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होम्योपैथी देर से नहीं, तुरन्त असर करती है

संत समीर

बहुत से लोगों को एक भ्रम यह है कि होम्योपैथी देर से असर करती है। सच्चाई यह है कि सटीक लक्षणों पर दवा दी गई है तो असर दो-चार मिनट में भी दिख सकता है। कई बार एलोपैथी से भी जल्दी। दिक्क़त तब होती है जब सटीक लक्षण न मिल पाए हों। ऐसे में अनुमान से दी गई दवा ठीक न बैठे तो उसका कोई असर नहीं दिखेगा और फिर एक-दो दिन या और ज्यादा इन्तज़ार करने के बाद डॉक्टर दूसरी दवा का चुनाव करेगा। एक्यूट बीमारियों में सही दवा कई बार सेकेंडों में असर दिखा देती है। क्रॉनिक बीमारियों में ज़रूर कभी-कभी आपको कुछ दिन या कुछ हफ़्तों का इन्तज़ार करना पड़ सकता है। वैसे, दवा सही हो तो शरीर पर भले ही असर कुछ दिन बाद दिखाई दे, पर मानसिक स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन लाकर दवा अपने असर का संकेत पहले दिन भी दे सकती है।
मान लीजिए कि किसी डॉक्टर ने किसी बीमारी के लिए आपको सल्फर-200 की एक ख़ुराक दे दी। नतीजा कुछ यों आया कि एक-दो दिन में आपके शरीर पर फोड़े-फुंसी निकलने लगे। आपको लग सकता है कि दवा ने तो नुक़सान कर दिया। यहाँ पर डॉक्टर आपके शरीर से ज्यादा आपके मन पर ध्यान दे सकता है। अगर आप कहते हैं कि शरीर पर भले ही बड़े-बड़े फोड़े निकल रहे हैं, पर मन में काफ़ी अच्छा-अच्छा महसूस हो रहा है, तो इसका मतलब हुआ कि दवा दुरुस्त है और वह आपके शरीर में बैठे ज़हर या टॉक्सिक को त्वचा के रास्ते बाहर निकालने का काम कर रही है। यहीं पर यह भी समझिए कि अगर होम्योपैथी दवा देने पर बीमारी के लक्षण तो ग़ायब हो जाएँ, पर मन में ख़राब-ख़राब महसूस होने लगे तो इसका मतलब है कि दवा सही नहीं है और अब भी अगर आप नहीं सँभले तो किसी और बड़े ख़तरे की तरफ़ बढ़ रहे हैं।
इसे भी याद रखिए कि होम्योपैथी दवा करवा रहे हों तो प्राकृतिक तेलों के अलावा रसायनों से बने ऊपरी मलहम या इंजेक्शन वग़ैरह लेने की बेवकूफ़ी नहीं करनी चाहिए। यह अजीब रहस्य है कि जिन लोगों के गम्भीर चर्मरोग मलहम, इंजेक्शन वग़ैरह के इलाज से दब जाते हैं, वे सिर्फ़ निरोग होने के भ्रम में जीते हैं। असल में एलोपैथी दवाओं से चर्मरोग बस दब भर जाता है और भीतर बैठा-बैठा ख़ुद को मज़बूत करता रहता है। अगर दिनचर्या में प्रकृति के अनुकूल शरीर शुद्धि का कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ है तो कुछ सालों बाद दबा हुआ चर्मरोग दमा जैसे कुछ कठिन रोगों का उपहार दे सकता है। होम्योपैथी के जनक हनीमैन को इसी रहस्य का पता चला था, जिसके चलते उन्होंने एलोपैथी की प्रैक्टिस से सन्यास ले लिया और होम्योपैथी की विधि खोजी।
