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कबीर का फलसफा और दयाराम सारोलिया

कुमार कृष्णन

कई बार मध्य प्रदेश की यात्रा का अवसर मिला। एकता परिषद के संस्थापक पीवी राजगोपाल की जनसत्याग्रह यात्रा के क्रम में पूरे भारत की यात्रा के दौरान मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में प्रवास और विभिन्न आंदोलनों को देखने और समझने का मौका मिला। दूसरी यात्रा स्वस्थ भारत न्यास की ओर से थी। इस यात्रा का उद्देश्य ‘स्वस्थ बालिका, स्वस्थ समाज ‘था। मेरे लिए दोनों ही यात्रा काफी महत्वपूर्ण रही। इस यात्रा ने लिखने के लिए बहुत सारे विषय दिए। कारण भारत के विभिन्न क्षेत्रों में परिभ्रमण था। इस यात्रा में हमारे साथ पत्रकार और स्वस्थ भारत न्यास के चेयरमैन आशुतोष कुमार सिंह, गांधीवादी पत्रकार प्रसून लतांत, विनोद रोहिल्ला आदि थे। भोपाल में मीडिया चौपाल के संयोजक अनिल सौमित्र की पहल पर कार्यक्रम आयोजित था।इन कार्यक्रमों में एक भोपाल स्थित जनजातीय संग्रहालय के सभागृह में एक सभा थी और सभा के बाद कबीर गायन का कार्यक्रम था। इस कार्यक्रम में माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं विश्वविद्यालय के उस समय के कुलपति ब्रजकिशोर कुठियाला भी थे। अरविंद और विनोद गुर्जर भी थे।कार्यक्रम में कबीर गायन की प्रस्तुति आज भी हमारे जेहन में है।
इस कार्यक्रम देवास से पधारे कलाकार श्री दयाराम सारोलिया और उनके साथी तेजुलाल यादव (तंबुरा) सह गायक, समुन्दर सिह सारोलिया (मंजीरा), मनोज घुडावद (नगारी), दिनेश यादव (ढोलक), जगदीश चौहान (मंजीरा) थे। देवास का संगीत से बहुत गहरा नाता है। लोक शैली के गायन की बात होती है तो कबीर के नाम की चर्चा स्वाभाविक ही होने लगती है। यह सिर्फ कबीर का प्रताप नहीं बल्कि गाने की शैली, यहां की हवा, मौसम, पानी और संस्कारों की एक परम्परा है, जो सदियों से यहां निभाई जा रही है।
भोपाल के जनजातीय संग्राहलय में स्वस्थ भारत यात्रा के दौरान देवास के सुप्रसिद्ध कबीर भजन गायक श्री दयाराम सारोलिया व साथी कलाकारों को सुनना काफी सुखद लगा। उनके द्वारा प्रस्तुत कबीर के भजनों ने संमा बांधा।

दयाराम उनके साथियों द्वारा मालवी बोली में कबीरदास के लोकपदों और निरगुनी भजनों की प्रस्तुति से मन भाव-विभोर हो गया। दयाराम सारोलिया जैसे कलाकारों की कला आज भी मेरे जेहन में है। वारी जाउं रे बलिहारी जाउं रे सद्गुरू वंदना से कार्यक्रम का आरंभ हुआ। सुन ले साधु भाई, मन मस्त हुआ फिर क्या बोलें, म्हारा रंग महल में अजब सहर में, मोतीड़ा चुगे हंसा और अंत में जरा धीरे गाड़ी हांको राम गाड़ीवाला की प्रस्तुति से यों लगा मानो जन्म से विद्रोही, प्रकृति से समाज सुधारक, प्रगतिशील, दार्शनिक, मौलिक कवि और लोकनायक कबीर दास जी की निगुर्णी वाणी की अजस्त्र अखण्डित धाराएं सभागार में प्रवाहमान हों गई हों,जो न जाने मालवा जनपद के अब तक अनगिनत लोक कण्ठों से निस्त्रत हो कर न जाने कितने गांवों के अनगिने लोगों को आप्लावित कर चुकी होंगी। मालवा के देवास, इंदौर, उज्जैन और शाजापुर जिलों में कबीर साहब की प्रतिष्ठा आराध्य के रूप में की जाती है। पाड़ल्या, रणायल गाडरी काठ बड़ौदा और लूण्या खेड़ी इत्यादि गांवों