकें विश्व की सबसे प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति है पूरा विश्व एक्सेप्ट करता है कि वेद जो है सबसे प्राचीनतम ग्रंथ है और आयुर्वेद वेद का उपवेद है वेद का इसलिए प्राचीनतम हो गया अब केवल यहां पर जो मैंने आपको बताया था हमारे हमारे यहां जो औषधियों का प्रयोग किया जाता है उसमें हर्बल ड्रग का उपयोग करते हैं। हम जो वनस्पतियां है उनका प्रयोग करते हैं। हम मैटेलिक प्रिपरेशन का प्रयोग करते हैं। स्वर्ण, रजत, ताम्र, लोह, नाग, वंग, यशद, मरकरी इन सबका इन सबका शोधन करके आयुर्वेद में मेथड बता रखी है। उसके द्वारा औषधि का निर्माण करते हैं। आयुर्वेद में मंत्र आदि का भी प्रयोग है। लेकिन आयुर्वेद में कुछ व्याधियों में जैसे उदाहरण के रूप में यक्ष्मा है। तो वहां पर कई प्रकार के मांस रस का प्रयोग बता रखा है। वो चिकित्सा के रूप में है। तो इसलिए आयुर्वेद चिकित्सा को बताता है। मुख्यता हमारे यहां हर्बल ड्रग है। उसके बाद में और आवश्यकता लगती है प्रारंभिक अवस्था में वो है। अगर कुछ ज्यादा आवश्यकता लगती है तब भस्मों आदि का प्रयोग है। तो कई प्रकार के आयुर्वेद में जिनसे भी चिकित्सा हो सकती है। आयुर्वेद में उन सबका वर्णन है।

आशुतोष: तो क्या जो मांसाहारी है वो भी उपचार करा सकता है? उनको भी सही परिणाम मिलता है?
डॉ. व्यास: हमारे यहां यह नहीं पूछा जाता कि वो वेजिटेरियन है या नॉन वेजिटेरियन लेकिन यह जरूर पूछते हैं कि आप क्या-क्या खाते हैं। जब हमें लगता है कि इससे उनके निदान में बाधा हो सकती है तब हम उसे बंद करवा देते है।

आशुतोष: अभी के समय में बहुत सी दवाइयां ऐसी है जो लगातार चलती रहतह है। जैसे बीपी, शुगर आदि। उसके बाद भी उनको कोई व्याधि अलग से हो जाए और आयुर्वेद की मेडिसिन लें डर भी रहता है कि वे रेगुलर वाली दवा तो बंद न हो जाए। आयुर्वेद में ऐसा कुछ है क्या?
डॉ. व्यास: हम मरीज को कहते हैं कि किसी एक चिकित्सा पद्धति को फॉलो करें। या तो आयुर्वेद का ट्रीटमेंट ले या एलोपैथी और होम्योपैथी का। हर चिकित्सा पद्धति का परिणाम रहता है लेकिन कुछ मेडिसिन ऐसी होती है जिनका ड्रग इंटरेक्शन होता है कि ये दो दवाइयां साथ में नहीं लेना। तब ऐसी चीज को हम बंद करवा देते हैं कि या तो वो लीजिए या ये लीजिए। कुछ मेडिसिन ऐसी होती है जिनको दूसरी मेडिसिन के साथ भी ले सकते हैं और इस पर हमने कई रिसर्च वर्क किए हैं। आपकी जो मेडिसिन चल रही है वो चलने दीजिए। साथ में आयुर्वेद की मेडिसिन ले लीजिए। कुछ ऐसे भी होते हैं जिसमें कहते हैं कि केवल आयुर्वेद की मेडिसिन लेनी है। यह स्थिति पर निर्भर है कि उसमें किस चीज की आवश्यकता है। मतलब ये सार्वभौमिक सत्य नहीं है। जहां आवश्यकता लगती है कि रेफर करने की जरूरत है तो यह भी करते हैं कि इनका आयुर्वेद का ट्रीटमेंट चल रहा था। अब आप करिए। मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को स्वस्थ करना है। चाहे किसी पैथी से वो ठीक हो।

