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Study : भारत में ‘ट्विन एपिडेमिक’ की दस्तक

STUDY : भारत में 'ट्विन एपिडेमिक' की दस्तक

विश्व उच्च रक्तचाप दिवस (17 मई) पर खास

हर तीसरा भारतीय उच्च रक्तचाप का मरीज,  हर पांचवां मधुमेह का

अजय वर्मा

नयी दिल्ली। भारत में स्वास्थ्य संकट की एक नई तस्वीर सामने आई है। BMC Public Health में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन ने यह खुलासा किया है कि 30 वर्ष और उससे अधिक आयु के हर तीन में से एक भारतीय वयस्क उच्च रक्तचाप (Hypertension) से ग्रसित है, जबकि लगभग हर पांचवां व्यक्ति मधुमेह (Diabetes) की चपेट में है। यह अध्ययन National Family Health Survey (NFHS-5, 2019–21) के 11.7 लाख वयस्कों के बायोमार्कर डेटा पर आधारित है और भारत में इस तरह का सबसे बड़ा विश्लेषण माना जा रहा है।

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष

🔶 30 वर्ष और उससे अधिक आयु के भारतीयों में :
* 30 फीसद पुरुष व 29 फीसद महिलाएं उच्च रक्तचाप से ग्रसित
* 19.7 फीसद पुरुष व 17.4 फीसद महिलाएं मधुमेह से प्रभावित

🔶 मधुमेह और उच्च रक्तचाप का आपसी संबंध :
* 43 फीसद मधुमेह मरीजों को उच्च रक्तचाप भी है
* उच्च रक्तचाप वाले व्यक्तियों में मधुमेह की संभावना 51-55फीसद अधिक

🔶 उच्च रक्तचाप से पीड़ित लोगों में :
* 28.1 फीसद पुरुष व 26.6 फीसद महिलाएं मधुमेह से ग्रसित

🔶 बीमारी के हॉटस्पॉट क्षेत्र :
* केरल, तमिलनाडु, पंजाब, हरियाणा, असम, मेघालय

🔶 महत्वपूर्ण सामाजिक-जनसांख्यिकीय निष्कर्ष :
* यह समस्या अब ग्रामीण और निम्न वर्गों तक फैल चुकी है
* महिलाओं में एक बीमारी होने के बाद दूसरी बीमारी का जोखिम थोड़ा अधिक पाया गया

🔶 अध्ययन का मुख्य संदेश :
* मधुमेह और उच्च रक्तचाप को अलग-अलग नहीं, एक साथ देखना जरूरी
* SDG 3.4 के लक्ष्य (2030 तक समयपूर्व मौतों में एक-तिहाई की कमी) के लिए Integrated Care मॉडल अनिवार्य

विशेषज्ञों की राय: अलग-अलग बीमारियां नहीं, जुड़ी हुई चुनौतियां

अध्ययन के प्रमुख लेखक डॉ. निशिकांत सिंह (HSTP) के अनुसार—“मधुमेह और उच्च रक्तचाप अलग-अलग समस्याएं नहीं हैं। एक बीमारी दूसरी के जोखिम को कई गुना बढ़ा देती है। यदि इस आपसी संबंध की अनदेखी की गई, तो मरीजों और पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर गंभीर असर पड़ेगा।”
KGMU लखनऊ के प्रोफेसर नवीन सिंह ने भी चिंता जताई—“यह दोहरी बीमारी न केवल मरीजों के इलाज को जटिल बनाती है, बल्कि पहले से दबाव में चल रही स्वास्थ्य सेवाओं पर भी अतिरिक्त बोझ डालती है।”
डॉ. सुधीर कुमार शुक्ला (HSTP) ने कहा—“महिलाओं और पुरुषों में बीमारियों के जोखिम और इलाज में भिन्नताएं देखी गईं। अब समय आ गया है कि स्वास्थ्य कार्यक्रमों में लैंगिक (gender-specific) दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी जाए।”
डॉ. प्रथीबा जॉन (HSTP) ने इस बात पर जोर दिया कि “दक्षिण भारत, पूर्वोत्तर और उत्तर भारत के कुछ राज्यों में स्वास्थ्य समस्याएं जिस तेजी से बदल रही हैं, उतनी तेजी से स्वास्थ्य सेवाएं खुद को ढाल नहीं पा रही हैं। यह अंतर भरना अत्यंत आवश्यक है।”

नीति में बदलाव की जरूरत

अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया है कि भारत की मौजूदा स्वास्थ्य नीतियां जीवनशैली जनित रोगों (Lifestyle Diseases) की चुनौती का समुचित समाधान नहीं कर पा रही हैं। शोधकर्ताओं ने सरकार और स्वास्थ्य एजेंसियों से अपील की है कि वे आयुष्मान आरोग्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से मधुमेह और उच्च रक्तचाप की संयुक्त स्क्रीनिंग और प्रबंधन रणनीति पर फोकस करें। इसके साथ ही, हेल्थ डेटा सिस्टम को मजबूत करना, लैंगिक दृष्टिकोण को शामिल करना और रोगों की रोकथाम पर निवेश बढ़ाना अब वक्त की मांग है।

चेतावनी

विश्व उच्च रक्तचाप दिवस (17 मई 2025) के ठीक पहले यह शोध एक सख्त चेतावनी है कि भारत में गैर-संक्रामक रोगों (NCDs) का संकट किस स्तर तक पहुंच चुका है।

Study लेखकों की टीम: निशिकांत सिंह, डॉ. सुधीर कुमार शुक्ला, डॉ. प्रथीबा जॉन, प्रिंस चुघ, ऋतुपर्णा सेनगुप्ता, डॉ. रितेश रंजन पुष्कर, निशांत यादव, नवीन सिंह और राजीव सदानंदन (पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव, स्वास्थ्य विभाग, केरल सरकार)।

(पूरा अध्ययन पढ़ें: https://doi.org/10.1186/s12889-025-22983-y)

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