आशुतोष कुमार सिंह

दुनिया के बदलते रंग को देखकर मन व्यथित है। इंसानी द्वन्द को देखकर सशंकित हूं। मानवता बचेगी या नहीं, यक्ष प्रश्न है। ऐसे में कथित विचारों के बीच बढ़ते टकराव को देखकर उद्द्विग्न हूं। वैश्विक मंच पर वर्तमान में दो कथित मत या यूं कहें कि विचार या वाद मानवता को दो खेमों में बांटे हुए हैं। एक है वाम और दूसरा दक्षिण।
वाम को लगता है कि वह जो सोचता है, वह सही है और दक्षिण को लगता है कि वह जो सोचता है, वह सही है। सही-सही की इस चक्की में दरअसल मानवता एवं मानवीय मूल्य पिस रहे हैं, जिसकी सिसकियां शायद किसी तक नहीं पहुंच पा रही है।
जहां तक मैं समझता हूं या समझ सका हूं, उसके अनुसार न तो वाम कोई विचार है और न ही दक्षिण। दरअसल ये दोनों मानवीय भाव है। ये दोनों भाव मनुष्य के आंतरिक भाव हैं। अर्थात् ये दोनों भाव प्रत्येक मानव में प्राकृतिक रूप से होता ही है। बिना इन भावों के विचारों का प्रस्फुटन ही नहीं हो सकता।
जब आपका वाम भाव प्रबल होता है तब आप ज्यादा संवेदनशील हो जाते हैं, दया, प्रेम, करुणा जैसे अन्य भाव भी सबल हो उठते हैं, ऐसे में जब आपके मन में जो विचार उत्पन्न होता है, वह आपके आस-पास के सामाजिक वातावरण की वस्तुस्थिति से प्रभावित होता है। मानवीय समस्याएं आपको परेशान करती हैं और आप बदलाव के लिए विचार बुनने लगते हैं। इन भावों का विस्तार क्षेत्र सीमित दायरे में होता है क्योंकि ये भाव सामान्यतया आपके युवावस्था में प्रबल होते हैं, उस समय आप देश-दुनिया-राष्ट्र-राज्य आदि तक अपने विचारों को नहीं ले जा पाते हैं। ऐसे में देश-दुनिया-राष्ट्र-राज्य आदि आपको शत्रु सरीखे दिखते हैं और आप अपनी स्थानीय समस्याओं का ठीकरा राष्ट्र-राज्य के सिर पर फोड़ते चले जाते हैं। इस तरह प्रेम, करुणा, दया से युक्त वाम भाव आगे चलकर बदला, हिंसा, झूठ, फरेब से युक्त शक्ति प्रिय हो जाता है। उसके मौलिक भाव में हुए इस सक्रमण का नतीजा यह होता है कि वाम भाव अपनी मौलिकता को खो बैठता है, जिसके कारण इस भाव से उत्पन्न विचार भी स्थायी नहीं बन पाते। एक समय के बाद इन विचारों का वास्तविकता से नाता टूट जाता है।
और बात करते हैं दक्षिण भाव की। यह भाव भी मानव का आंतरिक भाव है। यह भाव समग्रता में विश्वास करता है। जब किसी मानव में यह भाव सबल होता है तब वह समष्टिगत हो जाता है। उसके लिए व्यष्टिगत हित तुच्छ लगने लगते हैं। उसके लिए राष्ट्र-राज्य सर्वोपरि हो जाता है। उसके मन में राष्ट्र प्रथम का भाव जागृत होता है। अर्थात् राष्ट्र के लिए सबकुछ न्योछावर। वह राष्ट्र की संप्रभुता का रक्षक बनना स्वीकार करता है। और यह भाव तब आता है जब उस मानव विशेष के सामाजिक दायरे का विस्तार होता है। जैसे-जैसे दक्षिण भाव के प्रभाव में विचार का क्षेत्रफल बढ़ता है, दक्षिण भाव से प्रेरित वैचारिकता का प्रादुर्भाव होता है-जिसे आजकल राष्ट्रवाद कहते हैं।
जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि वाम और दक्षिण दोनों मानवीय भाव हैं जो विचार प्रस्फुटन का कारण बनते हैं, खुद में कोई विचार नहीं हैं और न ही वाद है। और ये दोनों भाव मानव में नैसर्गिक रूप से होते ही हैं। सच तो यह है कि दोनों भावों का मौलिक समन्वय मानवता के लिए बहुत जरूरी है। दोनों भावों में टकराव मानवजाति के लिए विनाशकारी है।
वर्तमान में दोनों ही भावों से प्रस्फुटित विचार पर आधारित वादों ने विवाद को ज्यादा बल दिया है। मार्क्सवाद हो लेनिनवाद हो या राष्ट्रवाद इन वादों में सार्थक, सकारात्मक एवं संवेदनात्मक संवाद नहीं होने के कारण ये अतिवाद की ओर अग्रसर हैं-जिसका दुष्परिणाम मानवता को भुगतना पड़ रहा है। ये वाद शक्ति प्राप्त करने के साधन के रूप में इस्तेमाल किए जाने लगे या होने लगे तब से इन वादों में नकारात्मकता घर कर गई। ये वाद अपनी मौलिक प्रवृति और प्रेरक भाव से विमुक्त होते चले गए।
ऐसे में यदि हम दुनिया को मानवीय बनाना चाहते हैं तो इन तमाम कथित वादों पर लड़ना छोड़कर, मानव की बेहतरी के लिए संवाद करना जरूरी है। शक्ति का सकारात्मक होना जरूरी है, साधन का शुद्ध होना जरूरी है। मानवीय जगत के लिए वाम और दक्षिण भाव से प्रेरित होकर प्रस्फुटित हुए कथित विचारों/वादों में समन्वय जरूरी है। शायद तब जाकर मेरा मन शांतचित्त हो पाए। आनंद का गोता लगा पाए। खुशियों के गीत गा पाए।
(समूह संपादक, स्वस्थ भारत मीडिया)
संपर्क- [email protected]