आशुतोष: एक भ्रम या आरोप ये है कि आयुर्वेद की औषधि का एक्सपायरी डेट नहीं होती है।
डॉ. व्यास: जिनको आयुर्वेद का अच्छे से ज्ञान नहीं है वो ये कह सकते हैं। आयुर्वेद के हर मेडिसिन पर उसका मैन्युफैक्चरिंग डेट रहता है और ये एक्सपायरी। इसमें क्या है कि अलग-अलग टाइप की मेडिसिन है। जिस व्यक्ति ने आशा वरिष्ठ लिया या कुछ प्रकार की घृत बनते हैं, वो लिया था तो उसकी वैलिडिटी बहुत लंबी रहती है। तब उनको लगता है कि इसमें एक्सपायरी है ही नहीं। लेकिन वही पाउडर हो या हर्बल ड्रग की टेबलेट की एक्सपायरी कम रहती है क्योंकि ज्यादा समय तक रखने पर उसका परिणाम नहीं मिलता है। कुछ मेडिसिन 6 महीने से साल भर के बाद उपयोग नहीं कर पाते हैं। कुछ मेडिसिन ऐसी है कि 10 साल तक भी उनका प्रयोग कर सकते हैं।

आशुतोष: एक और मिसकंसेप्शन है कि आयुर्वेद में तो असाध्य रोगों का इलाज शायद नहीं होता। सिर्फ छोटी— मोटी बीमारियों का इलाज वैद्य करते हैं। इस तरह के भ्रम को दूर किया जाए?
डॉ. व्यास: बिल्कुल दूर करने की जरूरत है और मैं तो कहूंगा कि आप किसी दिन हमारे हॉस्पिटल आएं। यहां आने वाले मरीज को देखें। हमारे यहां कैंसर का ट्रीटमेंट किया जाता है। इस पर अन्य मुख्य संस्थानों के साथ में एम्स से भी समझौता है। छोटे बच्चों में सेलेब्रल पालसी होती है। उनको यहां ट्रीटमेंट मिलता है तो ऐसा नहीं कि क्रोनिक डिजीज का हम ट्रीटमेंट नहीं करते। जो आयुर्वेद की ताकत है, उसमें जो भी कुछ संभव है उस सबको हम करते हैं। हम ये दावा नहीं करते हैं कि जो भी कुछ है, हम सब कुछ ठीक करेंगे। इस मिथ को दूर करने के लिए सबसे अच्छी बात है एक बार इंस्टिट्यूशन विजिट करें तो उनको दिखेगा कि यहां 49 से ज्यादा ओपीडी है अलग-अलग स्पेशलिटी के। केवल ये नहीं कह सकते हम कफ कोल्ड का ट्रीटमेंट करते हैं। हम क्रॉनिक डिजीज का ट्रीटमेंट करते हैं और हमारे जितने रिसर्च पेपर हैं क्रॉनिक डिजीज पर, सब पब्लिश हुए हैं जिनमें रिजल्ट मिले हैं। हमारे यहां 80 प्रतिशत मरीज ऐसे आते हैं जो बिल्कुल बुरी स्थिति में होते हैं। उनको मेरी एक सलाह है कि वह प्रारम में अगर आयुर्वेद में आएंगे तो उनको जल्दी और अच्छा रिजल्ट मिलेगा।