में तो कबीर साहब के अनुगामियों की कमी नहीं है। देवास के अद्वितीय मूर्धन्य स्वर साधक श्री कुमार गंधर्व के कबीरगान से प्रभावित श्री दयाराम कबीर भजन गायन की ओर आकृष्ट हुए थे। यद्यपि निगुर्णोपासना का पहला पाठ उन्होंने अपने घर में अपनी दादी सोदरा देवी से पढ़ा था चक्की पीसते समय घट्टी पर गाते हुए वे मालवी में मीरा के कृष्णभक्ति से परिपूर्ण लोक गीत गुनगुनाया करती थीं। ‘केत कबीर सुणो रे भाई सादू’ का ज्ञान उन्हें अपने मामा तम्बूरा वादक श्री तेजूलाल यादव जी से प्राप्त हुआ।
यह उन दिनों की बात है जब उनके सगे संबंधी पद्मश्री प्रहलाद टिपण्या कबीर गान से देश विदेश में ख्याति अर्जित कर रहे थे। अपनी गायकी से मध्यकालीन संत साहित्य के शिरोमणि कबीर को मालवा के जन-जन के अन्तःकरण में स्थापित कर चुके श्री बाबूलाल सारोलिया, श्री कैलाश जी सोनी, श्री हेमन्त चौहान, प्रख्यात पत्रकार और साहित्यकार मनीष वैद्य,प्रसिद्ध माचकार सुंदरा आनंद सरगम और स्व.स्वतंत्र कुमार ओझा जी ने भी दयाराम को कबीर गान के लिए प्ररित किया। उन्ही के पद चिन्हों पर चल कर श्री दयाराम ने 12 वर्ष की अवस्था में आकाशवाणी में अपना पहला कबीर भजन रिकार्ड कराया। उज्जैन स्थित खैरागढ़ माधव संगीत महाविधालय से शास्त्रीय संगीत में प्रथमा और मध्यमा उत्तीर्ण करने के दौरान ही पंचायत सचिव के पद पर शासकीय सेवा में आ जाने के कारण उन्हें पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। पढ़ाई पूरी किये बिना ही वे गांव लौट आये कबीर की वाणी का चमत्कारिक प्रभाव तो उनके सिर चढ़कर बोल रहा था सो वे गांव-गांव घूमकर कबीर गान से लोक मानस में आत्मविश्वास आस्था और आशावाद की भावनाएं प्रतिष्ठापित करने में जुट गये। दयाराम जी ने ओशों को बांचा जिसमें वे कबीर को सीधे गोलकुंडा की खदान से निकले कोहिनूर अनगढ़ हीरे की संज्ञा देते हैं।
दयाराम बताते हैं कि कबीर ने राम को स्वीकारा है पर तुलसी के राम और कबीर के राम में अन्तर है। कबीर के राम तो आत्मा के राम है। कबीर दास जी की स्पष्टवादिता और मनुष्यता से प्रभावित श्री दयाराम की संवेदनशील गायकी इसीलिए हृदय को संस्पर्श करती चलती है। संत बुल्लेशाह, दादू दयाल, पलटू साहिब और संत सिंगाजी जैसे संत जो विसंगतियों की ओर उंगली उठाना जानते थे की तेजस्विता का प्रखरता से समर्थन करने वाले दयाराम गांवों में आयोजित होने वाले मेलों में संतो की वाणी को लोक, बेंत तथा लावणी छंद गायकी में ऐसे पिरोकर प्रस्तुत करते हैं कि लोक मानस कालजयी धर्मोपदेशक कबीर सहित निरगुनी साधकों की रचनाओं से स्वमेव जुड़ जाता है और रूखी-सूखी खाय के ठण्डा पाणी पी। देख परायी चूपड़ी मत ललचाओं जी कहने वाले कबीर के निष्पक्ष चिंतन के प्रबल समर्थक श्री दयाराम की कबीर वाणी देखने और सुनने वालों को लगभग साढ़े छः सौ साल पुराने कबीर युग में ले जाती है।
देश के महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक मंचों तथा गरिमामय सांगीतिक आयोजनों में मालवी की मीठी बोली के लोक गायन की उम्दा सरस प्रस्तुतियों के दयाराम काफी लोकप्रिय हैं। 15 अप्रैल 1973 को देवास के एक गांव में जन्में श्री सारोलिया अब तक लगभग चार हज़ार से ज़्यादा प्रस्तुतियों के माध्यम से लोक गायन के माधुर्य और उसके विविधवर्णी रूप से लाखों श्रोताओं को रस विभोर करते रहे हैं।
