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प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक: वैचारिक पूर्वाग्रह का शिकार भारत

प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक: वैचारिक पूर्वाग्रह का शिकार भारत

धीप्रज्ञ द्विवेदी

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पेरिस स्थित गैर-सरकारी संगठन ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ (RSF) द्वारा जारी ‘वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक’ (World Press Freedom Index 2026) अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग प्रणालियों की विश्वसनीयता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। इस वर्ष की रिपोर्ट में भारत को 180 देशों में से 157वें स्थान पर रखा गया है। इस सूचकांक की सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इसमें भारत को अपने पड़ोसी देशों पाकिस्तान (153वां स्थान) और बांग्लादेश (152वां स्थान) से भी पीछे धकेल दिया गया है। एक ऐसे देश को, जहाँ लोकतंत्र की जड़ें इतनी गहरी और जीवंत हैं, उन देशों से नीचे रखना जो सैन्य हस्तक्षेप, गंभीर राजनीतिक अस्थिरता और संस्थागत सेंसरशिप से जूझ रहे हैं, सीधे तौर पर इस सूचकांक के वैचारिक पूर्वाग्रह को उजागर करता है।

जमीनी हकीकत बनाम सूचकांक का चश्मा

RSF का यह सूचकांक ठोस आंकड़ों (Hard Data) के बजाय चुनिंदा विशेषज्ञों की ‘धारणा’ (Perception) और एकतरफा प्रश्नावली पर टिका होता है। लेकिन जब हम इस धारणा के चश्मे को उतारकर धरातल पर मौजूद वास्तविक और प्रमाणित सांख्यिकीय आंकड़ों को देखते हैं, तो कहानी पूरी तरह उलट जाती है। प्रेस स्वतंत्रता के वास्तविक स्तर को मापने के लिए दो पैमाने सबसे महत्वपूर्ण हैं: प्रति एक लाख जनसंख्या पर पत्रकारों पर होने वाले हमले और प्रति एक लाख पत्रकारों पर होने वाली अवैध दोषसिद्धि (Unlawful Conviction)।
पत्रकारों पर हमलों की दर—भारत का मीडिया परिदृश्य दुनिया के सबसे बड़े तंत्रों में से एक है, जहाँ हजारों दैनिक समाचार पत्र, सैकड़ों समाचार चैनल और लाखों की संख्या में डिजिटल प्लेटफॉर्म सक्रिय हैं। भारत की विशाल आबादी और मीडिया के इस विशाल फैलाव को देखते हुए, पत्रकारों पर होने वाले हिंसक हमलों की दर प्रति 1,00,000 जनसंख्या पर पूरी तरह नगण्य है।
भारत की स्थिति—एक मजबूत कानून-व्यवस्था और स्वतंत्र न्यायपालिका के कारण यहाँ पत्रकार बिना किसी सामूहिक भय के काम करते हैं। किसी भी अप्रिय घटना की स्थिति में कानूनी तंत्र तुरंत हरकत में आता है।
पड़ोसी देशों की स्थिति—इसके विपरीत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में ईशनिंदा कानून, सैन्य दबाव और कड़े डिजिटल सुरक्षा कानूनों के बेजा इस्तेमाल के कारण पत्रकारों का अपहरण, शारीरिक उत्पीड़न और उन पर हिंसक हमले होना एक आम बात है, जो सांख्यिकीय रूप से भारत से कहीं ज्यादा है।
अवैध दोषसिद्धि की दर—कोई देश कानूनी रूप से पत्रकारों के लिए कितना सुरक्षित है, इसका अंदाजा इससे लगता है कि वहाँ कितने पत्रकारों को बिना किसी निष्पक्ष अदालती प्रक्रिया के या दुर्भावना से (Unlawful Conviction) सजा दी गई।
भारत की स्थिति—भारत की न्यायपालिका पूरी तरह स्वतंत्र और मुखर है। कई ऐतिहासिक मामलों में उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय ने प्रेस की आजादी पर आंच नहीं आने दी और पत्रकारों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकियों को निरस्त कर उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बहाल किया। यहाँ ‘अवैध दोषसिद्धि’ की दर शून्य के बराबर है।
पड़ोसी देशों की स्थिति—पाकिस्तान और बांग्लादेश में आतंकवाद-रोधी कानूनों और मानहानि के विशेष प्रावधानों की आड़ में पत्रकारों को मनमाने ढंग से सजा सुनाना बेहद आम है, क्योंकि वहाँ की न्यायिक प्रक्रिया पर कार्यपालिका या सैन्य ताकतों का सीधा नियंत्रण देखा जाता है।