आशुतोष: यह भी कहा जाता है कि बच्चों का उपचार आयुर्वेद में नहीं होता। सिर्फ बुजुर्गों का होता है।
डॉ. व्यास: कई लोगों को ऐसा लगता है कि हमेशा आयुर्वेद की दवा लेते हुए बुजुर्ग लोग ही दिखते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। आयुर्वेद में जो मुख्य ग्रंथ है चरक संहिता जिसमें सभी प्रकार की चिकित्सा बताई गई है। आचार्य सुश्रुत के सुश्रुत संहिता में संस्कृति बताई गई और आचार्य काश्यप का ग्रंथ बच्चों के लिए है। माने जितना महत्व बड़ों को दिया गया, उतना ही महत्व बच्चों को भी दिया गया और हमारे यहां इसकी स्पेशलिटी है। शिशु रोग विशेषज्ञ होते हैं। उसमें अलग से एमडी होती है। इसलिए यहां पर बच्चों के लिए भी और नियोनेटल केयर की पूरी व्यवस्था है। छोटे बच्चों को इंटेंसिव केयर की जरूरत पड़ती है और वो सुविधा भी आयुर्वेद में उपलब्ध है। बच्चों के लिए पूरा सिस्टम कि उनका खानपान क्या हो। आयुर्वेद तो इतना एडवांस है कि जांच कर बता देते हैं कि इनको ये तकलीफ है। छोटा बच्चा बता तो नहीं सकता कि मेरे पेट में दर्द हो रहा है। वो रो सकता है। उसको सिर दर्द भी होगा तो भी रोएगा। उसको हाथ पांव में कहीं दर्द है तो भी रोएगा। लेकिन उन लक्षणों के आधार पर हम रोग बता देते हैं। आयुर्वेद तो प्रारंभ से ही बच्चों के ऊपर भी ध्यान देता है। वैद्य जी सिर्फ बुजुर्गों का ही इलाज करेंगे, ऐसी बात नहीं है।

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आशुतोष: आयुर्वेद में पंचकर्म क्या है और कैसे स्वास्थ्य को ठीक करता है?
डॉ. व्यास: आजकल क्रॉनिक डिजीज में पंचकर्म का बहुत अच्छा रिजल्ट है। कोई अर्थराइटिस वाला आया या किसी को गंभीर स्किन डिजीज। उसने पंचकर्म कराया, बहुत अच्छा रिजल्ट मिला। लेकिन आयुर्वेद में औषध चिकित्सा भी है। सत्वाजय चिकित्सा भी है। अलग-अलग ट्रीटमेंट के तरीके हैं। हमारे यहां 49 ओपीडी हैं जिसमें पंचकर्म की दो ओपीडी है। उसकी एक विशेषता और है। पंचकर्म की ऐसी चिकित्सा है कि आप बिल्कुल स्वस्थ हैं तो भी साल में दो बार यानी वसंत ऋतु के समय एक बार वमन करवा लीजिए। आप शरद ऋतु के समय जो नवरात्रि का समय रहता है, तब एक बार विरेचन करा लीजिए। बारिश के मौसम में आप बस्ती करवा लीजिए तो आप पूर्ण स्वस्थ रहेंगे। बिना किसी बीमारी के भी पंचकर्म चिकित्सा का प्रयोग होता है।

