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कोरोना योद्धाओं पर शराबी पड़ने वाले हैं भारी

शराब पिलाकर अर्थव्यवस्था सुधारने की चाह रखने वाली सरकार की कोरोना-रणनीति को अपरिपक्व बता रहे हैं वरिष्ठ होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ.ए.के.गुप्ता

नई दिल्ली/ एसबीएम विशेष

By Prof.Dr.A.K.Gupta, MD, Sr. Homoeopathic Consultant
Founder Director-  AKGsOVIHAMS Medical Center
President – Homeopathic Medical Association of India, Delhi

इस कोरोना के लॉकडाउन पीरियड में जहां पर सब लोगों को यह सलाह दी जा रही कि सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेन करें और अपने घरों में रहे। यहां तक कि किसी अन्य की अंतिम संस्कार में शामिल होने वालों की संख्या सीमित कर दी गई है। 20 लोगों से ज्यादा लोग इकट्ठा नहीं हो सकते हैं। ऐसे समय में सरकार द्वारा शराब और पान गुटखा की दुकानों को खोलने की अनुमति देना बहुत ही अफसोस की बात है। इसे मैं बहुत बड़ी गलती मानता हूं। इसका हर्जाना आम जनता को भुगतना पड़ सकता है।

शराब की दुकानों पर हजारों की तादाद में लोगों का जमघट सोशल डिस्टेंस का मजाक उड़ाना ही तो है। बिना मास्क लगाए किलोमीटर लंबी लाइन में लगे हुए शराबियों की फौज सबने देखी होगी। शराब की चाह ने उन्हें सभी नियम-कानूनों को ताख पर रखने के लिए मजबूर कर दिया। कमबख्त! शराब की लत होती ही ऐसी है।

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इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि दुर्घटनाएं हुईं, लड़ाई-झगड़े हुए। घरेलु हिंसा की शिकायते भी मिलीं। कई जगहों पर पुलिस को भीड़ को काबू करने के लिए लाठी भी चलानी पड़ी। और कई जगहों पर भीड़ बेकाबू होने पर शराब कि दुकानें बंद भी  करवानी पड़ी।

यह सब सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि सरकार को धन चाहिए था। उसकी तिजोरी खाली हो रही थी। कोरोना आपातकाल में जब लोग दवा और चिकित्सा की सुविधा के लिए दर-दर भटक रहे हैं वैसे समय में दारू की दुकानों पर सरकारी मेहरबानी समझ से परे है। और शर्मनाक भी है।

मुझे यह नहीं समझ में आया कि आखिर सरकार ने इतनी अफरा-तफरी में दुकानों को क्यों खोला? यदि सरकार के लिए धन प्राप्त करने का यही एक मात्र विकल्प सूझ रहा है तो इस विकल्प को भी तो कम से कम सूझ-बूझ से लागू किया जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा भी नहीं हो सका।

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सरकार ने बिना किसी तैयारी के शराब की दुकानों को खोल दिया। जिस दौर में सारा देश ऑनलाइन शॉपिंग कर रहा है, उस दौर में शराब के लिए भी ऑनलाइन व्यवस्था करी जा सकती थी। कोई ऐप बनाया जा सकता था जहां से उपभोक्ता आसानी से घर बैठे शराब मंगा सकता था। इस सेवा के बदले में सेवा शुल्क भी रखा जा सकता था। या फिर बुकिंग से कोई स्लिप दी जा सकती है जिसमें दुकान  का नाम दिन और टाइम प्रिन्ट हो और उसी हिसाब से उपभोक्ता अपना सामान ले सकता था। इसका फायदा यह होता कि एक समय पर कहीं भी किसी दुकान पर इतनी भीड़ नहीं लग पाती।

सरकार अगर ऑनलाइन इसकी बिक्री करती और इसका पूरा हिसाब रखती तो यह भी मालूम चल सकता था कि किस ग्राहक ने कितनी बोतल ली है। इससे वह जरूरत से ज्यादा शराब नहीं खरीद पाता। लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार को अपनी तिजोरी की ज्यादा लोगों के स्वास्थ्य की कम परवाह है।

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इस प्रकार जो हुआ उससे करोना के संक्रमण फैलने की आशंकाएं और बढ़ गई है। और आने वाले 15-20 दिनों में हमें इसका हर्जाना भुगतना पड़ सकता है। इसका असर दिखना शुरू भी हो गया है।

एक तरफ तो हम पूरी मुस्तैदी से तैयारी के साथ कोरोना से लड़ने के लिए प्रयत्न कर रहे है। वहीं दूसरी तरफ सरकार धन के लिए शराब की दुकानें खोलवा रही है। सरकार ने बहुत बड़ी भूल की है। इसका नतीजा भुगतने के लिए सरकार और पीने-पिलाने वाले दोनों को तो तैयार रहना ही चाहिए। साथ में इनके कारण शराब नहीं पिने वाली जनता को भी तैयार रहना होगा। कहा गया है कि गेहूं के साथ घून तो पीसता ही है।

विगत 40 दिनों से कोरॉना वॉरियर्स ने जो मेहनत की थी उस मेहनत पर इकॉनमी वॉरियर्स के रूप में सामने आए शराबी भारी पड़ने वाले हैं। आप लोग बस देखते जाइए। इसे ही कहते हैं हरि अनंत, हरि कथा अनंता! कोरोना आपातकाल की अनंत कथाओं में सरकार रूपी हरि की यह कथा निराली और अनोखी है। जिसका हिसाब आने वाली पीढ़ियां जरूर मागेंगी!

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