वैश्विक आंकड़ों का विश्लेषण

पश्चिमी देशों और दुनिया की अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं को इस सूचकांक में हमेशा बहुत ऊपर जगह दी जाती है। लेकिन अगर हम इन देशों में पत्रकारों पर होने वाले हमलों, उनकी गिरफ्तारियों और प्रशासनिक दबाव के वास्तविक आंकड़ों को खंगालें, तो इन तथाकथित स्वतंत्र समाजों का एक अलग ही चेहरा सामने आता है:
1. संयुक्त राज्य अमेरिका—अमेरिका में नस्लीय न्याय से जुड़े आंदोलनों (जैसे ब्लैक लाइव्स मैटर) और हाल के समय में विश्वविद्यालयों में हुए प्रदर्शनों के दौरान रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों की गिरफ्तारियां और उन पर पुलिसिया बल प्रयोग के मामले बड़े पैमाने पर देखे गए। ‘यूएस प्रेस फ्रीडम ट्रैकर’ के आंकड़े बताते हैं कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान दर्जनों पत्रकारों को न सिर्फ हिरासत में लिया गया, बल्कि उन पर सीधे हमले भी हुए। इसके अलावा, अमेरिकी मीडिया का एक बड़ा हिस्सा कुछ गिने-चुने कॉर्पोरेट घरानों के नियंत्रण में है, जो अदृश्य रूप से वैचारिक सेंसरशिप चलाता है।
2. कनाडा—कनाडा में ‘फ्रीडम कॉन्वॉय’ (ट्रक चालकों के बड़े आंदोलन) और स्वदेशी समुदायों के अधिकारों से जुड़े प्रदर्शनों के समय कवरेज कर रहे पत्रकारों को प्रशासनिक दमन का सामना करना पड़ा। कई स्वतंत्र पत्रकारों को प्रदर्शन स्थलों से जबरन हटा दिया गया और उनके रिकॉर्डिंग उपकरण तक जब्त कर लिए गए।
3. फ्रांस—फ्रांस में ‘येलो वेस्ट’ (Yellow Vest) आंदोलन और नए सुरक्षा कानूनों के विरोध के समय जमीन पर काम कर रहे पत्रकारों पर पुलिस ने लाठियां बरसाईं और आंसू गैस के गोले छोड़े। यही नहीं, फ्रांस में ऐसे कानून तक लाने की कोशिश की गई जो पुलिस ऑपरेशनों के दौरान सुरक्षा बलों की तस्वीरें या वीडियो बनाने पर पत्रकारों को रोकते हों। वैश्विक स्तर पर इसकी काफी आलोचना भी हुई थी।
4. जर्मनी—जर्मनी भले ही इस सूचकांक में बहुत ऊपर रहता हो, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक रैलियों और चरमपंथी संगठनों के प्रदर्शनों के दौरान पत्रकारों पर शारीरिक हमलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। खुद जर्मन पत्रकार संघों ने कई बार सड़कों पर मीडियाकर्मियों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है।
5. नॉर्वे और स्वीडन—ये स्कैंडिनेवियाई देश इस सूचकांक के स्थायी टॉपर हैं। हालांकि यहाँ जमीनी स्तर पर शारीरिक हिंसा बहुत कम है, लेकिन हाल के वर्षों में डिजिटल स्पेस में खोजी पत्रकारों—विशेषकर आव्रजन (Immigration) और संगठित अपराधों पर लिखने वालों—को मिलने वाली ऑनलाइन धमकियों और साइबर-उत्पीड़न (Cyber-harassment) के मामलों में भारी उछाल आया है। धुर-दक्षिणपंथी और धुर-वामपंथी समूहों द्वारा महिला पत्रकारों को निशाना बनाने का चलन इन देशों में काफी बढ़ा है।
6. ब्राजील—ब्राजील को इस सूचकांक में भारत से काफी बेहतर दिखाया जाता है, जबकि वहाँ का सच बेहद डरावना है। ब्राजील के आंतरिक इलाकों में पर्यावरण, अमेज़न के जंगलों की कटाई, जमीन के विवाद और संगठित ड्रग कार्टेल्स के खिलाफ आवाज उठाने वाले पत्रकारों की लक्षित हत्याएं एक कड़वी सच्चाई है। राजनीतिक खींचतान के दौरान वहाँ न्यायिक आदेशों के जरिए कई प्रमुख पत्रकारों के सोशल मीडिया खातों को पूरी तरह बंद कर दिया गया था।

तुलनात्मक सांख्यिकीय तालिका (एक नजर में)

