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द लांसेट : जलवायु परिवर्तन से खाद्य उत्पादन पर पड़ने वाला प्रभाव वर्ष 2050 तक ले सकता है 05 लाख अतिरिक्त लोगों की जान

 

  • वर्ष 2050 तक फल और सब्‍जी के सेवन में कमी से मौतों की संख्‍या कुपोषण से होने वाली मौतों के मुकाबले दोगुनी हो सकती हैं।
  • भोज्‍य पदार्थों के उत्‍पादन में बदलाव से होने वाली पर्यावरण सम्‍बन्‍धी मौतों में से तीन चौथाई मौतें चीन और भारत में होने की आशंका

जलवायु परिवर्तन वर्ष 2050 में पांच लाख से ज्‍यादा लोगों की मौत का कारण बन सकता है। ऐसा कम फसल उत्पादन की वजह से खुराक और शरीर के भार में परिवर्तन के कारण होने की आशंका है। ‘द लांसेट’में प्रकाशित अनुमानों में यह बात कही गयी है। यह अध्ययन इस बात का अब तक का सबसे पुख्ता प्रमाण है कि जलवायु परिवर्तन खाद्य उत्पादन तथा सेहत के लिये पूरी दुनिया में बुरे परिणाम लाने वाला साबित हो सकता है।

 
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ब्रिटेन स्थित ऑक्‍सफोर्ड विश्वविद्यालय में फ्यूचर ऑफ फूड के ऑक्‍सफोर्ड मार्टिन प्रोग्राम से जुड़े डॉक्‍टर मार्को स्प्रिंगमन की अगुवाई में किया गया यह अध्‍ययन अपने आप में ऐसा पहला अध्‍ययन है जो खुराक के संयोजन और शरीर के भार पर जलवायु परिवर्तन के असर का आकलन करता है, साथ ही वर्ष 2050 तक इसके जरिये दुनिया के 155 देशों में मरने वाले लोगों की संख्‍या का अनुमान भी पेश करता है।
डॉक्‍टर स्प्रिंगमन ने स्पष्ट किया अनुसंधान का ज्यादातर हिस्सा खाद्य सुरक्षा पर केन्द्रित रहा लेकिन कुछ हिस्से में कृषि उत्पादन के स्वासथ्य पर पड़ने वाले व्यापक प्रभावों पर भी रौशनी डाली गयी है। भोजन की उपलब्धता और उनके सेवन में बदलाव भी खुराक तथा भार सम्बन्धी जोखिमों जैसे कि फल और सब्जियां कम खाना, लाल मांस का ज्यादा सेवन और शरीर का वजन ज्यादा होना आदि पर असर डालते हैं। ये सभी चीजें दिल की बीमारी, लकवा और कैंसर जैसे गैर-संचारी रोगों के साथ-साथ उनसे होने वाली मौतों की संख्‍या को भी बढ़ाती हैं।[1]
 
डॉक्टर स्प्रिंगमन ने कहा “हमारे शोध के नतीजे बताते हैं कि प्रति व्‍यक्ति भोजन की उपलब्‍धता में थोड़ी सी कमी भी शरीर की ऊर्जा और खुराक के संयोजन में बदलाव ला सकती है, और इन परिवर्तनों से सेहत को खासा नुकसान सहन करना पड़ेगा।” [1]
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अध्‍ययन में यह भी खुलासा किया गया है कि प्रदूषणकारी तत्‍वों के उत्‍सर्जन में वैश्विक स्‍तर पर कमी नहीं लायी गयी तो वर्ष 2050 तक खाद्य पदार्थों की उपलब्‍धता में अनुमानित सुधार की सम्‍भावनाएं एक तिहाई तक कम हो जाएंगी। इससे प्रति व्‍यक्ति खाद्य उपलब्‍धता में औसतन 3.2% (99 कैलोरी प्रतिदिन), फल तथा सब्‍जी के सेवन में 4%, (14.9ग्राम प्रतिदिन) और लाल मांस की खपत में 0.7% (0.5ग्राम प्रतिदिन)की कमी आएगी।
 
