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बिहार में बहार लाने की चुनौती

बिहार के पास इतने दर्द हैं कि उसकी दवा इतनी जल्दी मिल पाना संभव नहीं दिख रहा है। वर्षों से बीमार-बेहाल बिहार में बहार लाना सूबे के मुखिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती है

 आशुतोष कुमार सिंह
कोरोना काल ने बिहार के मुखिया नीतीश कुमार को मुसीबतों में जकड़ लिया है। नीतीश कुमार को नजदीक से देखने वाले बता पाएंगे कि इन दिनों उनके ऊपर कितनी बड़ी जिम्मेदारी आ खड़ी हुई है। सूबे में एक तरफ चुनाव का बिगुल बज चुका है तो दूसरी ओर कोरोना का रोना बदस्तुर जारी है। रही-सही कसर दूसरे राज्यों में फंसे लाखों प्रवासी मजदूरों की खाली हाथ घर-वापसी ने पूरा कर दिया है। ऐसे में सूबे के मुखिया नीतीश कुमार के लिए इस विकट स्थिति को संभालना आसान नहीं रह गया है।
नीतीश कुमार की चिंता यह भी है कि कुछ महीनों में राज्य में बाढ़ का मौसम भी आयेगा। साथ ही एइएस और जेई वाले क्षेत्रों को भी समय-पूर्व बचाना हैं। पिछले वर्ष जापानी इंसेफलाइटिस ने नीतीश सरकार की खुब किरकिरी कराई थी, जब मुजफ्फरपुर में शिशुओं की मौत का आंकड़ा थमने का नाम नहीं ले रहा था। इस बार नीतीश कुमार कोई भी गलती करना नहीं चाहते हैं। यहीं कारण है कि राज्य में कोरोना की स्थिति का जायजा से लेकर घर-वापसी कर रहे मजदूरों के हालात पर पैनी नज़र बनाए हुए हैं। खुद क्वारंटाइन सेंटरों का जायजा भी ले रहे हैं। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सारे आला-अधिकारियों के संपर्क में हैं। किसी भी तरह की चूक न हो इसके लिए मुस्तैदी बढ़ा दी गई है। सूचना सचिव अनुप कुमार, स्वास्थ्य सचिव लोकेश कुमार सिंह, अपर पुलिस महानिदेशक, पुलिस मुख्याल, जितेन्द्र कुमार तथा अपर सचिव आपदा प्रबंधन रामचंद्र नायडू की टीम बिहार में बहार लाने के लिए दिन-रात जुटी हुई है। हर पल की जानकारी सूबे के मुखिया को दी जा रही है।
इन तमाम मुस्तैदियों के बीच अभी भी देश के अलग-अलग हिस्सों में मजदूरों के फंसे होने की सूचनाएं लगातार मिल रही है। मदद की मांग अभी भी थमी नहीं है। मदद पहुंचाने वाले हाथ कम पड़ रहे हैं। इस बीच फंसे हुए प्रवासियों को लेकर रेलगाड़ियों के बिहार पहुंचने का दौर जारी है। सूचना सचिव अनुपम कुमार ने बताया कि बाहर से आने वाले इच्छुक प्रवासी लोगों को जल्द से जल्द बिहार लाने के लिये हर मुमकिन कोशिश की जा रही है। बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक बिहार आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि 21 मई को 85 ट्रेनें देश के अलग-अलग हिस्सों से बिहार पहुँची हैं जिनमें 1 लाख 40 हजार 250 यात्री हैं। इसी तरह 22 मई को 87 ट्रेनें शिड्यूल्ड की गयी हैं। इन ट्रेनों से 1 लाख 43 हजार 550 लोग यात्रा करेंगे। उन्होंने कहा कि बिहार सरकार बिहार आने के इच्छुक हर प्रवासी मजदूर को लाने के लिए प्रतिबद्ध है। मुख्यमंत्री ने अपील की है कि घबराएं नहीं, धैर्य रखें। दूसरी ओर बिहार में पिछले दो-तीन सप्ताहों से घर वापसी कर रहे मजबूर प्रवासी श्रमिकों का आने का दौर अनवरत जारी है।
वर्तमान परिस्थिति में बिहार सरकार के लिए दो बड़ी चुनौती है। एक तो जो बिहार में पहले से हैं और लॉकडाउन के कारण आर्थिक रूप से कमजोर हो गए हैं या पहले से ही आर्थिक विपन्न हैं, उनको कैसे सहायता पहुंचाई जाए। दूसरी चुनौती यह है कि जो प्रवासी बाहर से आ रहे हैं उनके लिए रोजगार के अवसर कैसे उत्पन्न किए जाए। 21 तारीख को हुई समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सभी अधिकारियों को सीधे-सीधे हिदायत देते हुए कहा कि चूकि काफी समय से लॉकडाउन चल रहा है इसलिये समाज की अंतिम पंक्ति में रह रहे लोगों पर विशेष ध्यान दिये जाने की जरूरत है। सरकार द्वारा अत्यंत निर्धन एवं गरीब परिवारों को उपलब्ध करायी जा रही सहायता का पूरा लाभ उन्हें मिल रहा है या नहीं, इस संबंध में सभी जिलाधिकारी एवं पुलिस अधीक्षकों को निर्देश दिया गया है कि जनप्रतिनिधियों से समन्वय कर यह सुनिश्चित करें कि जो भी जरूरतमंद परिवार हैं, उन तक सरकार की योजनाओं का सही लाभ पहुंचे। मुख्यमंत्री ने पी.डी.एस. से सही मात्रा में नियमित रूप से लोगों को राशन प्राप्त हो इसके लिए भी निर्देशित किया है।