बीते 40 बरसों से कबीर की निर्गुण गायकी के साथ अंचल में गाये जाने वाले मीरा, दादू, गोरखनाथ, सहजो बाई सहित अन्य भक्ति कवियों के सैकड़ों सालों पुराने क़रीब डेढ़ हज़ार गीतों को संगीतबद्ध कर उन्हें सजीव रूप दिया, ठेठ गाँवों की प्रतिभाओं को उभारने के लिए युवा कलाकारों, संगीतकारों और गायकों को प्रशिक्षण, लोक नाट्य की लगभग विलुप्त शैली ‘माच’ को पुनर्जीवित करते हुए उसके लगातार मंचन कर रहे हैं।
उत्कृष्ट प्रस्तुतियों के लिए कई प्रतिष्ठित प्रादेशिक और राष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं।
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली के मंच पर नाटकों में अभिनय तथा लोक गायन निरंतर हिस्सा लेते रहे हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन से नियमित रूप से कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहता है। अमेरिका के स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी में धर्म शिक्षा विषय की विभागाध्यक्ष प्रो. लिंडा हेस ने ग्रामीण अंचल में कबीर पर अपनी महत्त्वपूर्ण क़िताब ‘द बॉडी ऑफ सॉग’ में भी श्री सारोलिया के गायन का उल्लेख है। शबनम वीरमानी के लोक में कबीर सीरिज के ‘कबीरा खड़ा बाज़ार में’ और ‘चलो हमारे देस’ वृत्तचित्रों में उनका विशेष उल्लेख है।
नई दिल्ली के प्रतिष्ठित लाल किले, लोक कला मंच, विश्व रंग, भारत भवन, रवीन्द्र भवन, कालिदास अकादमी, राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, लोक रंग लखनऊ, उत्तर मध्य सांस्कृतिक केंद्र प्रयागराज, युवा उत्सव बैंगलौर, कला अकादमी, जनजाति कला संग्रहालय, राज्य ग्रामीण विकास संस्थान जबलपुर, कबीर महोत्सव, वाराणसी, सिंहस्थ इलाहबाद और उज्जैन, निमाड़ उत्सव, मालवा उत्सव, ताप्ती महोत्सव, देवास महोत्सव सहित कई मंचों से लोक गायकी की प्रस्तुति से गौरवान्वित हो चुके हैं।
फिल्मों और ऑडियो कैसेट्स के ज़रिये देश के कई हिस्सों में गूँजते हैं इनके गीत। 2015 में सुशांतसिंह राजपूत अभिनीत फिल्म ‘सोनचिरैया’ में लोक धुनों का पार्श्व संगीत सारोलिया का ही है। इस फिल्म को बेस्ट फिल्म अवार्ड मिला।‘समोसा’ ‘पार्टी’ तथा अन्य कुछ फिल्मों के लिए लोक गायन भी किया और पार्श्व संगीत भी दिया। आकाशवाणी के स्वतंत्र कुमार ओझा के वृत्त चित्र ‘महेश्वर’ में टाइटल सॉंग’ भी इन्हीं का है। शीर्ष संगीत संस्था ‘बीट्स ऑफ़ इण्डिया’ सीरिज में लोकगीत संकलन है।
लोक गायन शैली की परम्परागत शैली की गंध बरकरार रखते हुए ज़रूरी नवाचारों के साथ इसे और निखारने की लगातार कोशिश जारी रखे हुए है।
लगभग खोती जा रही आंचलिक लोक परम्परा को बड़ी शिद्दत से संग्रहित कर भरपूर समृद्ध करने के साथ नयी पीढ़ी को सामाजिक और व्यक्तिगत नैतिकता से जोड़ने की कोशिश में लगे हुए हैं। लोकगीतों के ज़रिये सरसता, राष्ट्रीय और सांस्कृतिक एकता को मज़बूत बनाने के साथ अशिक्षा, अंधविश्वास, सामाजिक कुरीतियों और विसंगतियों पर सटीक चोंट करते हुए मनुष्यता के सन्देश को जन-जन तक पहुँचाने के अभियान में सक्रिय हैं।

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