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स्वस्थ भारत का स्वप्न: चीन पर अति निर्भरता घातक

कोरोना काल के बाद जो देश अपनी जरूरत के सामानों के लिए दूसरे देशों पर कम निर्भर रहेंगे वहअपेक्षाकृत शीघ्रता से अपनी अर्थव्यवस्था को संभाल पाएंगे। चूंकि, चीन इस समय एक बड़ा उत्पादक और निर्यातक देश है इसलिए स्वास्थ्य जैसे विषय पर चीन पर निर्भरता कम करना पहला कदम है। बुखार की दवाई पैरासेटामॉल के लिए भी हम चीन पर आश्रित हैं जबकि चीन स्वयं लचर आर्थिक हालात के दौर में है।

अमित त्यागी

(वरिष्ठ स्तंभकार/ एसोसिएट एडिटर (स्वस्थ भारत मीडिया)

चीन की आर्थिक स्थिति डांवाडोल होने का प्रभाव सम्पूर्ण विश्व पर पड़ता है क्योंकि चीन एक बड़ा निर्यातक देश है। कई तरह के आंतरिक संकटों से जूझते चीन के अंदर वित्तीय भ्रष्टाचार इस समय चरम पर है। ज्यादातर देशों में स्वनिर्मित होने वाली वस्तुओं का कच्चा माल भी चीन से आता है। बुखार की दवाई पैरासेटामॉल के लिए भी हम चीन पर आश्रित हैं। वैश्विक परिदृश्य का ताना बाना कुछ ऐसा बन गया है कि देशों में आपसी सामंजस्य बिगड़ने पर आर्थिक सामंजस्य बिगड़ जाता है। चीन वर्तमान में तीन गंभीर संकटों से जूझ रहा है। पहला, विश्व के तमाम देशों में चीन द्वारा चलायी जा रहीं ढांचागत परियोजनाएं निरस्त की जा रहीं हैं। दूसरा, चीन की रीयल एस्टेट कंपनी एवर ग्रैंड पर वित्तीय संकट दिख रहा है। तीसरा, चीन के बिजली उत्पादन में लगातार कमी आ रही हैं। यह तीनों संकट देखने में सामान्य दिख रहे हैं किन्तु इनके प्रभाव बहुत व्यापक हैं। इसको समझने के लिए चीन के पिछले 30 साल के आर्थिक इतिहास को समझना होगा। पिछले तीन दशक में चीन का निर्यात काफी बढ़ा है। चीन द्वारा आर्थिक सहायता देकर अन्य देशों में ट्रेड यूनियन खड़ी की गईं जिसकी वजह से अन्य देशों में चीन उत्पादन कम करवाने में कामयाब रहा। भारत में देखें तो उत्पादन का प्रमुख केंद्र कोलकाता में ट्रेड यूनियन के वर्चस्व ने हावड़ा में बड़ी-बड़ी कंपनियों को बंद करा दिया। चूंकि, मांग और पूर्ति के सिद्धान्त में मांग तो कम नहीं हुयी इसलिए पूर्ति के लिए पहले हम आत्मनिर्भर थे, अब चीन पर निर्भर हो गए। चीन ने ऐसा भारत में ही नहीं किया बल्कि वैश्विक बाजार के ज्यादातर देशों में ऐसा किया। पिछले दो दशक में इस तरह चीन के पास काफी धन उपलब्ध हो गया।

कर्ज देने में चीन ने झोंकी संपति

इस धन को चीन ने दूसरे देशों में बुनियादी संरचना खड़ा करने के क्रम में कर्ज देने में प्रयोग किया। चूंकि चीन में घरेलू बचत दर भी ऊंची थी इसलिए चीन के पास धन आवश्यकता से अधिक था। ढांचागत निवेश के द्वारा चीन अन्य देशों में अपनी पैठ बढ़ाता चला जा रहा था। चीन ने इस परियोजना को बीआरआई प्रोजेक्ट(बेल्ट एंड रोड इनिशियटिव) नाम दिया। 2019 में विश्व बैंक ने इस परियोजना का अध्ययन किया और पाया कि इस प्रोजेक्ट के द्वारा अन्य देशों को भी लाभ हो सकते हैं। इसके बाद जब इन प्रोजेक्ट्स की जांच हुयी तो पता चला कि इनमे तो व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार चल रहा है। धीरे-धीरे इस प्रोजेक्ट्स से जुड़े देश अपने अपने हाथ पीछे खींचने लगे। ऐसे प्रोजेक्ट्स कई देशों में चल रहे हैं। चीन से यूरोप तक एक रेल लाइन बिछाई जा रही है। यह कजाखिस्तान और पोलैंड से होकर जाती है। म्यांमार में एक बन्दरगाह का निर्माण चल रहा है। पाकिस्तान से होकर एक कॉरीडोर बन रहा है। श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल में भी इसी तरह के मूलभूत ढांचे को मजबूत करने वाले प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं। चीन के इन प्रोजेक्ट्स में भ्रष्टाचार के चलते इनमे कई डूबने की तरफ बढ़ रहे हैं। कई देशों की सरकारें इनसे पीछे हटने लगी हैं। मलेशिया के प्रधानमंत्री ने बीआरआई को उपनिवेशवाद का नया प्रारूप बताया है। म्यांमार ने क्यौकप्यू बन्दरगाह परियोजना को निरस्त कर दिया है। मालद्वीप में चीन समर्थित प्रोग्रेसिव पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है। श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान आदि देशों ने भी इन प्रोजेक्ट्स के स्वरूप को बदलने का आग्रह किया है।

