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चमकी,अकाल,डीएम की भूमिका,कुमार सुरेश सिंह की याद

निराला विदेसिया के फेसबुक वाल से

मुजफ्फरपुर के चमकी प्रकरण में तीन लोगों पर ही ज्यादा सवाल उठाये जा रहे हैं. एक तो कुछ मीडियावाले डॉक्टरों पर. कुछ सरकार पर. कुछ विपक्ष पर कि इतने बड़े मसले पर कहां नदारद है? सही है कि इन तीनों पर सवाल उठने चाहिए, उठ रहे हैं. हालांकि डॉक्टरों पर सवाल को थोड़ा और विस्तारित करने की जरूरत है.

सिर्फ एसकेएमसीएच से सवाल क्यों?

सिर्फ एसकेएमसीएच के डॉक्टरों से क्यों? मुजफ्फरपुर में जब भी चमकी का प्रकोप होता है, दो ही अस्पताल चरचे में आते हैं, एक तो एसकेएमसीएच और दूसरा निजी अस्पताल केजरीवाल हास्पिटल. लेकिन एक नियम यह भी है कि ऐसी आपदा के समय में 20 किलोमीटर के रेंज में आनेवाले सारे अस्पताल मदद करेंगे. मान लीजिए यह नियम ना भी हो तो मुजफ्फरपुर में थोक के भाव से उग आये दूसरे अस्पताल क्या कर रहे हैं, उन्होंने क्या कोई योगदान किया, इस पर बात नहीं हो सकी है. हो सकता है कि उन्होंने सकारात्मक पहल की हो, लेकिन वह सकारात्मक पहल भी अब तक सामने नहीं आ सका है.

डीएम से सवाल क्यों नहीं

लेकिन इन सबके बीच जो सबसे असल सवाल है वो यह कि कोई वहां के डीएम को नहीं घेर रहा. डीएम से सवाल नहीं पूछ रहा, जबकि अस्पताल और सरकार के बीच में सबसे अहम कड़ी डीएम ही है. सबसे ज्यादा जिम्मेवारी डीएम की ही बनती थी कि वह पहले से तैयारी करके रखते या इस आपदा के बाद अपने स्तर से तत्काल इंतजाम को ठीक करते.लेकिन डीएम से सवाल कम हो रहे.

सुरेश सिंह ने जो किया वह प्रत्येक डीएम के लिए नज़ीर है

एक डीएम क्या कर सकता है, उसके लिए फिर से पलामू का ही प्रसंग साझा करना चाहूंगा. वही अकाल के समय की बात है. उस समय वहां के डीएम कुमार सुरेश सिंह थे. वही कुमार सुरेश सिंह, जो मशहूर मानवविज्ञानी थे. लैंड्स एंड पीपुल्स आफ इंडिया का काम कर हमेशा के लिए अमर हुए. वही कुमार सुरेश सिंह, जिन्होंने बिरसा मुंडा पर गंभीरता से काम किया. कुमार सुरेश सिंह भीषण अकाल के समय पलामू के डीएम थे. पलामू तब बिहार का हिस्सा था. आखिरी छोर पर बसा हुआ इलाका, जिसकी खबर पटना नहीं ही लेता था.

डीएम के पक्ष में इंदिरा गांधी वापस जाओ के लगे नारे

अकाल के वक्त इंदिरा गांधी वहां पहुंची. उतरते ही पापुलर पालिटिक्स करते हुए श्रीमति गांधी ने कहा कि यहां मैं अभी डीएम पर कार्रवाई करूंगी. लोगों ने नारा लगाया, इंदिराजी वापस जाओ. आजकल अंग्रेजी में जो गोबैक गोबैक वाला नारा चलता है,वैसा ही नारा. इंदिराजी चकित रह गयी थी. आमतौर पर लोग ऐसी आपदाओं में शासन से नाराज रहते हैं लेकिन कुमार सुरेश सिंह के खिलाफ सुनने के लिए वहां की जनता तैयार नहीं थी, क्योंकि अपनी मेहनत से कुमार सुरेश सिंह ने अकाल को सुकाल में बदलने की हरसंभव कोशिश की थी.

डीएम की भूमिका पर बात जरूरी

कुमार सुरेश सिंह के बारे में ढेर सारी बातें हैं. फिर कभी होंगी. इतना जानिए कि उनकी मृत्यु के बाद यूरोपीय मीडिया ने लिखा कि 20वीं सदी में सबसे बड़ा इंटेलेक्चुअल एक्सरसाइज करनेवाला भारत का विद्वान नहीं रहा.यहां कुमार सुरेश सिंह के बारे में बताने से ज्यादा मकसद यह बताना है कि आपदाओं में सबसे अहम रोल डीएम साहब का होता है. मुजफ्फरपुर मामले में डीएम की भूमिका पर कोई बात नहीं हो रही.

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