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लालच और घूसखोरी का जन्म व्यक्तित्व के अकुशल कारक से

डॉ. मनोज कुमार

एक मजदूर अपने श्रम से इमारतें खड़ी करता हैं। सड़क बनाते समय अपनी पसीने की बूंदें से उसे नरम बनाता हैं ताकि पढे़-लिखे लोग उस पर सरपट अपने वाहन को गति दे सकें। वह हर पल समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाता है। कभी खेतों में काम कर स्वादिष्ट सब्जी-फल उगाता है और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग उसे अपना निवाला बनाते हैं ज्यादा दिन जीने के लिए।
यही मजदूर जब कोई काम कराने किसी दफ्तर में अपने घर नल, शौचालय या बुनियादी सुविधाओं के लिए अपनी बात रखना चाहते हैं तब हम पढे-लिखे लोग उसे दुत्कार देते हैं। कभी उस गरीब को मिलने वाले मुआवजे की रकम हथियाने की कोशिश करते हैं तो कभी किसी काम के एवज मे रिश्वत मांगते हैं। यह बाबू या साहब कम नहीं पढे़ होते। प्रतियोगिता में सफलता के पहले इनके कुछ सपने रहे होते हैं। सुबह से शाम तक इनके यह सपने इन्हें उस समय सोने नहीं देते थे। वह दिन-रात अध्ययन और सिर्फ तैयारी के लिए जान तक लगा देते थे। उस समय लाखों लोगों के बीच खुद को उम्दा साबित करने की होङ सी इनमें रहती। अब यह अधिकारी बन गये हैं। यह कोई भी काम बगैर भ्रष्टाचार के नहीं करते। इनका जमीर आम लोगों के लिए मर चुका है। वह पहले देश व समाज के लोगों के लिए कुछ सोचते थे। अब उनकी सोच स्वार्थी हो चुकी है। अब वह मजदूरों के हित नहीं वरन उनके हिस्से का भोजन भी डकारना चाहते हैं।
तभी सिमरन को उसके नाना ने पानी मार जगा दिया। दरअसल वह अपने डेली वेज पर काम करने वाले अपने बाबूजी के बकाये वेतन भुगतान के लिए सरकारी दफ्तर के चक्कर काट रही थी। उसके बाबूजी दैनिक मजदूरी पर सरकारी विभाग में मरम्मत का काम करते थे। अभी उनको टीबी रोग हो गया है और सरकारी स्कूल में पढ़ी सिमरन उनके हक के लिए भाग-दौङ़ कर रही है।
दरअसल लालच व घुसखोरी के लिए बचपन से अबतक पोषित व्यक्तित्व का अकुशल कारक ही मुख्य जिम्मेवार है। इस समस्या
से पीड़ित इंसान स्वार्थ सिद्धि के फिराक में होता है। वह लालच व भ्रष्टाचार का आसक्त बन जाता है और लोगों की भीड़ में शामिल हो अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करता रहता है। हालांकि समाज में इस तरह जब एक व्यक्ति किसी दफ्तर मे ऐसा करता है तब उसके साथी कार्यालय कर्मी भी उसको आदर्श के रूप में देखने लगते हैं। नतीजतन घूस लेने की हिमाकत बढ जाती है। ऊपर से नीचे तक कर्मचारी इस खेल को खेलते हैं और आम लोग व मजदूर इस दोहन में पीसते हैं।
भ्रष्टाचार में लिप्त लोग नित्य नये बंगले व गाड़ियां लेते हैं और समाज का निचला तबका इसे चमत्कार व सिस्टम के प्रति नकारात्मक सोच रखकर सामाजिक बुराइयों को जन्म देने लगता है। जो मेहनत से उच्च शिखर तक पहुँचते हैं, उनको सही से काम करने मे कितनी दिक्कत हो रही होती है। सिर्फ व्यक्तित्व के अकुशल कारक तुरंत लालच से समन्वय स्थापित कर लेता है जबकि एक मजदूर के व्यक्तित्व का कुशल कारक सादगी, परिश्रम व संतोषजनक जीवनशैली से आसक्ति स्थापित कर शहर, महानगर, कल-कारखाने समेत अनगिनत निर्माण कर देता है। बगैर उफ किये।

(लेखक पटना में मनोवैज्ञानिक चिकित्सक हैं।)

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