आशुतोष: पंचकर्म से संबंधित वमन आदि तीनों शब्दों के विस्तार से बताएं क्योंकि ये टेक्निकल शब्द हैं।
डॉ. व्यास: शरीर में तीन दोष होते हैं। वात, पित्त और कफ। इन्हीं दोषों के असंतुलन से रोग होते हैं। अगर आपने मीठा बहुत खाया या कहना चाहिए कि घी आदि तली हुई चीजें खाई तो कफ दोष बढ़ गया या फिर स्पाइसी चीजें ज्यादा खाई, पित्त दोष बढ़ गया या जो चीजें रुक्षद्रव्य रहते हैं वो वात को बढ़ा देते हैं। तो ये तीन दोष होते हैं जिनसे सारी बीमारियां होती हैं जिसको नॉन कम्युनिकबल डिजीज बोलते हैं। इन तीनों को ठीक करने के लिए पंचकर्म के मान से जो बेस्ट चिकित्सा है कफ दोष के लिए वुमन। वसंत ऋतु जब प्रारंभ होती है तब कफ की काफी समस्या होती है। उसको दूर करने के लिए वमन है। जब नवरात्रि का समय रहता है या शरद ऋतु प्रारंभ होती है, हेमंत और शिशु ऋतु आती है तब पित्त का प्रकोप रहता है। पित्त को दूर करने के लिए विरेचन काम करता है। वर्षा ऋतु में वात का प्रकोप रहता है। जिन लोगों को अस्थमा रहता है ना बारिश के मौसम में उनको अस्थमा की तकलीफ बढ़ जाती है क्योंकि वात दोष मुख्य रहता है। वात का शमन के लिए हम बस्ती का प्रयोग करते हैं और बस्ती ऑयल के द्वारा होता है। वमन में शहद का प्रयोग किया जाता है और पित्त के लिए ग्रत सबसे बढ़िया है। हमारा कहने का अभिप्राय कि व्याधि होने से पहले ही अगर इन तीनों दोषों का शमन कर दिया जाए तो व्यक्ति एकदम स्वस्थ रहेगा। तो पंचकर्म स्वस्थ व्यक्ति के लिए भी बताया गया है और पंचकर्म अलग-अलग डिजीज में भी।

आशुतोष: ये कितने दिन का कोर्स होता है?
डॉ. व्यास: अगर पूरा पंचकर्म करवाना है तो उसमें 100 दिन से ज्यादा लगते हैं। लेकिन किसकी आवश्यकता है? जैसे वमन करवाया तो यह घर पर हो जाता है। तीन दिन का स्नेहपान कराया, चौथे दिन वमन करा दिया। माने एक सप्ताह की छुट्टी चाहिए। ऐसे ही विरेचन के लिए स्नेहपान प्रारंभ किया। चिकित्सक के परामर्श से तीन दिन का स्वेदन किया, फिर विरेचन कराया माने एक सप्ताह की अवधि में वमन और विरेचन हो जाता है। बस्ती जो है काल योग, बस्ती कर्म, बस्ती योग बस्ती माने आठ 15 और 30 तो उसमें कितनी बस्ती करनी है, किसकी आवश्यकता है, उसके मान से वो करते हैं। पंचकर्म के लिए एक बात कही जाती है— दोष कदाचित कुप्यंते जीता लंघन पाचने मने औषधि के द्वारा चिकित्सा कर दोष वापस प्रकोपित होकर उस व्याधि को पकड़ सकते हैं। लेकिन जीता संशोधनेशु न तेशा पुनरंभ माने अगर पंचकर्म के द्वारा आपने व्याधि को शमन किया वो आपको परिणाम काफी अच्छे मिलेंगे और लंबे समय तक व्यक्ति स्वस्थ रहेगा।

