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कोरोना-काल: उज्ज्वल भविष्य की राह दिखाती ई-शिक्षा

कोरोना-काल: उज्ज्वल भविष्य की राह दिखाती ई-शिक्षा

कोरोना ने सभी सेक्टरों को प्रभावित किया है। ई-शिक्षा के क्षेत्र में तकनीक ने बदलाव का बयार बहाया है। आशुतोष कुमार सिंह की रपट

एसबीएम/ समाचार

कोरोना ने सभी क्षेत्रों को प्रभावित किया है। सबसे ज्यादा पठन-पाठन में व्वधान आया है। बच्चों के स्कूल, कॉलेज बंद हैं। परीक्षाएं रद्द हो गयी हैं। पढ़ाई का दबाव बढ़ गया है। ऐसे में तकनीक ने सहारा दिया है। ई-शिक्षा के माध्यम से बच्चों तक पहुंचने की कोशिश शिक्षक कर रहे हैं। वावजूद इसके अभी भी ग्रामीण भारत में शिक्षा तक पहुंच नहीं हो पा रही हैं। इस चुनौती के दौर में शिक्षा का स्वरूप क्या हो? किस तरह बच्चों तक शिक्षा को ले जाया जाए? किस तरह बच्चों के मनोविज्ञान को समझते हुए पढ़ाई कराई जाए? शिक्षा का भविष्य क्या होगा? डिजिटल शिक्षा से कहीं मास्टर जी की नौकरी खतरे में तो नहीं पड़ जाएगी? क्या ई-शिक्षा स्कूली शिक्षा का विकल्प बन सकता है? इस तरह के तमाम सवालों का जवाब ढ़ूंढ़ने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया।

इस आयोजन को ग्लोबल सोशल कनैक्ट ने ऑर्गानाइज्ड किया। जिसका विषय रखा गया ‘कोरोना काल में शिक्षा पर प्रभाव और बदलाव’। इस वेबिनार में मुख्य वक्ता के रुप में शिक्षाविद श्रीमति फातिमा अगरकर  और श्रीमति रूबी बख्शी खुर्दी ने अपने विचार रखें। प्रसिद्ध क्रिकेटर अजीत अगरकर की पत्नी फातिमा अगरकर मुंबई में रहती हैं और वहां पर कई स्कूलों का संचालन करती हैं। वहीं रूबी बख्सी स्वटीजरलैंड में रहती हैं उनका नाम अंतरराष्ट्रीय शिक्षाविदों में अदब से लिया जाता है। वे  विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचो पर शिक्षा में सुधार के कार्य कर रही हैं।

इस चर्चा की शुरूआत में रूबी बख्शी ने कहा कि, इस समय शक्षण संस्थाओं को आपसी प्रतियोगिता को छोड़कर आपस में सहयोग करना होगा। स्कूल के महत्व के साथ-साथ अब माता पिता को भी अपने बच्चों के शिक्षक की भूमिका निभानी होगी।

वहीं फातिमा जी ने कहा कि हम संक्रमण काल से गुजर रहे हैं। इस काल में शिक्षा के क्षेत्र में भी बहुत से बदलाव हो रहे हैं। सारे बदलाव उपयोगी ही होंगे यह तो भविष्य बतायेगा। संभव है कुछ बदलावों का असर नकारात्मक भी पड़े लेकिन इसके लिए हम बदलावों से मुंह नहीं मोड़ सकते। देश की शिक्षा के लिए जो अच्छा और बेहतर होगा अंत में वह ही स्थाई रूप से आगे बढ़ पायेगा। ये सारे बदलाव कई चरणों में एक सकारात्मक रूप को अख्तियार कर पाएंगे।

फातिमा जी ने माना कि आज देश संकट के दौर से गुजर रहा है ऐसे में शिक्षा को पहुंचाने के लिए ई-शिक्षा का महत्व बढ़ गया है। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ई-शिक्षा स्कूली शिक्षा का विकल्प नहीं हो सकता है। उन्होंने कहा कि स्कूली बच्चों पर ई-शिक्षा का बोझ नहीं डाला जा सकता हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि बहुत से बड़े शैक्षणिक संस्थान बच्चों को ई प्लेटफॉर्म पर लाने से बच रहे हैं। और यह सही भी है। हमें बच्चों के मनोविज्ञान को समझना होगा। उन्होंने कहा आज के दौर में पैरेंट को अपने बच्चों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। टीचर उन बच्चों का विशेष क्लास ले सकते हैं जो कमजोर हैं। बच्चों के पाठ को पूरा कराने में पैरेंट्स को आगे आना होगा। बच्चों को उनके मनोविज्ञान के अनुसार ही शिक्षा दी जानी चाहिए। उन्हें ऐसा नहीं लगना चाहिए कि उन पर बोझ डाला गया है।

इस बीच में संचालक अभिषेक शर्मा ने अपना उदाहरण देते हुए कहा कि उनकी बेटी जब स्कूल जाती थी तब पढ़ने के प्रति बहुत उत्साहित थी, लेकिन जब से घर में हैं उसका मन पढ़ाई में नहीं लग रहा है। वरिष्ठ मीडियाकर्मी अनिल सौमित्र, स्वस्थ भारत अभियान के राष्ट्रीय संयोजक आशुतोष कुमार सिंह सहित तमाम लोगों ने अपने सवाल एक्सपर्ट्स के सामने रखें।

वेबिनार का संचालन ग्लोबल सोशल कनैक्ट की अध्यक्षा रिचा सिंह उपाध्यक्ष अभिशेक शर्मा और सचिव अमित गिरी ने किया। भारत, स्विट्जरलैंड, ब्रिटेन, इंडोनेषिया, मलेषिया, केनिया, श्रीलंका जैसे देश के लोगों ने इस वेबिनार में भाग लिया। दीवान स्कूल मेरठ से रामू शर्मा, मनीशी वत्स और रितू कौशिक ने भी विचार रखे।

शिक्षा का ई-शिक्षा की ओर बढ़ना देश-दुनिया को उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जाएगा ऐसी आशा तो की ही जानी चाहिए।

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