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टीके से जान बची या जान पर बन आई?

सन्त समीर

चिकित्सा विज्ञान के महान् विद्वान् ख्यातिलब्ध बड़े-बड़े डॉक्टरों का कुनबा कोविड-काल में दिन-रात यह समझाने में लगा हुआ था कि टीके के नुक़सानदेह होने का कुछ लोग झूठा प्रचार कर रहे हैं। उनके झाँसे में न आएँ और बेहिचक टीका लगवाकर अपनी जान बचाएँ। अब, जब टीके के जानलेवा ख़तरे की बात एस्ट्रेजेनिका कम्पनी को स्वीकार करनी पड़ गई है तो उन्हीं डॉक्टरों का कुनबा दबी ज़बान सफ़ाई दे रहा है कि टीके के साइड इफ़ेक्ट हो तो सकते हैं, पर हार्ट अटैक जैसा ख़तरा लाखों में एकाध को ही हो सकता है।
इससे इस बात को बल मिलता है कि एलोपैथी का कारोबार चिकित्सा पर कम और जनता को बीमारी के नाम पर ठगने पर ज़्यादा टिका है। कहा जा रहा था कि टीका निर्माण की प्रक्रिया ही ऐसी है कि इसमें ख़तरे जैसी बात की रत्ती भर भी गुंजाइश नहीं है। तर्क था कि टीका निर्माण के लिए ‘डेड वायरस’ के इस्तेमाल के सिद्धान्त पर काम किया जाता है, ऐसे में ख़तरा भला कैसे हो सकता है। सवाल है कि अब कैसे टीका नुक़सानदेह साबित हो गया?
वास्तव में यदि ब्रिटेन में एक व्यक्ति ने मुक़दमा करने की हिम्मत न दिखाई होती और वहाँ का न्यायालय ईमानदार न होता तो कम्पनियाँ आज भी यही दावा ठोंकतीं कि कोविड के टीके एकदम निरापद हैं। हमारे जैसे लोग सवाल उठाते तो ये डॉक्टर भी चिल्ला-चिल्लाकर कहते कि टीके के खि़लाफ़ कुछ लोग फ़ेक न्यूज़ चला रहे हैं, इन पर कार्रवाई होनी चाहिए और हम स्वामी रामदेव की तरह कार्रवाई के शिकार हो भी जाते।
डॉक्टरों की बदमाशी का हाल यह है कि ये लोग अभी हाल सिर्फ़ हृदयाघात और ख़ून के थक्के जमने को ही टीके के ख़तरे के रूप में मान रहे हैं, क्योंकि कम्पनी ने सिर्फ़ इसी तरह के ख़तरे पर अपनी ग़लती मानी है। बाक़ी के ख़तरों को अब भी छिपाया जा रहा है। पहले इण्डियन मेडिकल एसोसिएशन का एक बदतमीज़ क़िस्म का महासविच था डॉ. जयेश लेले। उसकी उजड्डई तो बीती बात हो गई, पर आजकल इसके अध्यक्ष हैं आर. वी. अशोकन। इन महाशय के हिसाब से एलोपैथी के ‘अधिकतर डॉक्टर कर्तव्यनिष्ठ हैं, नैतिकता और सिद्धान्तों के अनुसार काम करते हैं’। मतलब कि आए दिन जो डॉक्टर ऑपरेशन के दौरान किसी के पेट में कैंची तो किसी पेट में रूमाल छोड़ देते रहे हैं; मरीज़ मर गया हो तो भी आईसीयू में रखकर इलाज के नाम पर लाखों का बिल बनाते रहे हैं; फ़ीस जमा करने में ज़रा-सी देरी हो जाने पर संवेदनहीनता की हद तक जाकर मरीज़ को सड़क पर मरने के लिए छोड़ देते रहे हैं; बायीं आँख या बायें घुटने के बजाय दायीं आँख या दायें घुटने का ऑपरेशन कर देते रहे हैं; एक रुपये की जगह सौ रुपये वाली अनावश्यक टेबलेट लिखते रहे हैं, वे सब कर्तव्यनिष्ठता की मिसाल पेश करते रहे हैं। भले ही हमारे जैसे लोगों के हिसाब से कोविड कोई महामारी न होकर बस साधारण-सी सर्दी-ज़ुकाम और फ़्लू की बीमारी रही हो (जो अब धीरे-धीरे सिद्ध भी हो रहा है)। फिर भी जिन डॉक्टरों ने कोविड-काल में विश्व स्वास्थ्य सङ्गठन की दी गई जानकारी को ही अन्तिम सच मानकर सचमुच ईमानदारी से अपनी ज़िम्मेदारी निभाई, उनकी जय हो।