आशुतोष: सरकार ने कहा है कि आयुर्वेद के जो चिकित्सक हैं, वो भी एलोपैथ की कुछ दवाइयां लिख सकते हैं। इसको लेकर के राष्ट्रीय स्तर पर तमाम संगठन उसका विरोध कर रहे हैं। आपका क्या इस पर स्टैंड है?
डॉ. व्यास: मैं जिस संस्थान में हूं, वहां केस पेपर या पेशेंट देख लीजिए। हमारी एक भी एलोपैथिक मेडिसिन उसके ऊपर नहीं रहेगी। हम ट्रीटमेंट करते हैं कंप्लीट आयुर्वेद के द्वारा। अब अगर किसी कंडीशन में आवश्यकता लग जाती है कि उनको कुछ एलोपैथी मेडिसिन की जरूरत है तो हमारे यहां एलोपैथी के स्पेशलिस्ट डॉक्टर हैं। हम उनको भेज देते हैं कि आप इनको देख लीजिए। मेरा ये कहना है कि जो व्यक्ति जिसका स्पेशलिस्ट है, वो उसका ही प्रयोग करता है। पर इमरजेंसी में कहीं आवश्यकता है तो बिल्कुल प्रयोग करना चाहिए। हम स्वयं नहीं कर रहे तो एलोपैथी का जो विशेषज्ञ है, उसके द्वारा कर लिया जाए। हमारा उद्देश्य ये है कि व्यक्ति स्वस्थ हो। जो भी व्यक्ति आए, वो स्वस्थ होकर जाए। अब आयुर्वेद अगर उसमें सक्षम है तो हम उसका प्रयोग करेंगे। अगर आयुर्वेद में कहीं आवश्यकता लगती है तो हम उनका सहयोग भी लेंगे। तो इसलिए एक धारणा ऐसी होना चाहिए कि केवल ये नहीं होना चाहिए कि आयुर्वेद है तो केवल आयुर्वेद के ऊपर ध्यान दें। हमें व्यक्ति को स्वस्थ करना है। आप दूसरों की सहायता भी ले सकते हैं। इसी का नाम है इंटीग्रेशन। होलिस्टिक अप्रोच और अभी तो भारत सरकार यहां तक करने जा रही है कि जितने ऑल इंडिया ऑफ मेडिकल साइंस खुल रहे हैं, उनमें साथ में आयुर्वेद भी है। अगर उनको लगता है कि इस डिजीज के लिए हम आयुर्वेद के पास भेज देते हैं तो वो हमारे पास भेज देते हैं। जहां हमको लगता है पेशेंट भले ही हमारे पास आया लेकिन एलोपैथिक एक्सपर्ट के पास भेजने की जरूरत है तो हम उनके पास भेज देते हैं। ये कोई विवाद का विषय नहीं है। मुख्य उद्देश्य है व्यक्ति को स्वस्थ करना।

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आशुतोष: आयुर्वेद की यूएसपी क्या है? मतलब कुछ ऐसी बीमारियां है जिस पर इस पर हम सिद्धस्थ है कि इसको तो हम ठीक कर ही देंगे।
डॉ. व्यास: हमारे यहां कई तरह के पेशेंट आते हैं। डायबिटीज के भी पेशेंट आते हैं। अब डायबिटीज की कंडीशन है कि अगर स्टार्टिंग में पकड़ में आ गया हम उसे बिल्कुल कंट्रोल में रख सकते हैं। यहां तक कि केवल डाइट लाइफस्टाइल के बिना मेडिसिन के भी उसको हम वो कर सकते हैं। लेकिन अगर पेशेंट इंसुलिन लेने के बाद में 10 साल तक डायबिटीक है। एचबी वन से 10 से ऊपर बढ़ जाए और उस कंडीशन में आए तब हम कभी दावा नहीं करते हैं कि हम इनको बिना मेडिसिन के ही ठीक कर देंगे। आयुर्वेद की जो मेडिसिन है वो बिल्कुल प्रभावी है। चाहे हृदय रोग हो या मधुमेह, श्वास की प्रॉब्लम, ओबेसिटी, अर्थराइटिस, जीर्ण व्याधियां जितनी हो, उन सब में आयुर्वेद का अच्छा प्रभाव है। लेकिन बात ये है काले च आरंभते कर्म य तत साद। सही समय पर अगर आपने चिकित्सा प्रारंभ की, सही समय पर आपने चिकित्सक का मार्गदर्शन ले लिया और उसको फॉलो किया तो अच्छे परिणाम मिलेंगे। अन्यथा आप आयुर्वेद चिकित्सालय क्या, बड़े से बड़े इंस्टिट्यूशन में चले जाइए और लास्ट में गए तो कई बार डॉक्टर यही कहता है कि आप इनको थोड़ा सा पहले ले आते। आयुर्वेद की औषधियां प्राय: मैक्सिमम डिजीज में बहुत अच्छा परिणाम देती है।

