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सेहत पर भारी पड़ रहे इनर्जी ड्रिंक्स, टैक्स बढ़ाना होगा: WHO

सेहत पर भारी पड़ रहे एनर्जी ड्रिंक्स, टैक्स बढ़ाना होगा: WHO

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। इनर्जी ड्रिंक्स के(Energy drinks)  स्वास्थ्य पर निगेटिव असर को देखते हुए एक्सपर्ट लगातार सावधान करते आ रहे हैं। अब तो WHO ने भी चेतावनी दे डाली है कि सरकारें इसपर भारी टैक्स लगाए ताकि खपत कम हो। मालूम हो कि दुनिया भर में मीठे पेय पदार्थ और शराब लगातार सस्ते होते जा रहे हैं। वजह है अधिकांश देशों में इन पर बहुत कम टैक्स। नतीजा यह कि मोटापा, डायबिटीज, हृदय सम्बन्धी रोग, कैंसर और दुर्घटनाओं का खतरा तेजी से बढ़ रहा है, जिसका सबसे ज्यादा असर बच्चों और युवाओं पर पड़ रहा है। डब्ल्यूएचओ की नई वैश्विक रिपोर्ट चेतावनी देती है कि कमजोर कर नीतियों के चलते स्वास्थ्य के लिए हानिकारक यह उत्पाद सस्ते बने हुए हैं, जबकि इनकी वजह से ऐसी बीमारियों का बोझ स्वास्थ्य प्रणालियों पर लगातार बढ़ रहा है, जिन्हें रोका जा सकता है।

इनर्जी ड्रिंक्स: सेहत की कीमत पर मुनाफा

WHO के महानिदेशक डॉक्टर टेड्रोस एडनॉम घेब्रेयेसस का इस बारे में प्रेस विज्ञप्ति में कहना है कि स्वास्थ्य कर बीमारियों से बचाव और बेहतर सेहत के लिए हमारे सबसे असरदार औजारों में से एक हैं। तंबाकू, मीठे पेय और शराब पर टैक्स बढ़ाकर सरकारें न सिर्फ इनके सेवन को कम कर सकती हैं, बल्कि जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए संसाधन भी जुटा सकती हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार मीठे पेय और शराब का वैश्विक बाजार अरबों डॉलर का है। इससे जुड़ी कंपनियां भारी मुनाफा कमा रही हैं, लेकिन सरकारों को इनसे मिलने वाला स्वास्थ्य कर बहुत सीमित है। इसका खामियाजा समाज को लंबे समय तक बीमारियों और आर्थिक नुकसान के रूप में भुगतना पड़ता है। रिपोर्ट में सामने आया है कि 116 देश मीठे पेय पदार्थों पर टैक्स लगाते हैं, लेकिन यह टैक्स अक्सर सिर्फ सोडा तक सीमित है। 100 फीसद फलों के रस, दूध से बने मीठे पेय और रेडी-टू-ड्रिंक कॉफी-चाय जैसे हाई-शुगर उत्पाद अब भी टैक्स के दायरे से बाहर हैं। वहीं, 97 फीसद देश एनर्जी ड्रिंक्स पर टैक्स तो लगाते हैं, लेकिन 2023 के बाद से इसमें कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। 185 देशों में इसकी खपत को लेकर किए एक वैश्विक अध्ययन से पता चला है कि 1990 के बाद से वयस्कों में इसकी खपत 16 फीसद बढ़ी है, जो स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से बेहद चिंताजनक है।

इनर्जी ड्रिंक्स: सस्ती शराब, खतरा बड़ा

डब्ल्यूएचओ की एक अन्य रिपोर्ट में सामने आया है कि 167 देश शराब पर टैक्स लगाते हैं, जबकि 12 देशों में शराब पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसके बावजूद 2022 के बाद से अधिकतर देशों में शराब या तो और सस्ती हुई है या उसके दाम जस के तस हैं। इसकी वजह है टैक्स का महंगाई और आय में बढ़ोतरी के साथ तालमेल न बैठा पाना। चौंकाने वाली बात यह है कि यूरोप के कई देशों समेत कम से कम 25 देशों में वाइन पर कोई टैक्स नहीं लगता। डब्ल्यूएचओ के विशेषज्ञ डॉक्टर एटिएन क्रुग कहते हैं, “सस्ती शराब हिंसा, चोटों और बीमारियों को बढ़ावा देती है। मुनाफा उद्योग कमाता है, लेकिन स्वास्थ्य का नुकसान आम लोग उठाते हैं और आर्थिक बोझ पूरे समाज पर पड़ता है।“

इनर्जी ड्रिंक्स: टैक्स कम, असर कमजोर

डब्ल्यूएचओ विश्लेषण में सामने आया है कि बीयर पर औसतन महज 14 फीसद और स्पिरिट्स पर 22.5 फीसद ही एक्साइज टैक्स है। मीठे पेय पदार्थों पर टैक्स इतना कमजोर है कि एक आम सोडा की कीमत का महज करीब दो फीसद ही टैक्स होता है। इतना ही नहीं बहुत कम देश ही टैक्स को महंगाई के हिसाब से बढ़ाते हैं, जिससे ये हानिकारक उत्पाद समय के साथ और सस्ते हो जाते हैं। हालांकि 2022 के गैलप सर्वे में अधिकांश लोगों ने शराब और मीठे पेय पदार्थों पर ज्यादा टैक्स का समर्थन किया था। इसी को देखते हुए डब्ल्यूएचओ ने अपनी नई ‘3 बाय 35’ पहल के तहत देशों से अपील की है कि वे 2035 तक तंबाकू, शराब और मीठे पेय पदार्थों की वास्तविक कीमतें बढ़ाएं, ताकि इनके बढ़ते उपयोग को सीमित करने के साथ-साथ लोगों की सेहत को बेहतर तरीके से सुरक्षित किया जा सके। बता दें कि सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) भी लम्बे समय से लोगों की सॉफ्ट ड्रिंक्स, एनर्जी ड्रिंक्स और अन्य मीठे पेय पदार्थों के चलते बढ़ते खतरों को लेकर सजग करता रहा है।

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