लेकिन, सवाल है कि तमाम अस्पतालों में जिन डॉक्टरों ने सर्दी-ज़ुकाम-बुख़ार की दवाएँ खिला-खिलाकर भी दस-दस, बीस-बीस लाख रुपयों के बिल मरीज़ों को पकड़ाए और कई जगहों पर मरीज़ों के लिवर, किडनी तक निकाल लिए, क्या आईएमए की नज़र में वह सब डॉक्टरी सिद्धान्तों के अनुसार किया गया शानदार काम था?
ख़ैर, वैक्सीनेशन सर्टीफ़िकेट से मोदी जी की तसवीर आनन-फ़ानन में हटा दी गई है, पर इससे वे कोई साफ़-पाक नहीं हो जाएँगे। वैसे, मोदी जी को आखि़र ख़ुद को साफ़-पाक साबित करने की ज़रूरत भी क्या है, क्योंकि उन्होंने तो एक प्रशासक के तौर पर उसी हिसाब से क़दम उठाए, जिस हिसाब से एलोपैथी के पंडितों ने उन्हें सलाह दी थी। अगर हमारे पुराने प्रिय रवीश कुमार जैसे लोग मोदी जी पर सवाल उठा रहे हैं, तो उन्हें चाहिए कि पहले अपना ही गिरेबान देख लें, क्योंकि कोविड-काल में ये ही पत्रकार बन्धु मोदी जी को इस बात के लिए घेर रहे थे कि आखि़र सरकार फटाफट टीकाकरण क्यों नहीं कर पा रही या कि फलाँ-फलाँ जगहों पर अभी तक कोविड के लिए ज़रूरी आधुनिक चिकित्सा सुविधाएँ क्यों नहीं पहुँचीं। ‘चित भी मेरी और पट भी मेरी’ नहीं चलेगी। पहले टीकाकरण में मुस्तैदी की माँग कर रहे थे और जब मुस्तैदी से काम आगे बढ़ा और भारत का नाम टीकाकरण के लिए दुनिया भर में रोशन हो गया तो रवीश जी टाइप के लोग इस सब में अपने भी अपराध की तलाश क्यों नहीं कर रहे हैं? तब तो डॉ. बिस्वरूप राय चौधरी जैसे लोगों का ये लोग मज़ाक़ उड़ा रहे थे। उस समय ये जनाब एनडीटीवी में थे और एनडीटीवी में ही डॉ. बिस्वरूप का मज़ाक़ उड़ाने वाला एक पूरा कार्यक्रम प्रसारित किया गया था। आज का हाल यह है कि बिस्वरूप जैसे लोगों की ही बात सच साबित हो रही है। सोचिए कि हम लोगों के नेचुरोपैथी और होम्योपैथी के जिन तरीक़ों से लोग चार-छह दिन में मज़े-मज़े में ठीक हो रहे थे, अगर उन तरीक़ों को फ़ेक कहने के बजाय ये पत्रकारगण जनता को बताते और ठीक हो रहे मरीज़ों को टीवी स्क्रीन पर दिखाते, तो क्या देश में पाँच लाख लोगों के मरने की नौबत आती?
वास्तव में कोविड को महामारी बनाने में इन पत्रकारों की भूमिका ही सबसे बड़ी थी। मोदी जी को दोष देने का क्या मतलब, वे तो थाली बजवा कर भी आखि़र जनता को हिम्मत के साथ एकजुट होकर खड़े रहने का हौसला ही दे रहे थे। शुरू की नौटंकी के बाद, बाद के समय में उन्होंने कम-से-कम होम्योपैथी, आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा वग़ैरह पर रोक लगाने के बजाय थोड़ी आज़ादी दी और करोड़ों लोगों की जान इन पैथियों की वजह से बच गई।

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