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कोविड-19 का सकारात्मक पर्यावरणीय प्रभाव

कोविड-19

प्रख्यात पर्यावरणविद धीप्रज्ञ द्विवेदी कोविड-19 का पर्यावरण पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभाव को रेखांकित कर रहे हैं

नई दिल्ली/ एसबीएम

विश्व की लगभग आधी जनसंख्या इस समय कोविड-19 के कारण अपने-अपने घरों के अंदर हैं। इस कारण विभिन्न प्रकार की मानवीय गतिविधियां रुकी हुयी हैं। दुनिया के आधे से ज्यादा हिस्से में आर्थिक गतिविधियां बंद हैं साथ ही हर प्रकार के यातायात भी बंद हैं, इसका सीधा प्रभाव हम अपने पर्यावरण के उपर देख सकते हैं।

मानवीय गतिविधियों में इस रुकावट के कारण प्रदूषण की स्थिति में बदलाव दिख रहा है। ऐसा लग रहा कि कोविड के कारण पर्यावरण की स्थिति में सुधार हुआ है। विश्व के विभिन्न भागों से आ रहे समाचार इसी ओर इशारा कर रहे हैं। वायु प्रदूषण में आया बदलाव न केवल हम नगरों में महसूस कर रहे हैं बल्कि यह अंतरिक्ष से भी देखा जा रहा है। इसका एक उदाहरण हम दिल्ली या अन्य भारतीय नगरों में वायु प्रदूषण की स्थिति को ले सकते हैं।

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सफर मोबाइल एप्प के अनुसार दिल्ली का एक्यूआई लगभग 116 के आस पास रह रहा है जो सामान्य तौर पर 450 के आस पास रहता है। ऐसे ही विश्व के अन्य क्षेत्रों से भी बेहतर एक्यूआई की जानकारी मिल रही है। आर्गोन नेशनल लैबोरेटरी के एक वायुमंडलीय वैज्ञानिक स्कॉटकॉलिस ने कहा कि उपग्रह इमेजरी और अन्य वायुमंडलीय मॉनिटर प्रदूषण में बड़ी कमी दिखा रहे हैं। उन्होंने कहा कि चीन में भारी उद्योगों और कारखानों के बंद होने के कारण नाइट्रसऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसे प्रदूषकों में 50% की कमी हुई है। कुछ अध्ययनों के अनुसार न्यूयॉर्क में भी प्रदूषकों में गिरावट आयी है, लेकिन यह मुख्य रूप से यातायात में कमी के कारण है न कि कारखानों से कम उत्सर्जन के कारण।

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नासा के द्वारा जारी किए गए चित्रों में पूर्वोत्तर संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रमुख महानगरीय क्षेत्रों में नाइट्रोजन के स्तर में काफी कमी दिख रही है, क्योंकि हम महामारी के दौरान कम ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कर रहे हैं। इसी क्षेत्र में प्रदूषण का मार्च 2015 और 2019 के बीच का स्तर दिखाने वाला वही मॉडल बहुत अलग स्थिति बताता है। वर्तमान में “प्रदूषण का स्तर सामान्य की तुलना में 30% कम है और यह पिछले 15 वर्षों के किसी भी समय के तुलना में बहुत कम है। शोधकर्ताओं का कहना है कि प्रदूषण के स्तर में सुधार से न केवल पर्यावरण को लाभ होता है, बल्कि व्यक्तियों के स्वास्थ्य को भी लाभ होता है।”

यह उस तरह के प्रदूषण को भी कम करता है जो लोगों को वास्तव में COVID-19 वायरस के प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है, प्रोफेसर रीकेंबेक कहते हैं। यह कटौती यह दर्शाती है कि औद्योगिक वातावरण और ड्राइविंग के तात्कालिक परिवर्तन से हमारे वातावरण पर कितना असर पड़ सकता है। इसी प्रकार यूरोप में, उपग्रह चित्र उत्तरी इटली में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी दिखाते हैं। इसी तरह की स्थिति स्पेन और ब्रिटेन में देखी जा रही है।

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वाणिज्यिक हवाई यात्रा पर रोक भी प्रदूषण को कम कर रही है, लेकिन इस कारण से मौसम की भविष्यवाणी करने की हमारी क्षमता भी प्रभावित हुयी है क्योंकि हवाई जहाजों के द्वारा मौसम के बारे में लगातार सूचना उपलब्ध होती रहती है। इसके अतिरिक्त चीन में स्मॉग कम होने की तस्वीरें, इटली में नहरों में डॉल्फ़िन की उपस्थिति और संयुक्त राज्य अमेरिका में सड़कों पर घूमने वाले जंगली जानवरों को पिछले कुछ हफ्तों में फेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर पर साझा किया गया है, जो विश्व को आशा प्रदान करते हैं।

