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ऋषि कपूर-इरफान खानः देश मजहब देखकर किसी से प्यार या नफरत नहीं करता

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कार्य-संस्कृति
रवीन्द्र कुमार सिन्हा, वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार एवं पूर्व सांसद

देश ने पिछले दो दिनों में इरफान खान और ऋषि कपूर जैसे दो बेहतरीन कलाकारों को खो दिया है। उनको मिले प्रेम और स्नेह को मजहब की कसौटी से इतर देख रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व सांसद आर.के. सिन्हा

 

नई दिल्ली/एसबीएम विशेष

एक तो कोरोना वायरस के कारण फैली विश्वव्यापी हताशा और ऊपर से हिन्दी सिनेमा के दो बेहद सशक्त अभिनेताओं इरफान खान और फिर ऋषि कपूर  के संसार से कूच कर जाने ने मानो देश को शोक के महासागर में धकेल दिया है। दोनों असाधारण कलाकार थे। दोनों ने हिन्दी सिनेमा पर लगभग आधी सदी तक अपना प्रभाव छोड़ा।

अगर बात इऱफान खान की करें तो वे बेहद शानदार कलाकार होने के साथ-साथ एक गहरी शख्यिसत के भी मालिक थे। वे बहुत सोच समझकर ही किसी विषय पर अपनी राय रखते थे। यूं तो वे सामान्यतः फिल्मों से इत्तर विषयों पर बोलते नहीं थे, पर बोलते थे तो उन्हें कायदे से सुना जाता था। इरफान खान बाकी सितारों से अलग थे। दरअसल वे स्टार नहीं कलाकार थे। वे  “सेकुलर ” कहलाने की ख्वाहिश रखने वाले नहीं थे । उन्हें  भारत में डर भी नहीं लगता था। उन्होंने कभी “माई नेम इज़ खान” का हौव्वा भी खड़ा नहीं किया। उन्होंने अंडरवर्ल्ड के पैसे पर फलने-फूलने का सपना भी नहीं पाला I उन्होंने जो किरदार निभाए उसमें वे रच बस गए। उनकी पीकू, लंच बॉक्स, मकबूल हिन्दी मीडियम जैसी तमाम फिल्मों को देखकर लगता है  हर किरदार उनके लिए ही बना था ।

वे बस जिन्दगी भर एक सच्चे कलाकार भर रहे।  इरफान ने अपने स्वार्थ के लिये धर्म का कार्ड कभी नहीं खेला। उन्होंने  हर धर्म को उतना ही सम्मान दिया जितना वे अपने इस्लाम धर्म को देते थे। उन्होंने कभी हिंदू देवी देवताओं का अपमान नहीं किया। वे कभी अवार्ड वापसी गैंग के सदस्य भी नहीं बने। वे सदा एक सच्चे कलाकार के रूप में ही रहे । इरफान खान की मौत पर देश में जिस तरह की शोक की लहर छाई वह कतई सामान्य नहीं मानी जा सकती है। उन्हें देश सच में प्रेम करता था। उनकी अभिनय क्षमताओं का एहतराम करता था। उन्होंने भारत के करोड़ों सिनेमा देखने वालों को कुछ पल आनंद के जरूर दिए थे। वे भारत के मेहनतकशों के चेहरे पर अपनी उम्दा एक्टिंग की बदौलत खुशी लेकर आए थे।

दरअसल  भारत की जनता को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि उनके नाम में खान भी आता था  और वे एक मुसलमान थे। इस बात को सभी को समझने की जरूरत है। इरफान खान को मिले प्रेम के बहाने देश के मुसलमानों को खासतौर पर समझना होगा कि लोग किसी को भी उसके मजहब के आधार पर प्रेम या नफरत नहीं करते हैं।  देश की जनता यह देखती है कि आप उनके और उनके देश के लिए किस तरह से योगदान दे रहे हैं। आपकी संस्कृति, उर्दू, कव्वाली, गजल और डिशेज से किसी को कोई एतराज नहीं है। कोई भी ताजमहल से नफरत नहीं करता है। सारा देश शहीद अब्दुल हमीद और पूर्व राष्ट्पति एपीजे कलाम का सम्मान करता है। उन्हें देश का नायक मानता है। उनपर गर्व करता है । कुछ समय पहले तक दाढ़ी वालों से तो देश भर में किसी को कोई दिक्कत तो नहीं थी। किसी को बुर्का पहनने वालों से भी कोई एतराज नहीं होता था। लेकिन लोगों की सोच इसलिए बदली क्योंकि लंबी- लंबी दाढ़ी रखनेवालों ने हाल के महीनों में कई कुकृत्य किए। सिखों की भी तो लंबी-लंबी दाढ़ी होती है। उनसे तो किसी को कोई दिक्कत नहीं होती है। क्या मैं गलत कह रहा हूं? ईसाइयों की वेशभूषा भी कभी किसी के लिए कोई मसला नहीं बनता। ईसाई नन्स को देखकर एक आदर का भाव पैदा होने लगता है। लगता है कि ये जरूर जनसेवा से जुटी होंगी।

