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दंत-रोगों को हल्के में ले रही है हरियाणा सरकार, दंत चिकित्सकों को नौकरी से निकाल फेंका

डा. विनय गुप्ता  डेंटल सर्जन ने दी हरियाणा सरकार को हाई कोर्ट में चुनौती

हरियाणा से यह चौकाने वाला मामला सामने आया है। हरियाणा सरकार ने दांत के विशेषज्ञों को नौकरी से बाहर कर दिया है। सरकार अपने बजट का रोना रो रही है और कह रही है कि उसके पास दांत के डॉक्टरों को सैलरी देने के लिए पैसा नहीं है। वह भी तब जब ये नियुक्तियां स्वास्थय मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 31 मार्च 2016 तक मान्य हैं तथा इस कार्यक्रम के बजट का दो तिहाई हिस्सा भारत सरकार को देना है। स्वस्थ भारत अभियान हरियाणा सरकार के इस फैसले की निंदा करता है और मांग करता है कि डेंटल डॉक्टरों की नियुक्ति को बहाल रखा जाए ताकि आने वाली नई पीढ़ी को दंत-रोगों से बचाया जा सके।
कैथल/ हरियाणा
vinay guptaडॉ. विनय गुप्ता डेंटल सर्जन डी.ई.आई.सी. कैथल ने हरियाणा सरकार के उस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी है जिसके तहत राज्य में एन.एच.एम के उपक्रम राष्ट्रीय बाल स्वास्थय कार्यक्रम के अंतर्गत जिलों में चल रहे डी.ई.आई.सी. सेंटरों में कार्यरत डेंटल सर्जन, सोशल वर्कर, स्टाफ नर्स, डेंटल असिस्टेंट व लैब टेक्निशियनो की पोस्ट की सेंक्शन ख़त्म करने का करने के लिए आदेश-पत्र जारी किए गए हैं। उच्च न्यायालय में डॉ. विनय ने इस बात की दलील दी है कि ये पोस्ट स्वास्थय मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 31 मार्च 2016 तक मान्य है तथा इस कार्यक्रम के बजट का ज्यादातर हिस्सा भारत सरकार को देना है। अतः राज्य का इन पोस्टों की सेंक्शन ख़त्म करने का एकल अधिकार नहीं बनता।
डॉ. गुप्ता ने स्वस्थ भारत को बताया कि राष्ट्रीय बाल स्वास्थय कार्यक्रम एन.एच. एम का उपक्रम है जिसके तहत देशभर के 27 करोड़ बच्चो को स्वस्थ्य सेवाएं प्रदान करना है। भारत सरकार द्वारा जारी गाइडलाइन्स में ये साफ़ तौर पर लिखा है की देश में 0-18 साल तक के 50-60 % बच्चो को दांतों की बीमारी है अतः डेंटल सर्जन की पोस्ट ख़तम करना बच्चों को इलाज से वंचित रखना है। उनका मानना है की ये हरियाणा सरकार की स्वास्थ्य कर्मचारी विरोधी नीति का राज्य में प्रतिकूल असर पड़ेगा। गौरतलब है की जहां एक ओर एन.एच.एम के अंतर्गत अन्य राज्यों में नयी नियुक्तियां की जा रही हैं वही दूसरी ओर हरियाणा में बड़े पैमाने पर एन.एच.एम के कर्मचारियों को निकाल कर इस महतवपूर्ण प्रोग्राम को बंद करने का एजेंडा चलाया जा रहा है।
हरियाणा सरकार की इस नीति से कई बड़े सवाल खड़े हो गए हैं

  1. क्या एन.एच.एम को लेकर हरियाणा सरकार और भारत सरकार में कोई समन्वय नहीं है ?
  2. क्या इतनी बड़ी छंटनी किसी राजनितिक चाल का नतीजा है ?
  3. क्या सच में हरियाणा सरकार को भारत सरकार से एन.एच.एम चलाने का बजट नहीं मिला ?
  4. क्या कर्मचारियों को निकालने से राज्य की स्वास्थ्य व्यस्वस्था पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा ?
  5. क्या हरियाणा सरकार की पुराने कर्मचारियों को निकाल कर अपने मन पसंद लोगो को नौकरी पर रखने की कोई गहरी चाल है ?

ऐसा पहला मामला नहीं है की हरियाणा सरकार ने नौकरी से निकालने का फरमान सुनाया है। हाल में कई अन्य जिलों से भी एन एच एम कर्मचारिओं के हटाये जाने की खबरें आई थी । हटाये जाने से जहाँ एक तरफ कर्मचारिओं में नाराजगी है वही दूसरी तरफ कर्मचारी गोलबंद भी हो रहे हैं।
 

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