टोलेडो विश्वविद्यालय में पारिस्थितिकी के शिक्षक बोसेनब्रोक के अनुसार, वैश्विक स्तर पर, चीन की तरह कम वायु गुणवत्ता वाले स्थानों पर,बड़े शहरों में, श्वसन संबंधी समस्याओं वाले लोगों के लिए संभवतः कुछ स्वास्थ्य लाभ भी हैं। इसके अतिरिक्त जलस्रोतों के ऊपर भी इसका प्रभाव देखा जा रहा है। जैसे यमुना और गंगा नदी में कई स्थानों पर प्रदूषण की मात्रा में बहुत कमी आई है ।

इस महामारी द्वारा प्रेरित मानव व्यवहार में परिवर्तन ने वैज्ञानिकों को मनुष्य और पर्यावरण के संबंधों को समझने का एक दुर्लभ अवसर उपलब्ध कराया है। जलवायु और मौसम प्रणाली अविश्वसनीय रूप से जटिल हैं, इसलिए ऐसे महत्वपूर्ण परिवर्तनों का अध्ययन करने का कोई भी अवसर शोधकर्ताओं के लिए मूल्यवान है। वायुमंडलीय प्रणाली, मौसम और जलवायु को नियंत्रित करती है-इसके कई अलग-अलग घटक हैं। छोटी बर्फबारी से लेकर सबसे बड़ी आंधी तक सब कुछ – और वे सभी आपस में इंटेरक्ट करते हैं। इस महामारी ने इस पूरे प्रणाली में किसी भी प्रकार का मानवीय हस्तक्षेप के बिना इस इन्टरैक्सन को समझने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान किया है।

इसने इस दिशा में भी लोगों को सोचने के लिए प्रेरित किया है कि अगर मनुष्य अपनी गतिविधियों पर रोक लगा दे तो प्रकृति स्वयं भी प्रदूषण जैसी समस्याओं से निबटने में सक्षम है। लेकिन अभी इस विचार को लेकार पर्याप्त डेटा उपलब्ध नहीं है। अतः हम कह सकते हैं कि कोविड-19 के कारण पर्यावरण की वर्तमान स्थिति में विशेषकर वायु और जल प्रदूषण की स्थिति में कुछ सकारात्मक बदलाव हुये हैं।

वैसे कोविड-19 के कारण पर्यावरण की स्थितियों में सुधार के प्रमाण पहले भी मिले हैं जैसे जूलियापोंगराट्ज़, जो जर्मनी के म्यूनिख विश्वविद्यालय में भूगोल विभाग में भौतिक भूगोल और भूमि उपयोग प्रणालियों के लिए प्रोफेसर हैं, ने जब प्राचीन बर्फ के टुकड़ों में फंसे छोटे बुलबुले का अध्ययन किया तो पाया कि 14 वीं शताब्दी में यूरोप में ब्लैक डेथ जैसे महामारी और 16 वीं शताब्दी में स्पैनिश विजयकर्ताओं के आगमन के साथ चेचक जैसे रोगों की महामारी जब दक्षिण अमेरिका में लाई गई थी तब उस समय, वायुमंडलीय कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा में कमी आयी थी। वे परिवर्तन बीमारी से उच्च मृत्यु दर के परिणाम थे और अमेरिका की विजय के मामले में, नरसंहार से। अन्य अध्ययनों में पाया गया है कि इन मौतों का मतलब था कि पहले से खेती की गई भूमि के बड़े ट्रैक्ट को छोड़ दिया गया था, जिस कारण वहाँ कार्बन के उत्सर्जन में कमी आई थी।

डर इस बात का भी है कि कहीं ये बदलाव केवल तात्कालिक न हों जैसा वर्ष 2008 के आर्थिक मंदी के समय हुआ था, जिसके ठीक बाद वर्ष 2010 में उत्सर्जन अपने तब तक के अधिकतम स्तर पर पंहुच गया था। वर्तमान में महामारी के कारण ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन कम है और हवा की गुणवत्ता में वृद्धि हुई है, हालांकि, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के प्रमुख इंगरएंडरसन ने इसे पर्यावरण के लिए वरदान के रूप में देखने के प्रति आगाह किया है।

 

लेखक परिचयः लेखक स्वतंत्र संतंभकार, स्वस्थ भारत (न्यास) के न्यासी एवं पर्यावरण मामलों के जानकार हैं।

 

 

 

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