अध्‍ययन मे लगाये गये अनुमान के मुताबिक इन बदलावों से वर्ष 2050 में करीब पांच लाख 29 हजार अतिरिक्‍त मौतें होंगी। अगर तुलना करें तो जलवायु परिवर्तन ना होने की स्थिति में भविष्‍य में खाद्य उपलब्‍धता और खपत में होने वाली बढ़ोत्‍तरी से 1.9 मिलियन (19 लाख) मौतों को होने से रोका जा सकता है।
इन हालात से सबसे ज्‍यादा प्रभावित होने की आशंका वाले देशों में वे मुल्‍क शामिल हैं जो निम्‍न और मध्‍यम आय वर्ग के हैं। इनमें वेस्‍टर्न पैसिफिक क्षेत्र (264000 मौतें) और दक्षिण एशिया (164000) के देश प्रमुख रूप से शामिल हैं। साथ ही जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली तीन चौथाई मौतें तो चीन (248000) और भारत (136000) में ही होने की आशंका है। प्रतिव्‍यक्ति के हिसाब से देखें तो यूनान (प्रति 10 लाख व्‍यक्तियों पर 124 मौतें) और इटली (प्रति 10 लाख व्‍यक्तियों पर 89 मौतें) के भी खासा प्रभावित होने की आशंका है।[2]
 
डॉक्‍टर स्प्रिंगमन और उनके सहयोगियों ने अध्‍ययन के दौरान वर्ष 2050 तक वैश्विक खाद्य उत्‍पादन, व्‍यापार तथा खपत के प्रभावों का मूल्‍यांकन करने के लिये उत्‍सर्जन प्रक्षेपवक्रों, सामाजिक-आर्थिक मार्गों तथा जलवायु की सम्‍भावित प्रतिक्रियाओं से युक्‍त एक कृषि आर्थिक मॉडल का इस्‍तेमाल किया। उन्‍होंने गणना की कि एक सामान्‍य विकास के माहौल में और जलवायु परिवर्तन के चार अलग-अलग परिदृश्‍यों (उच्‍च उत्‍सर्जन, दो मध्‍य उत्‍सर्जन और एक निम्‍न उत्‍सर्जन) में खुराक और शरीर के भार में बदलाव के कारण कितनी अतिरिक्‍त मौतें होंगी। यह आकलन जलवायु परिवर्तन ना होने की स्थिति में पैदा हालात से तुलना करके की गयी (पैनल पेज 4)।
यह मॉडल अनुमान लगाता है कि फल और सब्जियों के सेवन में कमी से जलवायु परिवर्तन सम्‍बन्‍धी पांच लाख 34 हजार मौतें हो सकती हैं। यह आंकड़़ा लाल मांस के सेवन में कमी लाने से स्‍वास्‍थ्‍य को होने वाले फायदे (29 हजार मौतें रोकी जा सकती हैं) के कारण कम होने वाली मौतों के आंकड़े से कहीं ज्‍यादा है।(चित्र संख्‍या दो पेज 6) [2]
फल और सब्‍जी खाने की मात्रा में बदलावों का सबसे ज्‍यादा असर उच्‍च आय वाले देशों (58 प्रतिशत)‍, वेस्‍टर्न पैसिफिक के निम्‍न तथा मध्‍यम आय वाले देशों (74 प्रतिशत), यूरोप (60 प्रतिशत) तथा पूर्वी आभ्‍यंतरिक देशों (42 प्रतिशत) में महसूस किये जाने की सम्‍भावना है। कम वजन के कारण वयस्‍कों की होने वाली मौतों के मामले में दक्षिण-पूर्वी एशिया और अफ्रीका शीर्ष पर हैं। वर्ष 2050 में सभी प्रकार के परिवर्तनों से होने वाली मौतों में इन दोनों क्षेत्रों की हिस्सेदारी क्रमश: 47 और 49 प्रतिशत होने की आशंका है। [2]
 