चीन के लिए बुरे संकेत

यह कुछ ऐसी बातें हैं जो चीन की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छे संकेत नहीं दे रही हैं। चूंकि, चीन विश्व बाजार में एक बड़ा उत्पादक देश है इसलिए जो जो देश आत्मनिर्भर होंगे वह चीन की घटती अर्थव्यवस्था में खुद को बचा ले जाएँगे। जिन देशों की चीन पर निर्भरता ज्यादा रहेगी वह स्वयं को संभाल पाने की स्थिति में भी नहीं होंगे। अब अगर चीन के अंदर के दूसरे संकट की बात करें तो वह एवरग्रैंड कंपनी का है। यह चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का मौलिक विचार रहा है। इसमे उनका मानना है कि प्रदूषण, असमानता और वित्तीय अस्थिरता को दूर करना अब ज्यादा आवश्यक हो गया है। इस क्रम में ऋण के मानक काफी कड़े किए गए हैं। इसके लिए तीन मानक बनाए गए हैं। ऋण के सामने कंपनी की संपत्ति, अल्पकालिक कर्ज की तुलना में नकदी, कुल ऋण की तुलना में पूंजी। अगर एक भी मापदंड कमजोर पड़ता है तो उसे ऋण नहीं दिया जाता है। एवरग्रैंड ने समय रहते अपनी परियोजनाओं को पूर्ण तो किया था किन्तु कोरोना संकटकाल में उसके फ्लैटों की बिक्री कम हो गयी। इससे निपटने के लिए चीन सरकार को अपनी ही सरकारी इकाइयों को आदेश देना पड़ा कि वह इस परियोजना की इकाइयों को खरीद लें। सरकार द्वारा परियोजना को अपने हाथों में लेना दिखाता है कि संकट कितना बड़ा है। यह कुछ उस तरह का संकट है जब 2008 में अमेरिका ने जनरल मोटर्स को वित्तीय सहता देकर बचाया था।

बिजली संकट भारी

चीन के अंदर तीसरा बड़ा संकट बिजली का है। उसका प्रभाव व्यापक वैश्विक महंगाई का आधार भी बनने जा रहा है। शी जिनफिंग ने प्रदूषण, असमानता और वित्तीय अस्थिरता दूर करने का जो संकल्प लिया है उसके क्रम में उन्होने अपने यहाँ के थर्मल संयंत्र एवं अन्य बिजली उत्पादक संयंत्रों को प्रदूषण कम करने का आदेश दिया है। जो बिजली संयंत्र इन नियमों का पालन नहीं कर पा रहे थे, उनमे से कई को बंद कर दिया गया है। चीन में इस कारण बिजली का उत्पादन काफी कम हो गया है। कम उत्पादन के कारण कई व्यावसायिक इकाइयों को बिजली देना बंद कर दिया गया है। 24 घंटे बिजली की उपलब्धता वाले शहरी क्षेत्र भी वर्तमान में बिजली कटने की समस्या से दो-चार हैं। अब चूंकि व्यवसायिक क्षेत्र में बिजली कटौती की जा रही है इसलिए बहुत से कुटीर उद्योग प्रभावित हो रहे हैं। घरेलू मांग की आपूर्ति तो शायद चीन पूरी कर लें पर इसका प्रभाव निर्यात पर अवश्य पड़ने जा रहा है। चूंकि, चीन पर बहुत से देशों की अर्थव्यवस्था भी निर्भर है इसलिए चीन का यह प्रभाव भारतीय परिदृश्य में स्वस्थ भारत के स्वप्न को स्वप्न ही बनाने जा रहा है।

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