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The thermometer—रंगीन कॉन्टेक्ट लेंस लगाना नुकसानदेह: डॉ. नीतू

The thermometer—रंगीन कॉन्टेक्ट लेंस लगाना नुकसानदेह: डॉ. नीतू

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। यू—ट्यूब के The thermometer के 8वें एपिसोड में के आंख संबंधी रोगों के जाने माने विशेषज्ञ डॉक्टर नीतू गगनेजा अरोड़ा के साथ स्वस्थ भारत मीडिया के समूह संपादक आशुतोष कुमार सिंह से लंबी बातचीत हुई थी। पहले हिस्से में आपने जाना कि आंखों की देखभाल कैसे करनी है। प्रस्तुत है उनसे बातचीत का दूसरा और अंतिम हिस्सा जिसमें उन्होंने आंखों की कुछ जटिल रोगों के बारे में विस्तार से बताया है।

आशुतोष: आज के फैशन युग में बालों को रंगने की तरह आंखों को लिए भी अलग-अलग कलर, लेंस का प्रयोग करते हैं। युवाओं में ये चलन है।
डॉ. नीतू: ये बहुत अच्छा सवाल पूछा आपने। इसे कलर्ड कांटेक्ट लेंसेस बोलते हैं। यह नुकसानदेह है। जैसे ही हम कांटेक्ट लेंस लगाते हैं तो आंख में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। दूसरा, कलर्ड लेंस किस तरीके से लगाए जा रहे हैं। हाइजीनिक लगा रहे हैं या नहीं। उसमें इनफेक्शन होने के चांस होते हैं। अगर एक बार इनफेक्शन हो गया कॉर्निया में तो वो कई बार ठीक होने में महीनों लग जाता है। केयरफुल रहें और कलर्ड कांटेक्ट लेंस अवॉइड करें।

आशुतोष: आंखों में होने वाली कौन-कौन सी बीमारियां मुख्य है ?
डॉ. नीतू: आंखों में बहुत तरह की बीमारी होती है। आंख को हम डिवाइड करते हैं बहुत सारे पार्ट्स में। इंटीरियर लेयर, पोस्टीरियर लेयर और आगे की जो सबसे कॉमन बीमारी हम देख रहे हैं अभी, वो है रिफैक्टिव एरर जिसमें हम मायोपिया इंक्लूड कहते हैं जिसमें चश्मे का नंबर आता है। दूसरा एडल्ट्स में देखी जाने वाली बीमारी सफेद मोतियाबिंद। काला मोतिया ग्लूकोमा कहलाता है। तीसरी चीज है कि शुगर, डायबिटीज बहुत ज्यादा हो रही है अभी। उसके कारण पर्दे में बदलाव आता है। डायबिटीज और ब्लड प्रेशर के कारण। बहुत सारी दवाइयां भी हैं जिनके कारण आंखों की नसों पर इफेक्ट आता है। इस सबका समय पर उपचार कराना जरूरी होता है। समय पर अगर हम डायग्नोस कर लेते हैं तो अर्ली ट्रीटमेंट हो जाता है। नहीं तो कई बार वो ऑपरेशन भी करना पड़ता है।

आशुतोष: सर्जरी को लेकर लोगों में डर भी तो होता है। आज के तकनीकी युग में आंखों की सर्जरी कितना सफल है?
डॉ. नीतू: अब टेक्नोलॉजी बहुत बदल गई है। पहले बहुत लंबा कट लगता था। अब फेको इमल्सिफिकेशन सर्जरी है। छोटा कट लगता है। एमएम में कट लगता है। वो आपको पता भी नहीं लगता। डे केयर सर्जरी होती है। बहुत ही कंफर्टेबल है। अधिकतम 15 से 20 मिनट।

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आशुतोष: इसमें खर्चा कितना आता है?
डॉ. नीतू: खर्चा वेरी करता है लेंस में। जो भी आप लेंस पसंद करते हैं उसके मुताबिक खर्चा लगता है। तरह-तरह के लेंस होते हैं। अब तो ऐसे लेंस आ गए हैं कि आपको मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बादचश्मा लगाने की जरूरत ही ना पड़े। वो यही बात है कि जितना आप मीठा डालते जाओ, उतना अच्छा होता जाएगा।

आशुतोष: मोतियाबिंद की सर्जरी पर आने वाला मोटा—मोटी खर्च कितना होता है?
डॉ. नीतू: 10 से 12000 में भी सर्जरी होती है और सफल भी। हर चीज लेंस तय करती है। अगर सर्जरी अच्छी है तो आप कोई भी लेंस लगाएं, उसमें अच्छा दिखेगा। बिलकुल सामान्य लेंस से भी।

