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जहरीली हवा में जीवन जीते हम

विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष

धीप्रज्ञ द्विवेदी

बचपन में हाई स्कूल के दौरान हाईस्कूल की दीवारों पर बहुत सारे स्लोगन लिखे हुए थे जिसमें एक स्लोगन था ‘‘स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है’’ और ‘‘स्वस्थ मस्तिष्क ही स्वस्थ समाज का निर्माण करती है’’ और ‘‘समाज स्वस्थ होगा तभी देश स्वस्थ होगा।’’ आज हमारे स्वास्थ्य को कई अलग-अलग दिशाओं से चुनौती मिल रही है जिसमें सबसे महत्वपूर्ण चुनौती दो क्षेत्रों से मिल रही है। एक है प्रदूषण और दूसरी है बीमारियां। आजकल के समय में बहुत सी बीमारियों का कारक प्रदूषण है।

99 फीसद आबादी जहरीली हवा में

प्रदूषण को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने विश्व स्वास्थ्य दिवस, 7 अप्रैल के पहले एक बहुत ही महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की है जिसमें उसका यह कहना है कि दुनिया की 99 प्रतिशत आबादी जहरीली हवा में सांस ले रही है। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि लगभग आठ अरब लोग एक ऐसी हवा को अपनी सांस के द्वारा अंदर ले रहे हैं जो सीधे-सीधे उनके स्वास्थ्य और जीवन दोनों के लिए खतरा है। विश्व स्वास्थ संगठन की रिपोर्ट 117 देशों में किए गए अध्ययन पर आधारित है। आजकल अधिकांश देशों में वायु प्रदूषण की मॉनिटरिंग की जाती है। भारत में भी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड एवं राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के द्वारा वायु प्रदूषण की मॉनिटरिंग की जाती है। इस सबके अतिरिक्त भारत में सफर (ै।थ्।त्) नामक तंत्र के द्वारा भी वायु प्रदूषण की रियल टाइम स्थिति की जानकारी रखी जाती है।

WHO का डेटा

भारत में वायु प्रदूषण की स्थिति की जानकारी रखने के लिए जिन आठ चीजों पर नजर रखी जाती है उनमें दो तरह के कणीय पदार्थ (PM10 एवं PM 2.5) तथा 6 अन्य गैस नाइट्रोजन डाईऑक्साइड, सतही ओजोन, कार्बन मोनोऑक्साइड सल्फर डाइऑक्साइड, अमोनिया एवं लेड हैं। विश्व स्वास्थ संगठन ने अपने अध्ययन का आधार इनमें से दो चीजों को बनाया है वह है कणीय पदार्थ एवं नाइट्रोजन डाइऑक्साइड। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड को विश्व स्वास्थ संगठन ने पहली बार अपने अध्ययन में शामिल किया है। विश्व स्वास्थ संगठन का यह डाटा वर्ष 2011 से हर वर्ष जारी किया जाता है।

वायु प्रदूषण से सालाना 70 लाख मौतें

दुनिया में वायु प्रदूषण की समस्या कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि इस कारण प्रत्येक वर्ष 70 लाख से ज्यादा लोगों की मृत्यु हो रही है। हालांकि विश्व स्वास्थ संगठन के अनुसार अब दुनिया के ज्यादा देश वायु प्रदूषण को लेकर गंभीरता दिखा रहे हैं और अब अधिक देशों में अधिक शहरों में वायु गुणवत्ता की निगरानी हो रही है। ध्यान देने वाली बात है कि वायु गुणवत्ता की निगरानी करने वाले शहरों की संख्या पहले की तुलना में 2,000 से बढ़ गई है। देखा जाए तो 2011 में इस डेटाबेस लॉन्च होने के बाद से वायु गुणवत्ता के आंकड़ों को साझा करने वाले शहरों की संख्या में छह गुना की वृद्धि हुई है। आंकड़ों के मुताबिक 117 देशों के 6,000 से अधिक शहरों में वायु गुणवत्ता की निगरानी की जा रही है। लेकिन इस निगरानी का वायु गुणवत्ता की वास्तविक स्थिति पर कोई बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ा है बल्कि अधिकांश देशों में वायु गुणवत्ता की स्थिति और बिगड़ी ही है। विशेषकर विकासशील एवं अवकसित देशों में यह समस्या कहीं ज्यादा गंभीर है अर्थात उच्च आय वाले देशों की तुलना में मध्यम और निम्न आय वर्ग वाले देशों में वायु प्रदूषण से होने वाले खतरे कहीं ज्यादा गंभीर हैं।

