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68 सालों की मेहनत के बाद NIIMH बना WHO का सहयोगी केंद्र

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। हाल ही WHO ने हैदराबाद की राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा विरासत संस्थान (NIIMH) को पारंपरिक चिकित्सा में मौलिक और साहित्यिक अनुसंधान के लिए अपना सहयोगी केन्द्र का दर्जा दिया है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आखिर इसमें क्या खासियत है कि यह सम्मान दिया गया।

हजारों आयुष पांडुलिपियां संरक्षित

इसकी स्थापना 1956 में की गयी थी। धीरे-धीरे यह आयुर्वेद, योग प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध, सोवा-रिग्पा, होम्योपैथी, बायोमेडिसिन और भारत में स्वास्थ्य देखभाल के अन्य संबंधित विषयों में औषधीय-ऐतिहासिक अनुसंधान का दस्तावेजीकरण और प्रदर्शन करने वाला एक अनूठा समर्पित संस्थान बन गया। यह आयुष की विभिन्न डिजिटल पहलों में अग्रणी रहा है, जिसमें अमर पोर्टल भी शामिल है। यहां 16 हजार आयुष पांडुलिपियां संरक्षित हैं जिसमें 4,249 डिजिटाइज्ड पांडुलिपियां, 1,224 दुर्लभ पुस्तकें, 14,126 कैटलॉग और 4,114 पत्रिकाएँ शामिल हैं। इसका पोर्टल 793 चिकित्सा-ऐतिहासिक कलाकृतियों को प्रदर्शित करता है, जबकि आयुष परियोजना की ई-पुस्तकें क्लासिकल पाठ्यपुस्तकों के डिजिटल संस्करण भी हैं। नमस्ते पोर्टल 168 अस्पतालों से आंकड़े एकत्र करता है और आयुष अनुसंधान पोर्टल 42,818 प्रकाशित आयुष शोध लेखों को क्रमबद्ध करता है। यहां के मेडिकल हेरिटेज संग्रहालय और पुस्तकालय में 15वीं शताब्दी की दुर्लभ पुस्तकें और पांडुलिपियाँ हैं। संस्थान भारतीय चिकित्सा विरासत का जर्नल भी प्रकाशित करता है।

अथक प्रयासों ने दिलाया सम्मान: वैद्य रविनारायण

इसे यह सम्मान मिलने पर CCRAS के महानिदेशक प्रो. वैद्य रविनारायण आचार्य ने कहा कि डब्ल्यूएचओ द्वारा यह पदनाम एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जो पारंपरिक चिकित्सा और ऐतिहासिक अनुसंधान के क्षेत्र में हमारे अथक प्रयासों को दर्शाता है।

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