हनीमैन एलोपैथी के नामी डॉक्टर थे। उन्होंने अपनी प्रैक्टिस के दौरान देखा कि अपने जिन नियमित रोगियों के एग्जिमा जैसे कई चर्मरोग उन्होंने इंजेक्शन और मलहम वग़ैरह से ठीक किए थे, उनमें से कई कुछ सालों बाद दमा जैसे रोग की शिकायत लेकर आए। मरीज़ों को तो बस यही लगा था कि यह नया रोग है, पर हनीमैन के तेज़ दिमाग़ ने इस रहस्य को समझ लिया कि एलोपैथी की पद्धति में एक कमी ऐसी है, जिसके चलते यह ज्यादातर मामलों में रोगों को पूरी तरह से ठीक करने के बजाय उन्हें दबा देती है। सामान्य दिनचर्या से रोग विष बाहर न निकल पाए तो जीवन भर कुछ-न-कुछ उपद्रव चलता रहता है। मरीज़ अस्पताल के दरवाज़े खटखटाता रहता है और समझता है कि हर बार उसे कोई नया रोग हो रहा है। इसीलिए सलाह दी जाती है कि शरीर की रोगप्रतिरोधक शक्ति बनाए और बचाए रखना हो तो बिना ज़रूरत के ज़रा-ज़रा-सी बात पर एलोपैथी दवाएँ लेने से बचें।
मेरा ख़ुद का उदाहरण है कि बचपन के हादसे के बाद जब मैं चारपाई पर रहने लगा और क़रीब साल भर तक मेरा इलाज चला तो सैकड़ों इंजेक्शनों और हज़ारों टेबलेटों ने मेरी ज़िन्दगी तो बचा ली, पर शरीर को ऐसा बना दिया कि ठीक होने के बाद भी मुझे दस-बीस दिन में या महीना बीतते-बीतते कुछ-न-कुछ हो ही जाता और डॉक्टर की शरण में जाना पड़ता। काफ़ी समय बाद जब मेरी समझदारी बढ़ी और ख़ुद को बचाने के लिए मैंने चिकित्साशास्त्र का अध्ययन और प्रयोग करना शुरू किया तो नतीजा यह हुआ कि एलोपैथी दवाओं के जाल से धीरे-धीरे मुझे मुक्ति मिलने लगी। इधर के बीस वर्षों में मेरी अनुपस्थिति में मेरी पत्नी को महज़ दो-तीन बार डॉक्टर के पास जाना पड़ा है, पर मेरे रहने पर कठिन-से-कठिन परिस्थितियों में भी होम्योपैथी ने ही हमारा बेड़ा पार लगाया है। मेरी दोनों बेटियों के सामने अभी तक ऐसी कोई स्थिति नहीं आई है कि उन्हें किसी डॉक्टर के यहाँ ले जाना पड़े। हल्का-फुल्का कभी कुछ हुआ तो घर में होम्योपैथी से मामला सँभल जाता रहा है।
घर की ही एक घटना बताता हूँ, जिससे आपको समझ में आएगा कि होम्योपैथी कितनी तेज़ काम करती है। एक दिन सवेरे के समय दफ़्तर के लिए निकला ही था कि पत्नी की हल्की-फुल्की ख़राब तबीयत का पता चला। उन्होंने कहा कि कोई नहीं, कमर से नीचे पैरों में हल्का-हल्का दर्द है, शाम को आना तो दवा वग़ैरह देखना; लेकिन कुछ देर में दर्द बढ़ गया तो मुझे कुछ सन्देह हुआ और उल्टे पैर मैंने घर का रुख़ किया। सन्देह सही निकला। चन्द मिनटों में दर्द असहनीय हो गया था। श्रीमती जी न चल सकती थीं, न उठ-बैठ सकती थीं। असल में क़रीब दो साल पहले भी उनको ऐसा दर्द हुआ था। उस वक्त मैं घर पर नहीं था तो पड़ोसी उन्हें लेकर अस्पताल गए। पथरी और यूट्रस में इंफेक्शन के बीच डॉक्टर कुछ देर घनचक्कर रहे थे। बाद में मैंने उन्हें होम्योपैथी देकर ठीक किया था, पर तीन-चार