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क्या मुसलमानों की लंबी दाढ़ी और हिजाब से भी इसी तरह का भाव पैदा होता है? क्या लगता है कि लंबी दाढ़ी रखने वाला शख्स और हिजाब पहनने वाली महिला समाज सेवा में ही लगी होंगी ?  इरफान खान की मौत के बहाने देश के मुसलमानों के उस वर्ग को स्वीकार करना होगा कि उनसे भी कोई नफरत नहीं करता। उनके प्रति अविश्वास की भावना तो उनकी हरकतों के कारण ही पैदा होती है।

इरफान खान के संसार से चले जाने के बाद उन पर बहुत सारे समाधि लेख लिखे जा रहे हैं। कुछ फिल्म लेखक उनकी तुलना अभिनेता नसीरुद्दीन शाह से कर रहे हैं। हो सकता है कि वे अपनी जगह सही हों। पर नसीरुद्दीन शाह की तरह इरफान को कभी भारत में डर नहीं लगा। नसीरुद्दीन शाह को भी भारत के करोड़ों सिने  प्रेमियों ने भरपूर प्रेम दिया। पर शाह को भारत में डर लगतारहा। उन्होंने इस बात को भी कहा। नसीरुद्दीन शाह को तब डर नहीं लगा था जब 26/11 का हमला हुआ था।

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 कश्मीर में जब पंडितों का कत्लेआम हो रहा था तब भी नसीरुद्दीन शाह को डर नहीं लगा था। नसीरुद्दीन शाह जैसे फर्जी लोग कान खोलकर सुन लें कि भारत के नायक कलाम साहब से लेकर इरफान खान और अजीम प्रेमजी से लेकर अब्दुल हमीद जैसे लोग ही रहेंगे। पर ये देश के नायक इसलिए नहीं हैं कि ये सिर्फ मुसलमान हैं। ये अपनी देशभक्ति और जनसेवा के चलते ही देश के नायक बने। यह देश जाकिर नाईक और तबलीगी जमात के सदर मौलाना साद को तो अपना नायक किसी भी हालत में नहीं मानेगा। भारत के खून में ही धर्मनिरपेक्षता है। इसी भारत की एयरफोर्स के चीफ इदरीस हसन लतीफ रहे हैं। पर कुछ लोगों को भारत में सब कुछ बुरा ही नजर आता है।  यहां पर यह बात अवश्य कहना चाहता हूं कि मुसलमानों के भी एक तबके को कुछ देश विरोधी ताकतों ने जबर्दस्त ढंग से भटकाया है।

अंत में बात ऋषि कपूर की। उनकी बॉबी, लैला मजनूं, अमर अकबर एंथनी, मुल्क जैसी तमाम फिल्मों को सभी धर्मों के दर्शकों का भरपूर समर्थन मिला है। लैला मंजनू पिक्चर को देखने के लिए पुरानी दिल्ली की मुसलमान औरतें पालकी में बैठकर जामा मस्जिद से सटे ‘जगत’ सिनेमा में आया करती थीं। दरअसल भारतीय समाज और सिनेमा का चरित्र मूलत और अंतत सेक्युलर है। पर अफसोस कि हमारे यहां कुछ नकारात्मक शक्तियां सेक्युलर शब्द का इस्तेमाल देश और हिन्दू धर्म विरोधी कृत्यों में करने से बाज नहीं आती। याद कीजिए जब एमएफ हुसैन ने देवी की आपत्तिजनक पेंटिंग्स बनाई थीं। तब बहुत से सेक्युलरवादी कह रहे थे कि हुसैन साहब के काम पर रोक नहीं लगाई जानी चाहिए। इरफान खान ने तो कभी इस तरह की हरकत नहीं की थी। इसलिए उनकी मृत्यु पर सारा देश शोकाकुल है। इसलिए एमएफ हुसैन और मौलाना साद नहीं, इरफान खान देश की जनता के दिलों में बसे रहेंगे।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

 

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