आशुतोष: इन दिनों दिल्ली एनसीआर की हवा है वो दूषित हो चुकी है। 400 से ज्यादा एयर क्वालिटी इंडेक्स है। ऐसे में सांस लेना बहुत मुश्किल है। सांसों को दुरुस्त करने के लिए एयर प्यूरीफायर का भी इस्तेमाल करने लगे हैं। लेकिन आंखों के लिए क्या करें?
डॉ. नीतू: यह बिल्कुल सही सवाल पूछा आपने। मेरे पास बहुत सारे ऐसे मरीज आ रहे हैं जो इससे प्रभावित हैं। आंखों में लाली, चुभन और इनफेक्शन के केस बहुत बढ़ रहे हैं। उससे बचने के लिए जब भी आप निकलें तो कुछ आईवियर प्रोटेक्टिव पहन के निकलें। आप एयर प्यूरीफायर चला रहे हैं तो उसे बीच-बीच में बंद करें। कई बार उससे भी आंखें प्रभावित होती हैं।

आशुतोष: अगर कोई मेडिकल छात्र आई सर्जन बनना चाहता है तो उसकी प्रक्रिया क्या है? क्या-क्या करना होगा?
डॉ. नीतू: पहली चीज तो आपको इस ब्रांच से लगाव होना चाहिए तभी आप इस ब्रांच में आएं। बाकी चीजें बाद में आती हैं। आंखों में भी आगे कैटेगरी है। जैसे इंटीरियर सेगमेंट, पोस्टीरियर सेगमेंट। आप मानोगे नहीं कि इतनी छोटी सी आंख में भी पांच—पांच छह-छह फेलोशिप्स होती हैं। आप जो भी ब्रांच पसंद करते हैं उसमें उसमें लगाना पड़ेगा। आगे इस फील्ड में प्रैक्टिस में उतरें या किसी गवर्नमेंट हॉस्पिटल में जॉइन करें। इसमें थोड़ा लर्निंग कर्व है लेकिन एक बार लर्निंग कर्व हो गया तो आपको अच्छा लगेगा जब आपकी वजह से मरीज देख पाएंगे। इसमें इन्वेस्टमेंट भी है लेकिन करियर भी।

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आशुतोष: इसमें करियर कितना उज्जवल है?
डॉ. नीतू: इसमें करियर बहुत अच्छा है। कारण कि तकनीक बदल हो रही है। अभी जो टेक्नोलॉजी आ रही है उसमें पर्दे के ऑपरेशन स्टिचलेस हो गए हैं जिसमें टांके नहीं लगते। पहले पुतली का ऑपरेशन होता था जिसमें बहुत टांके लगते थे, अब नहीं। बहुत ही अच्छे लेवल पर ग्रोथ हो रही है। रोबोटिक आई सर्जरी भी हो रही है। एआई से भी सहयोग मिल रहा है। तकनीक ने बहुत इसको विस्तार दिया है और लोगों को सुविधाएं दी है।

आशुतोष: आंख की ऐसी बीमारियां भी होंगी जिसे देखकर आई स्पेशलिस्ट कहते होंगे कि हालत बिगड़ गयी है। हम कुछ कर नहीं सकते हैं।
डॉ. नीतू: बिल्कुल। ये ऐसी कुछ बीमारियां हैं जैसे नसों की बीमारियां होती हैं। ऑप्टिक न्यूरोपैथी कई बार होता है कि कुछ दवाइयां असर कर जाती हैं या कंजनाइटल ही जैसी पैदाइशी बीमारी जिसमें नस सूख जाती है तो उसमें ज्यादा कुछ इलाज नहीं है। उस पर स्टडीज चल रही है। टाइम सेल थेरेपी उसमें चल रही है।

