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Swasthya sansad 24-हेल्थ के प्रति मीडिया भी उदासीन : संजीव कुमार

जैसा कहा, वैसा लिखा…हां, अयोध्या में संपन्न स्वास्थ्य संसद-24 में पत्रकार और हिंदी पत्रिका युगवार्ता व हिंदुस्तान समाचार एजेंसी के संपादक संजीव कुमार ने ऐसा ही कहा था। लीजिए उनके वक्तव्य का संपादित रूप।

क्या मीडिया स्वास्थ्य की समस्या को जनता तक नहीं पहुंचा पा रही जिसके कारण आशुतोष सिंह और हम सबको यहां स्वास्थ्य अभियान करना पड़ रहा है? स्वस्थ भारत का जन्म क्यों हुआ?
देखिए, 2012 में एक बच्चा अस्पताल में एडमिट था। उसके साथ आशुतोष थे। जब वो दवा लेने गए तो उनको पता चला कि दवा के क्षेत्र में कितनी धांधली है क्योंकि 2 रुपये की दवा 2000 में बिक रही थी। तब आशुतोष को बड़ा धक्का लगा। दवा के लिए 100 गुण पैसा खर्च कर पाना किसी के बस में नहीं होता है। खास कर मिडिल क्लास व्यक्ति खाने और रहने की व्यवस्था में परेशान रहता है। उसके लिए इतनी महंगी दवा का खर्च उठा पाना मुश्किल होता है। उसी दिन आशुतोष कुमार सिंह ने ठाना कि भारत को स्वस्थ बनाना है तो आवाज बुलंद करनी होगी। इन्होंने कंट्रोल एम आर पी ऑफ मेडिसन का आंदोलन 2012 में शुरू किया।

आज का संपादक अगर सजग है तो वो अपने अखबार में कृषि और स्वास्थ्य को जगह देता है। अगर संपादक अचेतन है तो वो पत्रिका में इन मुद्दों को जगह नहीं देता है। आज ज्यादातर अखबार और पत्रिका में स्वास्थ्य से जुड़ा पन्ना गायब है। हम बीमार इसलिए हो रहे क्योंकि हमारे किचन में मटका की जगह फ्रीज़ आ गया है। किचन में आए बदलाव के कारण हमारा आहार बदला। हम सब अस्वस्थ हो रहे हैं। लेकिन इस बारीक बात पर क्या इतने वर्षों में किसी पत्र-पत्रिका ने आवाज उठाई? नहीं।
फ्रीज, मोबाइल, टीवी, एसी आदि को सुविधा समझ कर हम घर में लगा बैठे हैं, यह सब हमारी सेहत के लिए नुकसानदायक है। मोबाइल के रेडिएशन से बच्चे और युवा बीमार हो रहे हैं। उनकी आंख की रोशनी कम हो रही है। मार्केट ने आपको सोशल मीडिया का आदी बना दिया है। मेरा खुद का समय रील देखने में चला जाता है। आज के बच्चों की आंख ड्राइनेस का शिकार हो रही है। मोबाइल की रोशनी और रेज से बच्चों की आंख और सेहत बिगड़ रही है। इससे खुद को और अपने परिवार को बचाने के लिए हमें ही दबाव डालना होगा। हमें अपने जीवन में पुराने नियम और परंपरा को अपनाना होगा, तभी हम स्वस्थ और सुरक्षित जीवन जी पाएंगे।

संपादन : अजय वर्मा

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