इस बावत सूचना सचिव अनुपम कुमार ने बताया कि राशन कार्ड विहीन सुयोग्य परिवारों को जल्द से जल्द राशन कार्ड निर्गत हो सके, इसके लिए अनुमंडलों में बड़ी संख्या में ऑपरेटरों को लगाया गया है। इसके लिए सर्वे का काम लगभग पूरा हो चुका है। अभी तक 1 करोड़ 35 लाख से कुछ ज्यादा राशन कार्डधारी परिवारों को 1,000 रुपये की राशि उनके खाते में भेज दी गयी है। इसके अलावा जीविका और एन.यू.एल.एम. द्वारा चिन्हित राशन कार्ड विहीन परिवारों में से अभी तक 18 लाख 5 हजार परिवारों को भी 1,000 रुपये की राशि उनके बैंक खाते में भेजी जा चुकी है और यह प्रक्रिया निरंतर चल रही है। उन्होंने बताया कि 8 लाख 88 हजार राशन कार्ड विहीन परिवारों के नये राशन कार्ड बनाये जा चुके हैं।
बिहार सरकार की दूसरी सबसे बड़ी समस्या है प्रवासी मजदूरों की समूचित स्वास्थ्य जांच करना, उन्हें क्वारंटाइन करना, भोजन की व्यवस्था कराना और उन्हें रोजगार से जोड़ना। इस बावत बिहार सरकार के सचिव सूचना एवं जन-संपर्क अनुपम कुमार ने बताया कि लॉकडाउन के कारण शहरी क्षेत्रों में रहने वाले जरूरतमंद व्यक्ति/ठेला वेंडर्स/रिक्शा चालकों एवं दिहाड़ी मजदूरों की परेशानियों को ध्यान में रखते हुए आपदा राहत केंद्र चलाए जा रहे हैं। वर्तमान में आपदा राहत केन्द्रों की संख्या 143 है, जिसका 75,757 लोग लाभ उठा रहे हैं। बाहर से काफी संख्या में आ रहे प्रवासी मजदूरों के कारण ब्लॉक क्वारंटाइन केन्द्रों की संख्या बढ़ाकर 10,353 की गई है, जिसमें 7 लाख 45 हजार 881 लोग आवासित हैं। लॉकडाउन में बाहर फंसे लोगों से अब तक 2 लाख 20 हजार कॉल/मैसेजेज प्राप्त हुए हैं। प्राप्त कॉल/मैसेजेज के आधार पर संबंधित राज्य सरकारों एवं प्रशासन से समन्वय स्थापित कर उनकी समस्याओं का हरसंभव समाधान करवाया जा रहा है।
अनुपम कुमार ने बताया कि रोजगार सृजन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है और इसके लिए विशेष प्रयास किये जा रहे हैं ताकि अधिक से अधिक लोगों को रोजगार प्राप्त हो सके। लॉकडाउन पीरियड में अब तक 2 करोड़ 77 लाख 40 हजार से ज्यादा मानव दिवस सृजित किये जा चुके हैं। रोजगार सृजन को लेकर जो भी अनुमान्य योजनायें हैं, उन पर काम तेजी से आगे बढ़ रहा है। इस प्रकार लॉकडाउन या कोविड-19 संक्रमण के कारण हर फ्रंट पर जो भी कठिनाइयां आ रही है, उनके निराकरण को लेकर सरकार बेहद गंभीर है। हर तरह की समस्याओं के त्वरित रूप से निष्पादन का प्रयास किया जा रहा है।
बिहार के 21 मई तक के आंकड़ों को देखें तो कुल 55,692 सैंपल्स की जांच की गयी है जिसमें कोविड-19 के 1881 पॉजिटिव मामले मिले हैं। इस बावत बिहार में स्वास्थ्य विभाग के सचिव लोकेश कुमार सिंह ने बताया कि 20 मई को 2,711 सैंपल्स की जांच हुई थी जिनमें 197 लोगों में कोरोना संक्रमण की पुष्टि हुई है। प्रवासी श्रमिकों की बढ़ती संख्या को ध्यान में रखते हुए टेस्टिंग क्षमता बढ़ायी जा रही है और इसे जिला स्तर पर भी किया जा रहा है, ताकि सभी लोगों की जांच आसानी से की जा सके। उन्होंने बताया कि 3 मई के बाद 21 मई तक यानी कुल 18 दिनों में 999 प्रवासी व्यक्ति कोरोना संक्रमित पाये गये हैं। इसमें दिल्ली से 296, महाराष्ट्र से 253 और गुजरात से आने वाले 180 व्यक्तियों में कोरोना संक्रमण की पुष्टि हुई है।
देखा जाए तो नीतीश सरकार हर उस मोर्चे पर काम करने का प्रयास कर रही है, जिससे बिहार के लोगों को कोरोना-काल में राहत पहुंचाई जा सके। बिहार के पास इतने दर्द हैं कि उसकी दवा इतनी जल्दी मिल पाना संभव नहीं दिख रहा है। वर्षों से बीमार-बेहाल बिहार में बहार लाना सूबे के मुखिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
नोटः यह आलेख युग्वार्ता साप्ताहिक में प्रकाशित हो चुका है।

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