आशुतोष: आपने जेनेटिक बोला। मैंने भी ऐसे एक केस देखे हैं कि पिता की जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, उनको दिखना कम होता चला गया। फिर उनके बच्चों में भी एक बच्चे को उसी तरह की बीमारी निकली। ये किस तरह की बीमारी है?
डॉ. नीतू: ये पर्दे की बीमारी होती है जिसको हम डिस्ट्रोफीस बोलते हैं। तो उनका जेनेटिक रोल है। इस तरह की चीजों को अभी हम लोग डिस्कवर कर पाए हैं। अभी रिसर्च चल रही है। अभी कुछ कंफर्म नहीं है कि वो कितना कारगर है। लेकिन मैं ये मैसेज जरूर देना चाहूंगी कि घर में किसी को भी अगर ऐसी कोई दिक्कत है तो वो अपने बच्चों को और आगे वाली पीढ़ी की आंख जरूर चेक कराएं ताकि जल्दी पता लगे तो कुछ सप्लीमेंट्स देकर हम उसको डिले कर सकते हैं। एक—दो साल में आने वाला रोग 10 साल में आएगा तो वह भी बहुत बड़ी हेल्प होगी। इसमें हम आंखों में पुतली फैला के ड्रॉप डाल कर पूरी पर्दे की जांच करते हैं। वो जनरली हर आई सेंटर पर होता है। पर्दे का सारा फोटो लिया जाता है। पर्दे की 10 परत होती है। हर परत की स्कैनिंग होती है। जैसे सीटी स्कैन होता है, वैसे आंखों में भी ओसीटी होती है। अगर किसी भी लेयर में कोई दिक्कत आ रही है तो हम उसको वही रोककर ट्रीट कर सकते हैं।

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आशुतोष: लोग जानना चाहते हैं कि इस तरह का कुछ है तो खर्चा क्या लगता होगा?
डॉ: नीतू: दो से 3000 के बीच में यह जांच हो जाती है।

आशुतोष: जब तक जीवित रहना है तब तक यह दोनों आंखें सुरक्षित और स्वस्थ रहे। तो इसके लिए क्या करना जरूरी है?
डॉ. नीतू: सबसे पहले स्क्रीन टाइम को सीमित करें। अगर आप ऐसा नहीं कर सकते तो मैंने पहले भी बताया कि 20—20—20 का रूल जरूर लागू करें। डाइट अपनी अच्छी रखें। हरी पत्तेदार सब्जियां, फल आदि को भोजन में शामिल करें। अगर आप स्क्रीन देख रहे हो तो जितना बड़ा स्क्रीन, उतना कम स्ट्रेस। जैसे टीवी देखोगे तो कम स्ट्रेन रहेगा आंख पर। उसके बाद टैब में और कम हो जाएगा, लैपटॉप में भी कम हो जाएगा। दूसरा मैं कहना चाहूंगी कि 40 साल के बाद एक बीमारी होती है ग्लूकोमा जिसको हम काला मोतिया बोलते हैं। उसको साइलेंट थीफ ऑफ द आई भी बोलते हैं। जो ऐसा नुकसान करता है कि आपको कोई सिम्टम नहीं आएगा। पता भी नहीं चलेगा। जब आप चेक कराने जाओगे तभी पता लगेगा कि यह बीमारी है और उसका इलाज सिर्फ एक ड्रॉप से हो जाता है। उसको हम वहीं रोक सकते हैं। कई बार मेरे पास ऐसे मरीज आते हैं जिनकी एक आंख में पूरी रोशनी चली जाती है। उन्हें पता ही नहीं होता। वो एकदम कई बार बंद करके देखते हैं आंख तब पता लगता है। पर तब तक नसें पूरी सूख चुकी होती है तब हमारे हाथ में कुछ नहीं होता। इसलिए अनिवार्य है कि आप 40 साल के बाद हर साल एक बार आई एग्जामिनेशन जरूर कराएं।

आशुतोष: अभी पता चला कि आप ऑस्ट्रेलिया गई थी? कोई सेमिनार या कोई वर्कशॉप?
डॉ. नीतू: वहां रॉयल कॉलेज की कॉन्फ्रेंस थी। भारत से 18 लोग गए थे जिनकी अलग-अलग लेवल पर प्रेजेंटेशन थी। मेरी कैटक्ट सर्जरी पर ही थी जो सफेद मोतिया कहते हैं। प्रेजेंटेशन बता रही थी कि जो तकनीक हम कर रहे हैं, उसमें क्या बदलाव किया है। ऐसा नहीं है कि सारी टेक्नोलॉजी बाहर की ही है। भारत में भी बहुत टेक्नोलॉजी है और सफलता भी 100 फभ्सद दे रहे हैं। सलाह यह भी है कि साल में एक बार आई चेकअप जरूर कराएं और अगर आपका चश्मे का नंबर ज्यादा है तो साल में दो बार कराएं।

समाप्त
प्रस्तुति—अजय वर्मा

पहला हिस्सा पढ़ें—https://www.swasthbharat.in/the-thermometer-eye-care-is-very-important-dr-neetu/

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