जलवायु परिवर्तन के कुछ सकारात्‍मक प्रभाव भी होंगे। मोटापे में कमी (‍आंकड़ा संख्‍या 2) से होने वाले स्‍वास्‍थ्‍य सम्‍ब्‍न्‍धी फायदे जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली मौतों के पलड़े को बराबर करते दिखेंगे। बहरहाल, वर्ष 2050 में पूरी दुनिया में मोटापे से होने वाली करीब दो लाख 60 हजार मौतों की आशंका को देखें तो कम कैलोरी मिलने के कारण कम वजन होने से होने वाली मौतों की संख्‍या बराबर होती भले दिखेगी लेकिन फिर भी यह आंकड़ा दो लाख 66 हजार का होगा।
अहम बात यह है कि अध्‍ययनकर्ताओं का कहना है कि प्रदूषणकारी तत्‍वों के उत्‍सर्जन में कमी लाने से स्‍वास्‍थ्‍य सम्‍बन्‍धी लाभ हो सकते हैं। ऐसा करने से जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली मौतों की आशंका को 29 से 71 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। हालांकि यह इस दिशा में की जाने वाली कार्रवाई की मजबूती पर निर्भर करेगा। उदाहरण के तौर पर उच्‍च उत्‍सर्जन के हालात के मुकाबले मध्‍यम उत्‍सर्जन परिदृश्‍य में (वैश्विक औसत सतह वायु तापमान में वर्ष 1986-2005 की तुलना में वर्ष 2046-65 में 1.3-1.4डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्‍तरी होगी), खुराक तथा शरीर के भार सम्‍बन्‍धी मौतों की संख्‍या में 30 प्रतिशत की कमी लायी जा सकती है।
 
स्प्रिंगमन के अनुसार “भविष्य में आशावादी परिदृश्‍यों में भी मृत्‍युदर पर जलवायु परिवर्तन का खासा नकारात्‍मक असर पड़ने की आशंका है। अनुकूलन के प्रयासों में और तेजी लाये जाने की जरूरत है। जलवायु परिवर्तन से स्‍वास्‍थ्‍य पर पड़ने वाले नकारात्‍मक प्रभावों को कम करने के लिये खुराक तथा शरीर के भार सम्‍बन्‍धी जोखिम कारकों के उपचार के लिये जनस्‍वास्‍थ्‍य कार्यक्रमों का आयोजन प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिये।”[1]
 
न्यूजीलैंड स्थित ऑकलैण्‍ड यूनीवर्सिटी के एलिस्टेयर वुडवर्ड और डेनमार्क के कोपनहेगन विश्‍वविद्यालय के जॉन पोर्टर ने इस अध्‍ययन के प्रभावों पर टिप्‍पणी करते हुए लिखा, “स्प्रिंगमन और उनके सहयोगी खाद्य और पोषण सुरक्षा पर खासी रोशनी डालकर जलवायु और पोषण सम्‍बन्‍धी चर्चा को एक जरूरी दिशा में ले गये हैं, लेकिन नीति सम्‍बन्‍धी सवालों का एक बड़ा पहाड़ बाकी रह गया है, जिसकी बारीकी से पड़ताल की आवश्‍यकता है। अगले 30-40 वर्षों में जलवायु परिवर्तन के क्‍या परिणाम हो सकते हैं, इस पर हमारे विचारों के प्रतिबंधों को आंकड़ों की गुणवत्‍ता और मॉडल की स्थिरता जैसे परम्‍परागत सरोकारों के लिहाज से समझा जा सकता है मगर यह भी सम्‍भावना है कि भविष्‍य में होने वाले जोखिमों के आकार का गलत अंदाजा लगा लिया जाए, जिसके परिणामस्‍वरूप अनुकूलन और न्‍यूनीकरण के लिये उठाये जा रहे मौजूदा कदमों को कम आंके जाने की आशंका है।”
और जानने के लिए आप इस लिंक पर जा सकते हैं… 
http://www.thelancet.com/journals/lancet/article/PIIS0140-6736(15)01156-3/abstract

नोटः यह जानकारी स्वतंत्र लेखिका डॉ. सीमा जावेद ने उपलब्ध कराई है।

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