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देश बनाता कौन महान्! कारीगर, मजदूर और किसान

देश बनाता कौन महान्! कारीगर, मजदूर और किसान

देश के 45 करोड़ मजदूरों की आवाज को शब्द दे रहे हैं वरिष्ठ सामाजिक एवं राजनीतिक चिंतक के.एन गोविंदाचार्य

एसबीएम विशेष

प्रवासी मजदूरों और असंगठित क्षेत्र के स्वरोजगारियों की घर-वापसी की अंतहीन व्यथा-कथा, उनका मौन विलाप पिछले 70 वर्षों की विकास यात्रा की कथा का ऑडिट रिपोर्ट है।  बैलेंसशीट में प्रवासी मजदूरों और उनके समकक्ष लोग कम से कम 45 करोड़ लोग बैठते है। उनकी यात्रा संकल्प ने वर्तमान राजसत्ता व्यवस्था को अपने लिये अस्वीकृत कर लिया और अपने को भगवान् के हवाले कर निकल पड़े। लॉकडाउन के पहले ही तीन, चार दिन लगाकर व्यवस्थित वापसी का इन्तजाम किया जा सकता था। दूसरे लॉकडाउन में इज्जतपूर्वक वापसी की व्यवस्था की जा सकती थी।

असंगठित क्षेत्र में ही देश मे 45 करोड़ खाते हैं।  उनमें से 5 करोड़ वापस आने थे। उसमें से प्रदेश के अन्दर तो लोग जैसे-तैसे वापस आ सके। फिर भी करोड़ों लोग फंस गये।

प्रदेश के बाहर से लौटने वालो के प्रति कड़ाई बढ़ती गई। बहुत देर हुई यह समझने में कि ऐसे संकट में घर वापस जाने की इच्छा उचित एवं स्वाभाविक है, रोकने की बजाय व्यवस्थाएं की जानी चाहिये थी जो नहीं हो सकी। फलतः आज का दारुण दृश्य दिख रहा है। यह दृश्य Man Made या State Made है। देश के प्रभु वर्ग ने Cattle Class को भगवान भरोसे छोड़ दिया। समाज ने एक सीमा तक साथ दिया।
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ये मजदूर किसी शौकिया हिच हाइकिंग या ट्रेकिंग के नहीं अपने शरीर और प्राणों को जोड़े रखने की कवायद मे लगे है! अभी तक 2 लाख मजदूरों को उत्तरप्रदेश में वापस किया गया है इसमें 10 दिन लगे। 20 लाख मजदूरों की वापसी में तो 50 दिन लग जायेंगे। अभी बचे पैसे ख़तम हो चले हैं, काम धंधा बंद है, कोरोना का डर अलग से है तो वे अब मरता क्या न करता की मनःस्थिति मे चल पड़े हैं। असंगठित क्षेत्र के कितने लोग कहाँ फंसे है इसका अंदाज ही लगाया जा रहा है। इसमे भी केंद्र, राज्य सरकारें राजनीति खेल रही हैं।

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सत्ता तंत्र पर राहत के लिये निर्भरता, भारतीय समाज व्यवस्था में अधिक से अधिक पूरक व्यवस्था हो सकती है। समाधान कारक नहीं। पूज्य श्री विनोबा भावे ने कहा था-असरकारी काम के लिये काम (अ) सरकारी होना चाहिए।

कई जगहों पर मजदूरों, कारीगरों, सीमांत किसानों के साथ घरवापसी के दौर में बुरा व्यवहार हुआ। घर वापसी की जद्दो-जहद मे लगे लाखों मजदूर और स्वरोजगारों का काफिला हमसे सवाल कर रहा है कि क्या 75 वर्ष की भारत की विकास का इतना ही उनके हिस्से पड़ना वाजिब था या वे अधिक के हकदार हैं। वे हाशिये पर कब? कैसे? किन कारणों से पड़ गये या डाल दिये गये है! क्या कोई इन प्रश्नों का उत्तर देगा? या कोई इसके लिये अपनी जिम्मेदारी को स्वीकार करता है? अन्यथा इतनी लंबी-चौड़ी राज्य का उपादेयता किन के लिये रह जाती है?

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उनकी सुध लेने को सरकार और समाज दोनों को युद्ध स्तर पर इन 45 करोड़ लोगों को प्राथमिकता देनी होगी। भारतीय मजदूर संघ सरीखे समाज के सक्रिय समूहों से संवाद कर साथ लेना होगा। इस क्रम मे सभी को यह ध्यान रखना है कि सभ्य समाज में राज्य व्यवस्था की स्थापना के पीछे प्रस्थापना है कि राज्यवस्था उनके बचाव के लिये सृजित हुई है जो खुद का बचाव न कर सकें।  *State is created to protect those who can not Protect themselves.

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सम्पूर्ण राज्य व्यवस्था को इसी कसौटी पर कसना प. दीनदयाल जी के विचारों की अनुपालना की शुरुआत होगी।

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