आशुतोष: आयुर्वेदिक दवाओं को लेकर प्रचार माध्यमों में जिस तरह ठीक हो जाने का दावा किया जा रहा है वो कितना सही है? क्या उस पर ध्यान देने की जरूरत है?
डॉ. व्यास: भारत सरकार ने सबके लिए एक नियम लागू कर रखा है। जीएमपी सर्टिफाइड फार्मेसी में बनी हुई मेडिसिन। क्योंकि जो गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिससेस जीएमपी सर्टिफाइड रहती है, उसको प्रॉपर वे में उन्होंने फॉलो कर रखा है या नहीं। भारत सरकार ने फार्माकोपिया बना रखा है। फार्मुलरी ऑफ इंडिया पर ही बना रखी है कि ये—ये मेडिसिन है। इसके ये इंग्रेडिएंट हैं, ये बनाने की मेथड है। उसको फॉलो करके अगर मेडिसिन बनाई गई वो बिल्कुल अच्छी है। अगर कोई व्यक्ति उनको फॉलो नहीं करता है तो वो कई प्रकार के और दूसरे उपद्रव उत्पन्न कर सकता है। मेरा हर व्यक्ति से यही कहना है कि हर किसी से कोई भी चीज आप नहीं लें। आप आप चिकित्सक को बताइए, विशेषज्ञ को बताइए। वो जो मेडिसिन लिखे हैं वो जीएमपी सर्टिफाइड फार्मेसी से खरीदिए तो आयुर्वेद की मेडिसिन भी बिल्कुल बेस्ट है।

आशुतोष: आम आदमी स्वस्थ रहे तो कैसे रहे? इस पर आपका संदेश क्या है?
डॉ. व्यास: आयुर्वेद का मूल मंत्र है आहार, निद्रा और व्यायाम। एक तो समय पर भोजन करें और ताजा घर का बना हुआ भोजन करें या घर जैसा भोजन करें। आप स्वस्थ रहेंगे। पर्याप्त मात्रा में नींद लें। आप रात भर जग रहे हैं। कंप्यूटर पर लगे हुए हैं। मोबाइल की स्क्रीन दिन भर देख रहे हैं। टीवी देख रहे हैं। ऐसा नहीं करें। 10 से 10:30 बजे तक सो जाएं। सुबह समय पर उठें। निद्रा पर्याप्त लें। इससे आपकी इम्युनिटी अच्छी रहेगी। आहार ठीक लें। दूसरा व्यायाम है। अगर प्रतिदिन कुछ व्यायाम करते हैं तो आपकी इम्युनिटी इतनी अच्छी रहेगी कि आप बीमारी नहीं होंगे। हमने कोरोना काल में देखा। जो पेशेंट एडमिट होते थे, हम उनकी हिस्ट्री लेते थे और पूछने पर मरीज कहते थे कि एक्सरसाइज तो टाइम ही नहीं मिलता है। सोने—खाने का भी निर्धारित समय नहीं है। ऐसे लोगों में लक्षण ज्यादा मिले क्योंकि उनकी इम्युनिटी कम थी। उनको हॉस्पिटलाइज करना पड़ा। लेकिन नियमित व्यायाम, समय पर भोजन, पर्याप्त निद्रा लेने वाले मरीज बहुत कम थे। जो सही तरीके से जीवन जी रहे थे, उनको कोरोना पॉजिटिव होते हुए भी हॉस्पिटल में एडमिट होने की आवश्यकता नहीं लगी। मेरा हर व्यक्ति को कहना है कि आयुर्वेद का मूल मंत्र है—आहार, निद्रा और व्यायाम। इन तीन को जीवन में अपनाइए तो आप अपने परिवार को, समाज को, राष्ट्र को या पूरे विश्व को स्वस्थ बना सकते हैं।

प्रस्तुति—अजय वर्मा

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