स्वस्थ भारत मीडिया
मन की बात चौपाल

मत बख्शों लॉकडाउन नियमों को तोड़ने वालों को

लॉकडाउन के नियमों को तोड़ने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने की मांग कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार व पूर्व राज्यसभा सांसद आर.के.सिन्हा

मन की बात

आर.के. सिन्हा, वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार एवं पूर्व सांसद

कभी-कभी मन खिन्न हो जाता कि सरकार की लाख कोशिशों के बाद भी कुछ धूर्त किस्म के लोग कोविड-19 से बचाव के लिए सरकारी दिशा-निर्देर्शो की बेशर्मी से अवेहलना कर रहे हैं। ये लोग सुधरने का नाम ही नहीं लेते। ये समझ ही नहीं रहे हैं कि इनकी लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार से वैश्विक महामारी कितना गंभीर रूप लेती जा रही है।

जाहिर है, इनलोगों के कारण ही भारत की कोविड-19 को हराने की जंग कमजोर हुई है। ये सोशल डिस्टेनसिंग का पालन करना तो अपनी तौहीन समझते हैं। इन्हें मुंह पर मास्क पहनना भी अपनी शान के खिलाफ ही लगता है।

बेशक, इसलिए ही केन्द्र सरकार ने सभी राज्य सरकारों और केन्द्र शासित प्रदेशों से कहा है कि वे कोविड-19 के प्रसार पर रोकथाम के लिए घोषित किए गए सभी उपायों को सख्ती से लागू करें। अब जरा देखें कि दिल्ली की जामा मस्जिद में भी सरकारी दिशा-निर्देर्शो की अवहेलना करते हुये जुमा अलविदा वाले दिन धज्जियां उड़ाई जाती रहीं। अलविदा जुमा को रमज़ान के महीने का जुमा तुल विदा भी कहते हैं। क्योंकि, इसके बाद ही इस्लाम में खुशियों का त्योहार ईद–उल-फितर आता है।

इस बार रमज़ान का महीना कोविड-19 की वज़ह से फीका ही रहा। मुसलमानों ने  इबादत, रोज़ा, नमाज, तरावीह सब घर पर रहकर ही पढ़ीं। क्योंकि, लॉकडॉउन के कारण मस्जिदें बंद थी। मस्जिद में केवल वहां के इमाम तथा मुअज्जिन आदि समेत पांच व्यक्ति ही नमाज़ अदा कर सकते हैं। इस दौरान बाहर के किसी व्यक्ति को मस्जिद में आने की मनाही है। लगभग सभी मस्जिदों में इस बात का पालन हुआ और मस्जिदों के दरवाज़े बाहरी लोगों के लिए बंद ही रहे। लेकिन गुजरे शुक्रवार को जुमा तुल विदा के मौके पर दिल्ली की जामा मस्जिद में लगभग 50 से अधिक लोगों ने नमाज़ अदा की जिसमें स्टाफ के अलावा कई बाहरी लोग और कुछ बच्चे भी शामिल थे। ये सब इमाम अहमद बुखारी की मौजूदगी में हुआ।

यानी वे खुद ही क़ानून के खुले तौर पर उल्लंघन के ज़िम्मेदार हैं। मुझे राजधानी के मशहूर वकील और शिक्षाविद श्री मसरूर अहमद सिद्दीकी ने बताया कि इमाम साहब ने लॉकडॉउन के नियमों का पालन नहीं किया, दफा 144 का भी उल्लंघन किया और हरेक आम नमाज़ी के अधिकारों का हनन भी किया जो जामा मस्जिद के दरवाज़े बंद होने की वजह से अंदर नहीं जा पा रहे हैं। मुझे इमाम साहब की तमाम लोगों के साथ नमाज पढ़ते हुए फोटो भी दी गई हैं।

अब सवाल यह है कि क्या इमाम अहमद बुखारी कानून से ऊपर हैं? क्या वे जामा मस्जिद को अपनी पैतृक संपत्ति समझते हैं कि जिसको चाहें मस्जिद में बुला लें और जिसको चाहें भगा दें? उनके विरुद्ध क़ानून का उल्लंघन करने के लिए तुरंत उचित कार्रवाई होनी चाहिए। निश्चित रूप से दिल्ली पुलिस को इमाम साहब की इस हरकत की जानकारी होगी ही। अब देखना होगा कि उन पर कब और क्या कार्रवाई होती है।