सूचकांक रैंकिंग (सांकेतिक स्थिति) कानूनी संरक्षण का आधार वास्तविक चिंताएं और जमीनी हमले
नॉर्वे / स्वीडन शीर्ष श्रेणी (1-5) सुदृढ़ अभिव्यक्ति कानून खोजी पत्रकारों का गंभीर साइबर-उत्पीड़न और धमकियां।
संयुक्त राज्य अमेरिका उच्च-मध्यम श्रेणी संविधान का प्रथम संशोधन प्रदर्शनों के कवरेज पर गिरफ्तारियां, कॉर्पोरेट एकाधिकार।
कनाडा उच्च श्रेणी चार्टर ऑफ राइट्स आंदोलन कवर कर रहे पत्रकारों की बलपूर्वक बेदखली।
जर्मनी / फ्रांस उच्च श्रेणी यूरोपीय मानवाधिकार कानून प्रदर्शनों में पत्रकारों पर पुलिसिया बल प्रयोग और शारीरिक हमले।
ब्राजील मध्यम श्रेणी संवैधानिक स्वतंत्रता ड्रग कार्टेल्स द्वारा पत्रकारों की हत्याएं, सोशल मीडिया सेंसरशिप।
भारत 157वां (त्रुटिपूर्ण) अनुच्छेद 19(1)(ए) अद्भुत विविधता, स्वतंत्र न्यायपालिका, परंतु सूचकांक के पश्चिमी पूर्वाग्रह का शिकार।

सूचकांक की बनावट में ही खोट (Methodological Bias)

वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक की पूरी कार्यप्रणाली (Methodology) को समझने पर यह साफ हो जाता है कि यह पैमाना कितना खोखला और एकतरफा है:
धारणा का खेल—RSF किसी देश के वास्तविक अपराध आंकड़ों को देखने के बजाय अपनी पसंद के कुछ गैर-governmental संगठनों, विचारकों और आलोचकों को एक प्रश्नावली भेजता है। उनके व्यक्तिगत विचारों और ‘धारणाओं’ के आधार पर स्कोर तय होता है, जो पूरी तरह से वैचारिक पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो सकता है।
आकार और विविधता की अनदेखी—यह सूचकांक भारत जैसे 140 करोड़ से अधिक की आबादी वाले देश की तुलना छोटे और नियंत्रित मीडिया वाले देशों से करता है। भारत में 1 लाख से अधिक पंजीकृत समाचार पत्र और पत्रिकाएं हैं; ऐसे में ‘स्केल’ (Scale) को पूरी तरह नजरअंदाज कर देना बेमानी है।
दोगले मानदंड—पाकिस्तान, जहाँ पत्रकारों का रहस्यमयी तरीके से गायब हो जाना आम है, और बांग्लादेश जहाँ हालिया राजनीतिक उथल-पुथल में मीडिया की आवाज को पूरी तरह दबा दिया गया, उन देशों को भारत से बेहतर रैंकिंग देना यह साबित करता है कि इस सूचकांक का जमीनी हकीकत से कोई वास्ता नहीं है।

भारत का वास्तविक स्थान कहाँ होना चाहिए?

अगर हम राजनीतिक पूर्वाग्रहों और ‘धारणा’ के खेल को किनारे रखकर तथ्यों, कानूनों और व्यावहारिक स्थितियों के आधार पर एक निष्पक्ष मूल्यांकन करें, तो भारत की स्थिति कहीं अधिक मजबूत नजर आती है:
1. अदालतों का सुरक्षा कवच—भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ पूरी तरह आजाद होना चाहिए। अर्नब गोस्वामी मामले से लेकर विनोद दुआ मामले तक, अदालतों ने हमेशा आगे बढ़कर अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा की है।
2.अभूतपूर्व विविधता (Pluralism)—भारत में जितने अलग-अलग भाषाओं के समाचार पत्र, क्षेत्रीय चैनल और स्वतंत्र डिजिटल पत्रकार सक्रिय हैं, वैसी विविधता पूरे पश्चिमी यूरोप और अमेरिका को मिलाकर भी नहीं दिखती। यहाँ सरकार की तीखी से तीखी आलोचना करने वाले और सरकार का समर्थन करने वाले, दोनों ही पक्ष पूरी आजादी के साथ अपनी बात रखते हैं।
3. संवैधानिक अधिकार—भारत में प्रेस की आजादी किसी सरकार या प्रशासन की दया पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह देश के संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है।

वास्तविक रैंकिंग का निष्पक्ष आकलन

इन सभी वास्तविकताओं—यानी सुरक्षित कानूनी माहौल, भाषाई विविधता और न्यायिक स्वतंत्रता को ध्यान में रखते हुए, भारत का वास्तविक स्थान वैश्विक स्तर पर शीर्ष 50 से 60 देशों के भीतर (60वीं से 70वीं रैंक के आसपास) होना चाहिए। भारत की तुलना पश्चिमी यूरोप के उन छोटे और एकरूप (Homogeneous) समाजों से नहीं की जा सकती जिनकी आबादी हमारे यहाँ के एक छोटे से जिले के बराबर है। लेकिन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका या खुद अमेरिका जैसे बड़े, विविधतापूर्ण और जटिल समाजों की तुलना में भारत में प्रेस की आजादी का स्तर किसी भी मायने में कम नहीं है। भारत को 157वें स्थान पर रखकर पाकिस्तान और बांग्लादेश से पीछे खड़ा करना केवल एक पद्धतिगत भूल नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित भू-राजनीतिक और वैचारिक पूर्वाग्रह का नतीजा है।

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