महीने के लिए सावधानियाँ बताते हुए चेतावनी दी थी कि ऐसा नहीं करोगी तो यह फिर हो सकता है। दिक्क़त यह होती है कि दवा-दारू का इन्तज़ाम घर में ही हो और कठिन स्थितियाँ भी क़ाबू में आती रही हों तो आदमी लापरवाह और कुछ अतिआत्मविश्वास से भरा-भरा-सा रहता है कि कुछ होगा तो देख ही लेंगे। असल में कितना भी ज़ोरदार गरम मसाला मिलाइए, पर बात वही कि ‘घर की मुर्गी दाल बराबर’।
ख़ैर, इस दर्द में श्रीमती जी ने जो-जो लक्षण बताए उस आधार पर कुछ दवाएँ दीं। कई बार दिक्क़त ऐसी होती है कि असहनीय स्थितियों में मरीज़ अपने लक्षण बताने लायक़ होता ही नहीं तो आपको ख़ुद उसकी शारीरिक गतिविधियों पर ध्यान जमाए रखना पड़ता है। उनका हाल देखकर एकबारग़ी मैं डर-सा गया और अस्पताल ले जाने की तैयारी में लग गया। जो कुछ करना था, आनन-फानन में करना था तो तैयारी करते हुए ही मैंने जलालपुर (अम्बेडकर नगर) के अपने होम्योपैथी डॉक्टर मित्र यू. पटेल जी को फ़ोन लगाया और स्थिति बताई। बातचीत के बाद हमने तय किया कि दो बूँद की एक ख़ुराक आर्सेनिक दी जाय। दर्द के नाते नहीं, बल्कि बेचैनी के भाव के चलते यह दवा चुनी गई थी। श्रीमती जी से पूछने पर वे बस दर्द का इशारा कर रही थीं, पर उनके चेहरे की बेचैनी को मैं साफ़-साफ़ देख सकता था। दो-तीन मिनट बाद मैंने हाल पूछा तो मानसिक स्तर पर वे अच्छा महसूस करने लगी थीं। आधा घंटा बीतते-बीतते दर्द का नामोनिशान ख़त्म हो गया और वे घर के कामकाज में लग गईं।
तो ऐसा बिल्कुल ज़रूरी नहीं है कि होम्योपैथी देर से परिणाम दे। सिरदर्द, पेटदर्द वग़ैरह में मेरा तरीक़ा यह है कि मैं मरीज़ की जीभ पर दवा टपका कर दस मिनट के लिए बैठा लेता हूँ। अगर दस-पन्द्रह मिनट में वह कहता है कि दर्द पचास फ़ीसद तक घट गया है तो उसे जाने की इजाज़त देता हूँ, अन्यथा कुछ और लक्षण पूछकर दूसरी दवा का चुनाव करता हूँ। यह ज़रूर समझना चाहिए कि कुछ दवाएँ, जिन्हें हम डीप एक्टिङ मेडिसिन कहते हैं, उनका काम का तरीक़ा थोड़ा अलग होता है। इनका असर कभी-कभी कई-कई दिन बाद आ सकता है और महीनों तक बना रह सकता है। फॉस्फोरस जैसी कुछ दवाओं को तो एक ख़ुराक के बाद दूसरी ख़ुराक देने की नौबत ही नहीं आती। मूल बात कि बीमारी एक्यूट या क्रॉनिक, जैसी भी है, उस हिसाब से दवा का जल्दी या देर में असर दिखाई दे सकता है। दवा और बीमारी, दोनों की प्रकृति मायने रखती है।
ऊपर की कुछ बातों को कृपया एलोपैथी की आलोचना न समझें। साइडइफेक्ट के सच के बावजूद यह एक महान पद्धति है, जिसने तमाम कठिनाइयों को आसान बनाया है। गम्भीर दुर्घटना हो जाए या अचानक किसी सर्जरी की ज़रूरत पड़ जाए तो एकमात्र एलोपैथी ही आपकी मदद कर सकती है।

सन्त समीर. कॉम से साभार

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