निम्न आय वाले देशों में खतरा ज्यादा

जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार उच्च आय वर्ग वाले देशों में 17 प्रतिशत शहरों में कणीय पदार्थों की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा तय की गई सीमा से कम है जबकि मध्य में निम्न आय वर्ग वाले देशों में यह संख्या एक फीसद से भी कम है। कमोबेश ऐसी स्थिति नाइट्रोजन डाईऑक्साइड को लेकर भी है।

नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का असर

नाइट्रोजन डाइऑक्साइड हमें कई तरीके से प्रभावित करता है। यह सीधे हमारे फेफड़े में जाकर उस पर असर डालता है। वहां मौजूद म्यूकस के साथ मिलकर डाइल्यूटेड एसिड एनी अम्ल का निर्माण करता है जो फेफड़ों को सीधे तौर पर प्रभावित करती है और हम एक साथ कई तरह के श्वसन संबंधी रोगों से प्रभावित होते हैं। इसके अतिरिक्त या वातावरण में मौजूद हाइड्रोकार्बन के साथ मिलकर सतही ओजोन का निर्माण करता है जो फोटोकेमिकल स्मॉग का मुख्य घटक है। यह सतही ओजोन पेड़ पौधों के लिए हानिकारक होता है। साथ ही साथ यह एल्डिहाइड के निर्माण में भी सहायक होता है जिसके कारण शहरों में हमें आंखों में जलन जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त दृष्टि बाधक का भी काम करता है। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का मुख्य स्रोत पेट्रोलियम है।

नवजातों पर ज्यादा प्रभाव

वातावरण में कणीय पदार्थों की उपस्थिति हमारे स्वास्थ्य को कई तरह से प्रभावित करती है। PM 2.5 और उससे छोटे कण आसानी से हमारे फेफड़ों के माध्यम से हमारे रक्त परिसंचरण तंत्र तक पहुंच जाते हैं और इसके बाद हृदय आघात, स्ट्रोक और सांस सम्बन्धी विकार पैदा हो सकते हैं। इस बात के भी प्रमाण सामने आए हैं कि पार्टिकुलेट मैटर शरीर के कई अन्य अंगों को भी प्रभावित कर सकता है। साथ ही कई बीमारियों के जोखिम को और बढ़ा सकता है। गर्भावस्था के दौरान प्रदूषण के इन सूक्ष्म कणों के संपर्क में आने से जन्म के समय नवजातों का वजन सामान्य से कम हो सकता है जिसकी वजह से जन्म के तुरंत बाद ही उनकी मृत्यु हो सकती है। जर्नल प्लस मेडिसिन में प्रकाशित एक शोध में यह बताया गया है कि वायु प्रदूषण के चलते दुनिया भर में हर साल करीब 59 लाख नवजातों का जन्म समय से पहले हो जाता है जबकि इसके चलते करीब 28 लाख शिशुओं का वजन जन्म के समय सामान्य से कम होता है।

भारत में औसत आयु में कमी

अगर हम भारत की बात करें तो इनर्जी पॉलिसी इंस्टिट्यूट (ईपीआईसी) द्वारा जारी रिपोर्ट से पता चला है कि देश में वायु प्रदूषण एक आम भारतीय से उसके जीवन के औसतन करीब 5.9 वर्ष कम कर  रहा है। ऐसी स्थिति में अगर सही समय से सही कदम उठाए जाएं तो हम वायु गुणवत्ता की स्थिति में सुधार लाकर लोगों की जीवन प्रत्याशा को बेहतर कर सकते हैं और साथ ही एक स्वस्थ समाज की दिशा में भी कदम बढ़ा सकते हैं। इसके लिए हम सबको मिलकर काम करना होगा।

(लेखक पर्यावरण में स्नातकोत्तर एवं नेट हैं। पर्यावरण संबंधी विषयों पर इनके आलेख योजना, कुरुक्षेत्र एवं अन्य जगहों पर प्रकाशित हुए हैं। स्वास्थ्य विषय पर काम करने वाली संस्था स्वस्थ भारत (न्यास) के संस्थापक ट्रस्टी हैं और सभ्यता अध्ययन केंद्र की शोध पत्रिका सभ्यता संवाद के कार्यकारी संपादक भी हैं। इसके साथ ही विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओं के लिए पर्यावरण विषय पढ़ाते हैं।)

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