दरअसल, देश भर में विभिन्न स्थानों से गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के उल्लंघन की सूचनाएं लगातार मिल रही हैं। यह गंभीर मामला है। इस पर रोक लगनी चाहिए। हम सब देख ही रहे हैं कि शराब की दुकानों में भी सोशल डिस्टेंसिंग पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। हर छोटे बड़े शहर में शराब की कतार में लोग एक दूसरे से सटकर ही खड़े हो रहे हैं। इन शराब की दुकानों के सामने ग्राहकों की जुटी भीड़ के बीच कहीं भी एक मीटर की शारीरिक दूरी नजर नहीं आ रही। अब पुलिस कितना इन लोगों को समझाएगी। शराब की दुकानें लॉक डाउन में छूट मिलते ही खुलवाई गई है। सरकारों का कहना है कि इससे राजस्व मिलेगा जिससे सरकारें अपना कामकाज चला सकेंगी।

अब आने वाले समय में दफ्तर और बाजार खुलने लगेंगे। इसलिए भी यह समझना जरूरी है कि सरकार उन लोगों पर सख्त हो जाए जो कोविड-19 की रोकथाम के लिए किए जा रहे उपायों को मानने के लिए तैयार नहीं हैं। यदि कोई इस बाबत लापरवाही करता है तो उसे  तुरंत दंड दिया जाए।

रात के कर्फ्यू को भी सख्ती से लागू करने की जरूरत है। इन्हीं प्रयासों से सामाजिक दूरी सुनिश्चित होगी और संक्रमण के प्रसार का जोखिम कम होगा। इस बीच, एक बेहतर काम लॉकडाउन की अवधि के दौरान यह हुआ कि देश में स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचों को मजबूत किया जाता रहा। इसी का नतीजा है कि लगभग 50 हजार कोविड-19 के रोगियों का इलाज हो चुका हैं जिससे देश की मरीजों की रिकवरी दर 40.32 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। इसके साथ ही केंद्रीय एवं राज्य सरकारों के सामूहिक प्रयासों से साढ़े छह लाख कोविड देखभाल केंद्रों के साथ-साथ 3027 समर्पित कोविड अस्पतालों एवं कोविड स्वास्थ्य केंद्र काम कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त 2.81 लाख आइसोलेशन बेड, 31 हजार आईसीयू बेडों से अधिक तथा 11 ऑक्सीजन समर्थित बेडों के साथ पहले ही समर्पित कोविड अस्पतालों एवं कोविड स्वास्थ्य केंद्र दिन रात काम कर रहे हैं।

यानी देश कोविड-19 को मात देने का कोई मौका देना नहीं चाहता। उसे सफलता भी मिलेगी। इसी क्रम में भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के तहत एक स्वायत्तशासी संस्थान, जवाहर लाल नेहरू उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र (जेएनसीएएसआर) के अनुसंधानकर्ताओं की एक टीम ने कोविड-19 के लिए एक अन्वेषणात्मक भविष्य सूचक मॉडल का विकास किया है जो रोग के उद्भव एवं इसके परिणामस्वरूप, जिन चिकित्सा आवश्यकताओं की जरुरत पड़ती हैं, उनके बारे में अल्पकालिक पूर्वानुमान उपलब्ध करा रहा है।

अगर सारा देश कोविड-19 से बचने के रास्ते पर चलने लगा तो हम इस पर काबू पा ही लेंगे। हां, कोविड-19 का असली अंत तो तब ही होगा जब इसकी वैक्सीन ईजाद हो जाती है। पर देश के इमाम बुखारी जैसे महत्वपूर्ण नागरिकों को यह तो समझना ही होगा कि उनकी गैर-जिम्मेदारी के कारण देश में कोविड-19 के रोगी बढ़ सकते हैं। क्या वे भूल गए कि तबलीगी जमात के मुखिया मौलाना साद के कारण ही शुरुआत में ही देश में कोविड-19 के केस तेजी से बढ़े।

यह भी पढ़ें

यह आकाश, बीमार तन और मजबूर मजदूर…

कोरोना के बाद का भारत ज्यादा आत्मनिर्भर व समर्थ होगा

तो क्या भारत में ईजाद होगी कोरोना की वैक्सीन

कोरोना-कालः हम सीख जाएंगे साफ सफाई

प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ेगा पर्यावरण प्रभाव निर्धारण प्रकिया में बदलाव

 

 

Related posts

कोरोना-कालः हम सीख जाएंगे साफ सफाई

बदली-बदली नजर आएगी कोविड-19 के बाद की दुनिया

कोरोना: चुनौती नहीं अवसर है

Leave a Comment